किसान संगठनों ने प्रधानमंत्री को लिखा पत्र, भारत-अमेरिका व्यापार समझौते से कृषि को बाहर रखने की मांग
इंडियन कोऑर्डिनेशन कमेटी ऑफ फार्मर्स मूवमेंट्स (ICCFM) ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भारत-अमेरिका व्यापार समझौते से कृषि क्षेत्र को बाहर रखने की अपील की है। संगठन का कहना है कि अमेरिकी कृषि उत्पादों को अधिक बाजार पहुंच, एमएसपी में बदलाव और आयात शुल्क में कटौती से किसानों की आजीविका, खाद्य सुरक्षा और बीज संप्रभुता पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
भारत के 13 राज्यों के किसान संगठनों के गठबंधन इंडियन कोऑर्डिनेशन कमेटी ऑफ फार्मर्स मूवमेंट्स (ICCFM) ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से प्रस्तावित भारत-अमेरिका व्यापार समझौते (Bilateral Trade Agreement) से कृषि क्षेत्र को बाहर रखने की अपील की है। संगठन का कहना है कि कृषि क्षेत्र में किसी भी प्रकार की रियायत से करोड़ों भारतीय किसानों की आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में संगठन ने भारत और अमेरिका के बीच फरवरी 2025 से चल रही द्विपक्षीय व्यापार समझौता वार्ताओं पर गहरी चिंता व्यक्त की है। पत्र में मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा गया है कि अंतरिम व्यापार समझौता अंतिम चरण में है। हालांकि 23-24 जून, 2026 को नई दिल्ली में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) जैमीसन ग्रीयर की यात्रा के दौरान इसे अंतिम रूप नहीं दिया जा सक।
उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, बिहार, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और महाराष्ट्र के किसान संगठनों का प्रतिनिधित्व करने वाली ICCFM ने कहा कि हाल के महीनों में अमेरिकी अधिकारियों द्वारा भारत के कृषि बाजार को अमेरिकी उत्पादों के लिए खोलने संबंधी दिए गए बयानों से देशभर के किसानों में चिंता बढ़ी है। पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में आईसीसीएफएम के महासचिव युद्धवीर सिंह और भारतीय किसान यूनियन (BKU) के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत भी शामिल हैं।
पत्र के अनुसार, सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी से संकेत मिलता है कि भारत अमेरिका से आयात होने वाले कपास, लाल ज्वार (रेड सोरघम), सोयाबीन तेल और प्रसंस्कृत फलों जैसे कई कृषि उत्पादों पर आयात शुल्क कम कर सकता है। संगठन का कहना है कि यदि पर्याप्त शुल्क सुरक्षा नहीं रही तो इन फसलों की खेती करने वाले भारतीय किसान भारी सब्सिडी वाले अमेरिकी उत्पादों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएंगे।
किसान संगठन ने यह आशंका भी जताई है कि समझौते के तहत अमेरिका से सब्सिडी वाले डेयरी और पोल्ट्री उत्पादों के आयात का रास्ता आसान हो सकता है। साथ ही आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम) मक्का के भारत में प्रवेश का मार्ग भी खुल सकता है।
पत्र में यह भी दावा किया गया है कि अमेरिका विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में भारत पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) व्यवस्था में बदलाव का दबाव बना रहा है। संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि एमएसपी का मुद्दा अंतरिम समझौते का हिस्सा बना या दोनों देशों के बीच किसी अन्य समझ के तहत शामिल किया गया तो इसका प्रतिकूल प्रभाव देश के करोड़ों धान और गेहूं किसानों पर पड़ेगा।
ICCFM ने बीज संप्रभुता को लेकर भी चिंता जताई है। संगठन का कहना है कि अमेरिका के व्यापार समझौतों में अक्सर बौद्धिक संपदा (इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी) से जुड़े ऐसे प्रावधान शामिल होते हैं, जो किसानों के पारंपरिक बीज बचाने और आपस में बीजों के आदान-प्रदान के अधिकारों को सीमित कर सकते हैं। इससे बहुराष्ट्रीय बीज कंपनियों का बाजार पर नियंत्रण बढ़ने की आशंका है।
किसान संगठन ने प्रधानमंत्री से आग्रह किया है कि कृषि क्षेत्र को किसी भी भारत-अमेरिका मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) से बाहर रखा जाए। साथ ही सरकार से डब्ल्यूटीओ में कृषि सब्सिडी के मुद्दे को प्राथमिकता से उठाने और अमेरिकी कृषि सब्सिडी को चुनौती देने की मांग की गई है। संगठन का कहना है कि अमेरिका अपने किसानों को भारी सब्सिडी देता है, जबकि भारत के घरेलू समर्थन ढांचे पर लगातार सवाल उठाता है।
पत्र में कहा गया है कि भारतीय किसानों को अमेरिका से आने वाले भारी सब्सिडी वाले कृषि उत्पादों के साथ असमान और अनुचित प्रतिस्पर्धा के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। संगठन ने प्रधानमंत्री के उन पुराने आश्वासनों का भी उल्लेख किया, जिनमें उन्होंने भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता के दौरान किसानों, मछुआरों तथा डेयरी और पोल्ट्री उत्पादकों के हितों की पूरी सुरक्षा का भरोसा दिया था। हालांकि, संगठन का कहना है कि 6 फरवरी को जारी भारत-अमेरिका संयुक्त वक्तव्य से किसानों को यह भरोसा नहीं मिला कि उनके हित पूरी तरह सुरक्षित रहेंगे।

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