भारत को उर्वरक आयात पर निर्भरता घटाने, एआई और आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाने की जरूरतः डॉ. एम.एल. जाट
NAAS ने उर्वरक मामले में आत्मनिर्भरता के लिए बहुआयामी रोडमैप पेश किया है, जिसमें आयात निर्भरता घटाने, पोषक तत्वों के उपयोग की दक्षता बढ़ाने और नीतिगत सुधारों पर जोर दिया गया है। इस विषय पर आयोजित विमर्श सत्र में विशेषज्ञों ने प्रिसिजन तकनीक, जैविक विकल्प और सब्सिडी सुधार की सिफारिश की, साथ ही 25% रासायनिक उर्वरकों को जैविक से बदलने का लक्ष्य रखा गया।
नेशनल एकेडमी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (NAAS) ने उर्वरक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए एक व्यापक रोडमैप तैयार किया है, जिसमें नीतिगत सुधार, आधुनिक तकनीकों के उपयोग और टिकाऊ कृषि पद्धतियों पर जोर दिया गया है। इस विषय पर एक विमर्श सत्र में विशेषज्ञों ने आयात निर्भरता कम करने, पोषक तत्वों के उपयोग की दक्षता बढ़ाने और संतुलित व आवश्यकता-आधारित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा देने की जरूरत बताई।
विमर्श सत्र के बाद कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के सचिव, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक और एनएएएस के प्रेसिडेंट डॉ. एम.एल. जाट ने संवाददाता सम्मेलन को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि भारत ने 2047 तक आत्मनिर्भर राष्ट्र बनने का लक्ष्य निर्धारित किया है, और इस यात्रा में कृषि क्षेत्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। जहां हरित क्रांति के दौरान उत्पादन बढ़ाने में उर्वरकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, वहीं वर्तमान चुनौती उर्वरकों के उपयोग की दक्षता में कमी और उनके अंधाधुंध इस्तेमाल में निहित है।
डॉ. जाट ने यह भी कहा कि देश में सालाना लगभग 330 लाख टन उर्वरकों की खपत होती है, जिसका बड़ा हिस्सा आयात किया जाता है; ऐसे में आयात पर निर्भरता कम करना अनिवार्य हो गया है। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे को हल करने के लिए ऐसे व्यापक दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसमें अल्पकालिक, मध्यकालिक और दीर्घकालिक रणनीति शामिल हों। उन्होंने कहा कि मृदा स्वास्थ्य जैसी योजनाओं को मजबूत करना, उर्वरकों के संतुलित और आवश्यकता-आधारित उपयोग को बढ़ावा देना, और किसानों के बीच जागरूकता बढ़ाना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के सचिव, आईसीएआर महानिदेशक और एनएएएस प्रेसिडेंट डॉ. एम.एल. जाट प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए।
डॉ. जाट ने बताया कि उर्वरकों के उपयोग को उत्तम बनाने के लिए हमें सटीक पोषक तत्व प्रबंधन, एआई और सेंसर-आधारित प्रणालियों जैसी आधुनिक तकनीकों का लाभ उठाना चाहिए। उन्होंने कहा कि दालों और तिलहनों की ओर फसल विविधीकरण, 'वेस्ट-टू-वेल्थ' पहल के तहत जैविक कचरे की रीसाइक्लिंग का पुनर्चक्रण और जैविक स्रोतों के उपयोग को बढ़ाना, रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने में और भी अधिक योगदान देगा।
विचार विमर्श सत्र के बारे में उन्होंने बताया कि प्रतिभागियों ने बहु-आयामी रणनीति अपनाने की सलाह दी, जिसमें छोटे, मध्यम और लंबे समय के अनुसंधान एवं विकास लक्ष्य हों, और उन्हें हासिल करने के लिए सहायक नीतियां हों। रूपरेखा में उर्वरक अनुसंधान को मजबूत करने पर जोर दिया जाना चाहिए, ताकि स्मार्ट वैकल्पिक उर्वरक विकसित किए जा सकें; अप्रयुक्त स्वदेशी खनिजों (ग्लूकोनाइट, फॉस्फेट चट्टानें, अभ्रक, पॉलीहेलाइट...) और औद्योगिक उप-उत्पादों का उपयोग किया जा सके; जैविक पदार्थों का उपयोग बढ़ाया जा सके; मिट्टी के माइक्रोबायोम की क्षमता का लाभ उठाया जा सके; खाद बनाने की तकनीकों में सुधार किया जा सके और अच्छी कृषि पद्धतियां (जीएपी) अपनाई जा सकें जिनमें उर्वरकों और जैविक पदार्थों को मिलाकर सटीक पोषक तत्व प्रबंधन, मिट्टी के स्वास्थ्य की बहाली, फसल विविधीकरण और अवशेषों की रीसाइक्लिंग शामिल हो।
इस बात पर भी जोर दिया गया कि एकीकृत पोषक तत्व आपूर्ति और प्रबंधन (आईएनएसएएम) को बढ़ावा देने के लिए मिशन मोड कार्यक्रम शुरू करने की आवश्यकता है। प्रस्तावित मिशन का लक्ष्य अगले 3 वर्ष में मौजूदा खनिज उर्वरक के उपयोग का कम से कम 25% हिस्सा जैविक खाद से बदलना होगा। एआई प्लेटफॉर्म 'भारत VISTAAR' जैसे डिजिटल उपकरणों का उपयोग करके पूरे वर्ष बड़े पैमाने पर प्रौद्योगिकी हस्तांतरण करने से तकनीक को बड़े पैमाने पर अपनाने में मदद मिलेगी। कमजोर विस्तार सेवाओं में उर्वरक के उपयोग को बढ़ाने पर तो अधिक जोर दिया जाता है, लेकिन उसके कुशल उपयोग पर ध्यान नहीं दिया जाता।
हरित क्रांति के बाद भारत के कृषि बदलाव में उर्वरकों की भूमिका केंद्रीय रही है; इन्होंने अनाज उत्पादन में भारी वृद्धि की है और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की है। हालाँकि, यह क्षेत्र खासकर फास्फोरस और पोटेशियम के लिए अब भी आयात पर बहुत ज़्यादा निर्भर है। इसके कारण भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा बाहर जाती है और सब्सिडी का बोझ भी काफी बढ़ जाता है, जो 2024–25 में लगभग 1.71 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। उर्वरकों का गलत और असंतुलित इस्तेमाल उत्पादकता को और भी सीमित कर देता है, क्योंकि फसलें पोषक तत्वों का केवल छोटा सा हिस्सा यानी लगभग 30–50% नाइट्रोजन, 15–25% फास्फोरस, और 50–60% पोटेशियम ही इस्तेमाल कर पाती हैं। बाकी हिस्सा लीचिंग, बहाव, वाष्पीकरण या मिट्टी में जम जाने के कारण बर्बाद हो जाता है। पोषक तत्वों के इस्तेमाल की यह कम दक्षता (एनयूई) उत्पादन लागत बढ़ाती है, सब्सिडी का बोझ बढ़ाती है, और मिट्टी तथा पानी की गुणवत्ता में गिरावट का कारण बनती है।
वर्ष 2024–25 में कुल उर्वरक (N+P2O5+K2O) खपत 329.3 लाख टन तक पहुंच गई, जिसमें उर्वरक इस्तेमाल की इंटेंसिटी 151 किलोग्राम/हेक्टेयर थी। उर्वरक खपत का औसत अनुपात (9.3:3.5:1) नाइट्रोजन (N) की ओर बहुत ज़्यादा झुका हुआ है। यूरिया उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली लगभग 80% प्राकृतिक गैस आयात की जाती है। पश्चिम एशिया में हाल के घटनाक्रमों को उर्वरकों और कच्चे माल के संबंध में केवल अल्पकालिक आपूर्ति श्रृंखला संकट के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। बल्कि, यह हमारे लिए एक चेतावनी है कि हम अपनी नीतियों और अनुसंधान एवं विकास (R&D) की प्राथमिकताओं पर फिर से विचार करें और उन्हें आत्मनिर्भरता की दिशा में पुनर्गठित करें।

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