उर्वरक आत्मनिर्भरता पर बजट में हो सकता है विशेष मिशन का ऐलान
उर्वरकों पर बढ़ती आयात निर्भरता, सब्सिडी बोझ और मृदा स्वास्थ्य की चुनौतियों को देखते हुए सरकार 2026–27 के बजट में ‘उर्वरक आत्मनिर्भरता मिशन’ की घोषणा कर सकती है। मिशन का उद्देश्य घरेलू संसाधनों के उपयोग, वैकल्पिक पोषक तत्वों, फसल विविधीकरण और वैज्ञानिक तरीकों के जरिए 2030 तक रासायनिक उर्वरकों की मांग में 20 प्रतिशत तक कमी लाना है।
उर्वरकों के आयात पर बढ़ती निर्भरता को कम करने और मृदा स्वास्थ्य को बचाने की दिशा में केंद्र सरकार एक महत्वपूर्ण कदम उठाने जा रही है। सरकार चरणबद्ध तरीके से उर्वरक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने, उर्वरकों पर होने वाले व्यय को घटाने और रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग पर अंकुश लगाने के लिए एक व्यापक रणनीति तैयार कर रही है। इसके तहत आगामी आम बजट 2026-27 में 'उर्वरक आत्मनिर्भरता मिशन' की घोषणा की जा सकती है।
2030 तक 20 फीसदी मांग घटाने का लक्ष्य
उर्वरक आत्मनिर्भता मिशन का उद्देश्य एक कारगर और समग्र रणनीति के माध्यम से साल 2030 तक उर्वरकों की मांग में 20 फीसदी तक की कमी लाना है। चरणबद्ध योजना के तहत हर पांच साल के लिए लक्ष्य तय किए जाएंगे कि किस प्रकार रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को कम किया जाए। इसके लिए बजट में मिशन के लिए पर्याप्त धनराशि का प्रावधान किया जाएगा।
उर्वरक आयात पर बढ़ती निर्भरता
देश में रासायनिक उर्वरकों की खपत बढ़ रही है जिसे पूरा करने के लिए बड़ी मात्रा में उर्वरकों का आयात करना पड़ता है। चालू वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का उर्वरक आयात पिछले साल के मुकाबले लगभग 76 फीसदी बढ़कर रिकॉर्ड 18 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। इस साल अप्रैल से नवंबर के बीच यूरिया के आयात में 120 फीसदी और डाई अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) के आयात में करीब 56 फीसदी की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। आयात पर बढ़ती निर्भरता न केवल किसानों को समय पर आपूर्ति सुनिश्चित करने में चुनौती पैदा करती है, बल्कि देश की उर्वरक सब्सिडी का बोझ भी बढ़ाती है। साथ ही कीमतों में उतार-चढ़ाव का जोखिम भी बढ़ता है।
- उर्वरकों की बढ़ती खपत: चालू साल में यूरिया की खपत 400 लाख टन को पार कर जाएगी, वहीं डीएपी की खपत भी करीब 100 लाख टन तक पहुंच जाएगी। कॉम्पलेक्स उर्वरकों का उपयोग भी बढ़ रहा है। रासायनिक उर्वरकों का उपयोग और आयात जिस गति से बढ़ रहा है वह मृदा स्वास्थ, पर्यावरण और राजकोषीय मोर्चे पर मुश्किलें खड़ी कर रहा है।
- सब्सिडी का बोझ: चालू वित्त वर्ष 2025-26 के बजट में सरकार ने 1,67,887 करोड़ रुपये की उर्वरक सब्सिडी का प्रावधान किया था। संशोधित अनुमानों के अनुसार, यह आंकड़ा बजट प्रावधान से काफी ऊपर जाने की संभावना है। इससे पिछले साल उर्वरक सब्सिडी 1,71,299 करोड़ रुपये रही थी।
- उत्पादकता में गिरावट: वैज्ञानिकों का मानना है कि रासायनिक उर्वरकों के असंतुलित उपयोग के कारण 'पोषक तत्व उपयोग दक्षता' (Nutrient Use Efficiency) कम हो गई है। यानी, अब प्रति किलो उर्वरक इस्तेमाल से उत्पादन में होने वाली बढ़ोतरी पहले की तुलना में काफी कम हो गई है।
उर्वरक आत्मनिर्भरता मिशन
उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक, केंद्र सरकार उर्वरकों के आयात पर निर्भरता घटाने और मृदा स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियों को हल करने के लिए एक दीर्घकालिक मिशन शुरू करने जा रही है। इसके तहत घरेलू स्तर पर उपलब्ध खनिज विकल्पों का उपयोग कर उर्वरक आत्मनिर्भरता को बढ़ाया जाएगा। साथ ही प्रचलित रासायनिक उर्वरकों की जगह लेने वाले अन्य पोषक तत्वों (न्यूट्रिएंट) को बढ़ावा दिया जाएगा। साथ ही उर्वरकों पर नए शोध के जरिए वैकल्पिक उर्वरकों का उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया जाएगा। इस तरह उर्वरक आत्मनिर्भरता पर केंद्रित यह एक समग्र मिशन होगा।
- घरेलू खनिज संसाधनों का उपयोग: उर्वरक आत्मनिर्भरता के लिए देश में उपलब्ध खनिजों का उपयोग कर नए उर्वरक 'मॉलिक्यूल' तैयार करने पर शोध किया जाएगा। इसका उद्देश्य विशेष रूप से पोटाश और फास्फोरस के आयात को कम करना है।
- वैकल्पिक उर्वरकों को बढ़ावा: मृदा स्वास्थ्य सुधारने के लिए रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर जैविक उर्वरकों, वैकल्पिक उर्वरकों और सूक्ष्म पोषक तत्वों को बढ़ावा दिया जाएगा।
- फसल विविधीकरण: ऐसी फसलों का क्षेत्र बढ़ाने पर जोर दिया जाएगा जिनमें रासायनिक उर्वरकों की खपत कम होती है। उदाहरण के लिए, दालों का क्षेत्रफल बढ़ने से न केवल उर्वरक की जरूरत कम होगी, बल्कि दालों का आयात भी घटेगा।
- न्यूट्रिएंट एफिशिएंसी शोध: ऐसी किस्मों के विकास पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा जो नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश का बेहतर उपयोग कर सकें। नई किस्मों के विकास में न्यूट्रिएंट एफिशिएंसी पर फोकस किया जाएगा।

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