मशरूम का गणित बिगाड़ रहा प्रदूषण, दिल्ली-NCR में खेती से लेकर बाजार तक की चुनौतियां
दिल्ली-एनसीआर में मशरूम की खेती सीमित जगह और कम समय में अधिक उत्पादन के कारण तेजी से लोकप्रिय हो रही है, लेकिन बढ़ता वायु प्रदूषण किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन रहा है। कंपोस्ट की गुणवत्ता, बाजार तक समय पर पहुंच और कीमतों में उतार-चढ़ाव उत्पादन और मुनाफे को प्रभावित कर रहे हैं, जिससे इस उभरते क्षेत्र के लिए ठोस नीतिगत समर्थन की जरूरत महसूस हो रही है।
कभी फंगस कहा जाने वाला मशरूम अब दिल्ली एनसीआर में थाली की शान समझा जाने लगा है. संभवत: यही वजह है कि दिल्ली-NCR में महज एक कमरे में कुल 15–16 टन कंपोस्ट डालकर केवल 45–60 दिनों में 3 हजार से 3.5 हजार टन तक मशरूम उगाया जा रहा है. यह प्रॉडक्शन किसी फैक्ट्री में मशीनों के जरिए होने वाला उत्पादन नहीं, बल्कि आधुनिक कृषि उद्यम का उत्साहजनक उदाहरण है. पारंपरिक खेती जहां एक एकड़ में सीमित पैदावार देती है, वहीं मशरूम की खेती सीमित जगह और सीमित समय में बेहतरीन फसल देती है, बशर्ते कि कुछ परिस्थतियां अनूकुल रहें. राजधानी और आसपास के क्षेत्रों में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में मशरूम फॉर्मिंग का बूम जारी है. मगर, उत्तर भारत के मशरूम फॉर्मिंग से जुड़े किसान अलग तरह की दिक्कतों का सामना कर रहे हैं जिनमें प्रदूषण की मार का साल दर साल बढ़ते जाना भी शामिल है.
मार्केट रिसर्च कंपनी IMARC ग्रुप की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2024 में भारत के मशरूम बाजार का आकार लगभग 27.6 करोड़ अमेरिकी डॉलर आंका गया था. साल 2025 से 2033 के बीच यह बाजार लगभग 6.5 फीसदी की सालाना औसत वृद्धि दर से बढ़कर 2033 तक करीब 48.7 करोड़ डॉलर तक पहुंच सकता है. 2024 में भारत के मशरूम बाजार में सबसे बड़ा, 39.8 हिस्सा उत्तर भारत का था. रिपोर्ट कहती है कि इसकी बड़ी वजह अनुकूल मौसम, सरकार का सहयोग और पहले से ही मौजूद बेहतर ढांचा भी है. हिमाचल प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों में तापमान और नमी मशरूम की खेती के लिए बेहद अनुकूल माने जाते हैं. सरकारी योजनाएं भी ऐसी हैं कि किसानों को प्रशिक्षण और सब्सिडी मिलती है, जबकि रिसर्च इंस्टीट्यूट खेती की तकनीक को बेहतर बनाने में मदद करते हैं. लेकिन इस रिपोर्ट से इतर, व्यावहारिक स्तर पर भविष्य के इन आंकड़ों को छूने में प्रदूषण जैसे कारक बाधक बन रहे हैं.

शिवम शर्मा के फॉर्म के भीतर मशरूम की खेती के लिए रखा कंपोस्ट।
बाहरी दिल्ली के कराला इलाके में एआरएस मशरूम फॉर्म्स के नाम से खेती कर रहे शिवम गोपाल शर्मा दो साल से इस 'कारोबार' में हैं. मशरूम फॉर्मिंग को वह खेती कम, मॉडर्न एग्रीकल्चर बिजनेस अधिक बताते हैं. वह कहते हैं, "भारत में अब भले ही मशरूम की विभिन्न किस्मों की खपत बढ़ी है लेकिन ऐसा मानने वाले लोगों की कमी अब भी नहीं जो इसे फंगस या मांसाहार समझकर परहेज करते हैं." वह बताते हैं, "इधर प्रदूषण से फसल पर बुरा असर पड़ने लगा है. अगर हवा में हानिकारक तत्व (प्रदूषण) हैं तो यह हवा फसल को नुकसान पहुंचाती है... इसे झेलना पड़ रहा है... हम भगवान भरोसे हैं... क्योंकि प्रदूषण हर साल बढ़ता ही जा रहा है. जब मशरूम की फसल लगभग तैयार हो चुकी होती है उस समय इसे ऑक्सीजन की अच्छी मात्रा की जरूरत होती है, लेकिन चूंकि हवा खराब है तो प्रदूषण के हानिकारक कण मशरूम की खेती को नुकसान पहुंचाते हैं. प्रदूषण के चलते मशरूम की पिन (छोटी कोंपले) अच्छे से उठ नहीं पाती हैं." यानी, आम तरीके से समझें तो मशरूम पनपकर खिल नहीं पाते हैं.
शिवम दो साल से मशरूम की खेती कर रहे हैं. उनके पास फिलहाल एक कमरा है जहां 16 टन की कंपोस्ट में मशरूम की पैदावार होती है. वह बताते हैं कि प्रति क्रॉप सर्कल इसमें 3-3.5 हजार टन के बीच यील्ड हो जाती है. मशरूम की खेती का एक पूरा सर्कल आमतौर पर 45 से 50 दिन का होता है.
मशरूम की खेती के दो मॉडल, दोनों पर किसानों का दांव
मशरूम की खेती दो तरह से की जाती है, एसीयू यानी एसी यूनिट लगाकर जहां तापमान को जरूरत के अनुसार मैंटेन किया जाता है। दूसरा झुग्गी मॉडल जो सर्दियों के मौसम में ही मौसमी खेती की तरह पैदावार देता है. यूं तो राजधानी और आसपास के इलाकों में दोनों तरह से खेती की जा रही है लेकिन उत्साही युवा जन खेती के मॉडर्न तरीके की ओर अधिक आकर्षित हो रहे हैं. इसकी वजह संभवतः सरकारी केंद्रों (पूसा, केवीके, हैक) में ट्रेनिंग की उपलब्धता भी है.
पवन कुमार ने उजुआ में कृषि विज्ञान केंद्र से साल 2016 में ट्रेनिंग लेकर अपना फॉर्म स्थापित किया. केवीके की ओर से सेट-अप लगाने में मदद मिली. उन्होंने इसके बाद मुरथल में मौजूद हैक (HAIC-Haryana Agro Industries Corporation Ltd) ट्रेनिंग सेंटर और इसके बाद डायरक्टरेट ऑफ मशरूम रिसर्च सेंटर से भी इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग हासिल की. पवन कुमार कभी पारंपरिक खेती करते थे लेकिन बाद में एक कमरे से शुरुआत करके आज एक बिल्डिंग में मशरूम की खेती चलाते हैं. तीसरी ट्रेनिंग से पूर्व ही एक कमरे में 6 टन खाद के साथ सेटअप कर लिया था। तब 1200 किलो मशरूम पैदा हुआ. आज वह 70 टन कंपोस्ट के साथ खेती कर रहे हैं. साथ ही, कई युवाओं को प्रशिक्षण भी दे रहे हैं.

एआरएस फॉर्म में कटाई के लिए तैयार मशरूम।
बाहरी दिल्ली के नजफगढ़ के हसनपुर गांव में रहने वाले पवन कुमार मशरूम की खेती में पिछले 10 सालों से लगे हुए हैं. वह कहते हैं कि यदि किसान के पास एसीयू है तो उसके लिए तापमान मुद्दा नहीं है और झुग्गी मॉडल के मुकाबले इसमें काफी हद तक प्रदूषण को भी मैनेज किया जा सकता है. पवन कुमार अपने एसीयू में 12 महीने मशरूम उगाते हैं. यही एसी यूनिट की सबसे बड़ी खासियत है कि इसमें मौसम पर निर्भरता नहीं रहती.
सबसे अधिक खपत बटन मशरूम की
कई वैरायटी की उपलब्धता के बीच दिल्ली एनसीआर में फिलहाल सबसे अधिक खपत बटन मशरूम की है. इसके अलावा शीटेक और पोर्टोबेलो की मांग भी है लेकिन मंहगा होने के कारण यह कम खरीदा और इसलिए कम पैदा किया जाता है. चूंकि बटन मशरूम सर्वाधिक खरीदे जाते हैं और इसलिए सर्वाधिक पैदावार इसी की है. आम मार्केट में आकार में बड़े पोर्टोबेलो मशरूम जैसी वैरायटी बहुत बिकती नहीं है.
हालात की दोहरी मार से अपने बलबूते जूझ रहे दिल्ली के किसान- पवन कुमार बताते हैं, "हमें कंपोस्ट खाद बनाने की सरकार से परमिशन नहीं मिली. गांव अरबन एरिया में घोषित है, भले ही कृषि योग्य भूमि हमारे पास है... दिल्ली में इससे जुड़ी खाद बनाने की समस्या आती है. प्लांट के लिए खाद हरियाणा से मंगवानी होती है."
झुग्गी सिस्टम की चुनौतियां
वे किसान जो इस सिस्टम के जरिए मशरूम उत्पादन कर रहे हैं, उनके लिए सर्दी का सीजन ही कारगर होता है. अक्टूबर से फरवरी के बीच ही इस सिस्टम के तहत खेती की जा सकती है. झुग्गी सिस्टम के तहत नवंबर-दिसंबर में टेंपरेचर की समस्या से निपटने के लिए शिवम कहते हैं कि बुआई की गणना कुछ इस तरह से करनी चाहिए कि फसल का आखिरी फेज जनवरी में आकर लगे. ऐसे में यदि ये महीने प्रदूषण से त्रस्त रहेंगे और तापमान में अपेक्षित कमी नहीं होगी तो पैदावार बुरी तरह से प्रभावित होगी.
तापमान का टेढ़ा गणित, बैच एक तापमान अनेक
मशरूम की खेती में विभिन्न स्तरों पर टेंपरेचर अलग अलग रखा जाता है. बुआई के दौरान तापमान 22–25 डिग्री सेल्सियस के बीच होना चाहिए. 15 से 18 दिनों के बीच केसिंग की जाती है जिसमें तापमान 22 से 24 के बीच होना चाहिए। बाद में जब 18 से 24 दिनों के भीतर खेती का कूलिंग पीरियड होता है तो तापमान 14 से 18 के बीच चाहिए.
मशरूम उगाने का अगला अहम पढ़ाव है जब पिन आने लगती है. उस समय तक बुआई को लगभग 30 दिन हो चुके होते हैं. इस दौरान तापमान 12 से 16 के बीच होना चाहिए. 50-60 दिनों के भीतर फसल कटने लायक हो जाती है और उस समय प्लांट का तापमान 14 से 18 के बीच ही होना चाहिए. तापमान में गड़बड़ से भी मेहनत और लागत पर पानी फिर सकता है क्योंकि या तो पिनिंग नहीं होगी या छोटी होगी या फिर सड़ांध हो सकती है. ऑक्सीजन और कार्बनडाइऑक्साइड की उपलब्धता भी विभिन्न स्तरों पर अलग-अलग मात्रा में चाहिए.
आम किसान को कंपोस्ट में मिल सकता है धोखा
मशरूम की खेती का अहम कंपोनेंट है सही कंपोस्ट. तापमान के अतिरिक्त मशरूम की खेती में सबसे जरूरी है अच्छी खाद का मिल पाना और इसका सही ढंग से इस्तेमाल. पवन बताते हैं- आप जो खाद खरीद रहे हैं, वह ऊपरी तौर पर हो सकता है ठीक लगे लेकिन हो सकता है इसके भीतर अमोनिया गैस रह गई हो या फिर इसका पॉश्चुराइजेशन सही से न हुआ हो. यदि ये दिक्कतें हुईं तो आखिर में मशरूम बनेंगे ही नहीं. वह कहते हैं- किसान वैज्ञानिक रूप से इतना सक्षम नहीं होता कि वह कंपोस्ट की टेस्टिंग स्वयं कर सके, वह बस अनुभव के आधार पर उचित खाद प्राप्त करता है.
बीजों की उपलब्धता
मशरूम स्पॉन यानी बीज पूसा के विभिन्न सेंटर, हैक (सोनीपत) आदि सरकारी सेंटरों से आसानी से पाए जा सकते हैं. मगर बीज में एक्स्ट्रा मशरूम फंगस तो नहीं, यह जांचना जरूरी है. देखना यह भी होगा कि बीज ज्यादा पुराना यानी कई महीनों से स्टोरेज में रखा तो नहीं है. पवन कुमार ने बीजों की उपलब्धता को लेकर बताया कि बटन मशरूम के बीज आपको हाथोंहाथ सेंटरों पर मिल सकते हैं. बीज के अन्य प्रकार और खाद के लिए एडवांस में ऑर्डर देना पड़ता है.

एआरएस फॉर्म में तैयार मशरूम के पैकेट।
रखरखाव में सावधानी और सप्लाई तक का सफर
कई बार होता यह है कि लोग बाजार से मशरूम के हल्का गुलाबी हो जाने पर नहीं खरीदते या फिर हल्की टूट-फूट को खरीदते नहीं. इसलिए, सावधानी से पैकिंग और सप्लाई की जाती है. गलत हैंडलिंग के चलते कई बार मशरूम दब या पिचक सकते हैं जिन्हें कंज्यूम नहीं किया जाना चाहिए. जब किसान अपने स्तर पर पैकिंग करके भेजते हैं तो इस तरह की घटनाएं कम होती हैं. लेकिन फिर भी यह चुनौती बनी रहती है कि शुरू से आखिर तक रखरखाव संबंधी बेहद सावधानी बरती जाए.
खाद कहीं बीच में खराब हो गई या प्रोसेंसिंग में कोई छोटी गड़बड़ हो गई तो फसल आखिर में बिगड़ सकती है. समय से मार्केट में नहीं भेजी तो भी मशरूम का रंग बदलने या गाढ़ा हो जाने से बाजार में किसान को उचित दाम नहीं मिलते. पवन बताते हैं, मशरूम की खेती अन्य सब्जियों से अलग इस प्रकार से भी है कि जिस दिन यह पूरी तरह से तैयार हो गए, उसी दिन इसे काटकर, साफ करके पैक करके मार्केट में बिक्री के लिए पहुंचा दिया जाना होता है. प्रतिदिन यह फसल कटनी और एंड-कस्टमर तक पहुंच जानी चाहिए.
डिमांड और सप्लाई का नियम यहां भी
मशरूम के रेट मांग और आपूर्ति के नियम पर चलते हैं. किसान हर व्यक्ति या रेस्त्रां के पास जाकर सीधे तो नहीं बेच सकता. उसे मंडियों व आढतियों के मार्फत ही फसल बाजार में पहुंचानी होगी. कई बार आढ़तियों के चलते दिक्कतें आती हैं. कई बार किसान भी आढ़तियों से एडवांस ले चुके होते हैं जिसके बाद सही दाम मिलने में उन पर दबाव आता है. सर्दियों में कई बार मांग से अधिक सप्लाई हो जाती है जिसके बाद किसान को उचित दाम नहीं मिलते. मशरूम ऐसी फसल नहीं है जिसका किसान स्टॉक कर सके.
नब्बे के दशक में भारत में मशरूम आया और आज 2025 में मशरूम की खेती तेजी से युवाओं की पसंद बन रही है. ऐसे में जरूरी है कि सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर उन चुनौतियों से निपटने के लिए सही रणनीति बनाई जाए जिनसे तेजी से उभरता यह सेक्टर फिलहाल जूझ रहा है.

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