भारत के लिए उर्वरक आत्मनिर्भरता एक रणनीतिक जरूरतः डॉ. एस.पी. मोहंती
HURL के प्रबंध निदेशक डॉ. एस.पी. मोहंती ने रूरल वर्ल्ड के साथ खास बातचीत में कहा कि भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक आपूर्ति शृंखला में व्यवधानों के बीच उर्वरक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता भारत के लिए रणनीतिक आवश्यकता बन गई है। उन्होंने घरेलू उत्पादन बढ़ाने, हरित प्रौद्योगिकी को अपनाने, संतुलित उर्वरक उपयोग और मृदा स्वास्थ्य सुधार पर जोर दिया।
ऐसे समय जब भू-राजनीतिक तनाव, वैश्विक आपूर्ति शृंखला में व्यवधान और ऊर्जा बाजार की अस्थिरता विश्व उर्वरक परिदृश्य को तेजी से बदल रहे हैं, भारत के लिए उर्वरकों में आत्मनिर्भरता का लक्ष्य रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है। हिंदुस्तान उर्वरक एवं रसायन लिमिटेड (एचयूआरएल) के प्रबंध निदेशक डॉ. सिबा प्रसाद मोहंती भारत के उर्वरक और कृषि-इनपुट क्षेत्र में 37 वर्षों से अधिक का अनुभव रखते हैं। रूरल वॉयस के प्रिंट पब्लिकेशन, रूरल वर्ल्ड के एडिटर-इन-चीफ हरवीर सिंह के साथ विशेष साक्षात्कार में डॉ. मोहंती ने उर्वरक सुरक्षा, उभरती चुनौतियों और भारत के उर्वरक उद्योग के भविष्य पर अपने विचार साझा किए।
सवालः पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने वैश्विक ऊर्जा और उर्वरक आपूर्ति को प्रभावित किया है। अब तक भारत के उर्वरक और कृषि क्षेत्र पर इसके प्रभाव का आप किस प्रकार आकलन करते हैं?
आज उर्वरक उद्योग ऐसे वैश्विक परिवेश में काम कर रहा है, जहां भू-राजनीतिक घटनाक्रमों का ऊर्जा बाजार, उर्वरकों के कच्चे माल, लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन पर सीधा प्रभाव पड़ता है। सौभाग्य से, भारत ने इस चुनौती के बीच उल्लेखनीय मजबूती दिखाई है। सरकार के सक्रिय नीतिगत हस्तक्षेपों, आयात स्रोतों के विविधीकरण तथा घरेलू उत्पादन क्षमता में वृद्धि ने संभावित बड़े व्यवधानों को काफी हद तक कम करने में मदद की है। इसके परिणामस्वरूप किसानों को उर्वरकों की आपूर्ति बिना किसी बड़े अवरोध के जारी है।
हाल के भू-राजनीतिक संकटों ने इस महत्वपूर्ण तथ्य को स्पष्ट किया है कि उर्वरक सुरक्षा ही राष्ट्रीय सुरक्षा है। आत्मनिर्भरता को अब केवल आर्थिक दृष्टिकोण से नहीं देखा जा सकता, बल्कि यह एक रणनीतिक आवश्यकता बन चुकी है। भारत को घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने, आयात निर्भरता में विविधता लाने, अधिक लचीली और भरोसेमंद आपूर्ति श्रृंखलाएं विकसित करने तथा हरित हाइड्रोजन, हरित अमोनिया, कार्बन डाइऑक्साइड कैप्चर एवं उपयोग तथा कोयले को गैस में बदलने जैसी परिवर्तनकारी प्रौद्योगिकी में निवेश बढ़ाने पर ध्यान देना होगा। ये नवाचार न केवल बाहरी जोखिमों और वैश्विक बाजार की अनिश्चितताओं के प्रति भारत की संवेदनशीलता को कम करेंगे, बल्कि देश को टिकाऊ, आत्मनिर्भर और भविष्य के लिए तैयार उर्वरक मैन्युफैक्चरिंग में अग्रणी देशों की श्रेणी में भी स्थापित करेंगे।
यदि भू-राजनीतिक तनाव लंबे समय तक बने रहते हैं या और बढ़ जाते हैं, तो निर्बाध उर्वरक उत्पादन के लिए एचयूआरएल की क्या आकस्मिक योजना है?
व्यावसायिक निरंतरता और आपूर्ति सुरक्षा एचयूआरएल की प्राथमिकताओं में शामिल हैं। वैश्विक ऊर्जा बाजारों, कच्चे माल की उपलब्धता और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क में होने वाले घटनाक्रमों पर हमारी लगातार नजर है। साथ ही, भारत सरकार, उद्योग जगत के हितधारकों और अपने सप्लायरों के साथ घनिष्ठ समन्वय बना रखा है।
एचयूआरएल की प्रमुख ताकतों में से एक इसकी मजबूत गैस आपूर्ति व्यवस्था है। हमने अनेक गैस आपूर्तिकर्ताओं के साथ समझौते किए हैं। अपने संयंत्रों में गैस की उपलब्धता निश्चित करने के लिए गेल और इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन जैसी अग्रणी ऊर्जा कंपनियों के साथ कार्य करते हैं। विविधीकृत आपूर्ति की यह रणनीति संभावित व्यवधानों के समय मददगार होती है। हमारी रणनीति में विवेकपूर्ण भंडार प्रबंधन, यथासंभव खरीद स्रोतों का विविधीकरण, आपूर्ति श्रृंखला की निगरानी, परिचालन दक्षता में सुधार और रखरखाव तथा उत्कृष्ट परिचालन के माध्यम से संयंत्रों की विश्वसनीयता बढ़ाना भी शामिल है।

क्या प्राकृतिक गैस की ऊंची कीमत, कच्चे माल की लागत या मालभाड़ा दरों में वृद्धि के कारण इनपुट लागत बढ़ रही है?
ऊर्जा लागत, विशेष रूप से प्राकृतिक गैस की कीमतें, यूरिया उत्पादन की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाले सबसे महत्वपूर्ण कारकों में से एक है। इसी तरह, मालभाड़ा दरों और वैश्विक स्तर पर कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव भी उर्वरक उद्योग की लागत संरचना को सीधे प्रभावित करता है। हाल के भू-राजनीतिक घटनाक्रमों और अनिश्चितताओं से निस्संदेह लागत पर दबाव बढ़ा है। हालांकि, भारत का उर्वरक क्षेत्र ऐसी नीतिगत व्यवस्था के अंतर्गत संचालित होता है, जिसका उद्देश्य किसानों को कीमतों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव से बचाना है। परिणामस्वरूप, भले ही उत्पादकों पर आर्थिक दबाव बढ़ता हो, लेकिन सरकारी सहायता के माध्यम से इसका प्रभाव काफी हद तक किसानों तक नहीं पहुंचने नहीं दिया जाता है।
गोरखपुर, सिंदरी और बरौनी स्थित एचयूआरएल संयंत्रों की वर्तमान स्थिति क्या है?
वर्ष 2025-26 में एचयूआरएल ने अपने इतिहास का सर्वाधिक, लगभग 39 लाख मीट्रिक टन यूरिया का उत्पादन किया। यह निर्धारित वार्षिक लक्ष्य से अधिक रहा तथा तीनों संयंत्रों ने मिलकर लगभग 102 प्रतिशत क्षमता का उपयोग किया। यह उपलब्धि सभी इकाइयों की परिचालन परिपक्वता, विश्वसनीयता और दक्षता को दर्शाती है। घरेलू यूरिया उत्पादन क्षमता को मजबूत करने के उद्देश्य से स्थापित ये अत्याधुनिक संयंत्र अब देश की उर्वरक सुरक्षा के महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुके हैं। इनके निरंतर बेहतर प्रदर्शन ने भारतीय किसानों के लिए उर्वरकों की उपलब्धता बढ़ाने और आयात पर निर्भरता कम करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
हमारा मुख्य ध्यान परिचालन की विश्वसनीयता, ऊर्जा दक्षता और क्षमता उपयोग को अधिकतम स्तर तक पहुंचाने पर केंद्रित है। साथ ही सुरक्षा, पर्यावरणीय अनुपालन और सतत विकास के उच्चतम मानकों का पालन भी सुनिश्चित किया जा रहा है। प्रक्रिया में निरंतर सुधार, सर्वोत्तम परिचालन पद्धतियों को अपनाने तथा कर्मचारियों की प्रतिबद्धता के बल पर एचयूआरएल भारत की उर्वरक आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को साकार करने में प्रमुख योगदानकर्ता के रूप में उभरा है।
भारत लंबे समय से उर्वरकों के अत्यधिक और असंतुलित उपयोग की समस्या से जूझ रहा है। हाल ही प्रधानमंत्री ने किसानों से रासायनिक उर्वरकों का उपयोग कम करने की अपील की। कृषि उत्पादकता से समझौता किए बिना इस लक्ष्य को कैसे हासिल किया जा सकता है?
लक्ष्य रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को एकदम से कम करना नहीं होना चाहिए, बल्कि पोषक तत्वों के संतुलित और सही प्रबंधन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। रासायनिक उर्वरकों ने भारत की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और कृषि उत्पादकता बनाए रखने के लिए भविष्य में भी उनकी आवश्यकता बनी रहेगी। हालांकि, उनका उपयोग वैज्ञानिक सिद्धांतों और पर्यावरणीय आवश्यकताओं के अनुरूप होना चाहिए। प्रधानमंत्री ने भी इस बात पर जोर दिया है कि समय की मांग संतुलित उर्वरक उपयोग और टिकाऊ कृषि पद्धतियों की ओर बढ़ने की है, जिससे मृदा स्वास्थ्य की रक्षा करते हुए कृषि की दीर्घकालिक समृद्धि सुनिश्चित की जा सके।
भारत के सामने एक प्रमुख चुनौती नाइट्रोजनयुक्त उर्वरकों, विशेषकर यूरिया का अत्यधिक उपयोग है, जबकि एनपीके (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश) पोषक तत्वों के संतुलित प्रयोग पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया है। मृदा परीक्षण आधारित सिफारिशों को अपनाकर तथा किसानों के बीच जागरूकता बढ़ाकर इस असंतुलन को दूर करना आवश्यक है। इससे पोषक तत्व उपयोग दक्षता में सुधार होगा और मिट्टी की उर्वरता भी बनी रहेगी।
इस समस्या का समाधान समेकित पोषक तत्व प्रबंधन (इंटीग्रेटेड न्यूट्रिएंट मैनेजमेंट) में निहित है, जिसके तहत रासायनिक उर्वरकों के साथ-साथ जैविक खाद, जैव उर्वरक, फसल अवशेष प्रबंधन तथा मिट्टी-विशिष्ट पोषक तत्वों का प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा सॉयल हेल्थ कार्ड, प्रिसीजन खेती, नैनो उर्वरक, नैनो यूरिया, नैनो डीएपी तथा ड्रोन आधारित पोषक तत्व छिड़काव जैसी आधुनिक तकनीकें पोषक तत्व उपयोग दक्षता को उल्लेखनीय रूप से बढ़ा सकती हैं। इन तकनीकों से उर्वरकों की बर्बादी कम होगी, लागत घटेगी और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों में भी कमी आएगी।
ग्रीन अमोनिया पर दुनिया भर में तेजी से चर्चा हो रही है। भविष्य के लिए इसका क्या महत्व है?
उर्वरक और ऊर्जा क्षेत्र का भविष्य टिकाऊ और कम कार्बन वाले समाधानों की ओर बढ़ रहा है। ग्रीन अमोनिया इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण विकल्पों में से एक बनकर उभर रहा है। ग्रीन अमोनिया का उत्पादन रिन्यूएबल एनर्जी से संचालित इलेक्ट्रोलिसिस प्रक्रिया से बनी ग्रीन हाइड्रोजन से किया जाता है। इससे पारंपरिक अमोनिया उत्पादन की तुलना में कार्बन उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी आती है तथा जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता घटती है।
वर्तमान भू-राजनीतिक परिस्थितियों और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियों के बीच ग्रीन हाइड्रोजन और ग्रीन अमोनिया को दीर्घकालिक सस्टेनेबिलिटी तथा आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करने के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जैसे-जैसे दुनिया स्वच्छ ऊर्जा और पर्यावरण अनुकूल मैन्युफैक्चरिंग की ओर बढ़ रही है, भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर विकसित की जाने वाली परियोजनाएं चरणबद्ध तरीके से ग्रीन टेक्नोलॉजी और टिकाऊ ऊर्जा समाधानों को अपना सकती हैं। यह भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं और हरित विकास लक्ष्यों के अनुरूप भी होगा।
मिट्टी में बढ़ते पोषक तत्व असंतुलन तथा ऑर्गेनिक कार्बन और सूक्ष्म पोषक तत्वों के घटते स्तर गंभीर चुनौती बनते जा रहे हैं। इसके समाधान के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए?
मिट्टी का स्वास्थ्य कृषि उत्पादकता का आधार है। मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन और सूक्ष्म पोषक तत्वों के स्तर में लगातार गिरावट दीर्घकाल में कृषि के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रही है। इस चुनौती से निपटने के लिए एक समग्र दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। जैविक खादों, जैव उर्वरकों, फसल अवशेषों, हरी खाद तथा संरक्षण कृषि जैसी पद्धतियों को बड़े पैमाने पर अपनाना आवश्यक है।
इसके साथ ही मृदा परीक्षण को अधिक व्यापक बनाना होगा, ताकि फसलों की वास्तविक जरूरत के अनुसार पोषक तत्वों का उपयोग किया जा सके। किसानों को अधिक इनपुट आधारित कृषि से ज्ञान आधारित कृषि की ओर बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करने की जरूरत है। हमारा उद्देश्य मिट्टी की जीवंतता और उर्वरता को पुनः स्थापित करते हुए उत्पादकता और लाभप्रदता को बनाए रखना होना चाहिए।

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