देश के चीनी उत्पादन में गिरावट, फिर भी यूपी के किसानों को गन्ना मूल्य की घोषणा का इंतजार

गन्ने का दाम सीजन शुरू होने के पहले घोषित हो जाना चाहिए। किसानों की यह अनदेखी तब है जब देश में इस साल गन्ने का उत्पादन गिरने से चीनी उत्पादन तीन साल के निचले स्तर पर रहेगा। वहीं चीनी मिलों को चीनी और एथेनॉल का बेहतर दाम मिलने के चलते उनका मुनाफा भी बेहतर हुआ है। उत्तर प्रदेश के पड़ोसी राज्य हरियाणा की सरकार ने चालू पेराई सीजन के लिए गन्ना भाव में 14 रुपये की बढ़ोतरी के साथ 386 रुपये प्रति क्विटंल का एसएपी तय किया है। जबकि पंजाब सरकार 391 रुपये प्रति क्विटंल गन्ना भाव दे रही है।

देश के चीनी उत्पादन में गिरावट, फिर भी यूपी के किसानों को गन्ना मूल्य की घोषणा का इंतजार

शामली जिले के किसान राजपाल सिंह को पिछले सीजन (2022-23) में शामली चीनी मिल को बेचे गए गन्ने का केवल 15 जनवरी, 2023 तक का भुगतान मिला है जबकि मिल मई तक चली थी। दो साल 2021-22 और 2022-23 से उत्तर प्रदेश में गन्ने का राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) 350 रुपये प्रति क्विंटल ही स्थिर है। पिछले साल एसएपी में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई थी और शामली चीनी मिल के किसानों का आधे से अधिक सीजन के गन्ने का भुगतान बकाया है, वहीं चालू पेराई सीजन 2023-24 (अक्तूबर, 2023 से सितंबर, 2024) के लिए राज्य सरकार ने इस खबर के लिखे जाने तक गन्ने का एसएसपी निर्धारित नहीं किया है। यानी राज्य के राजपाल सिंह जैसे करीब 45 लाख गन्ना किसानों को अभी यह मालूम नहीं है कि उन्होंने चीनी मिलों को पिछले दो माह से अधिक समय से जो गन्ना आपूर्ति की है, उसका क्या दाम उन्हें मिलेगा।

असल में, गन्ने का दाम सीजन शुरू होने के पहले घोषित हो जाना चाहिए। किसानों की यह अनदेखी तब है जब देश में इस साल गन्ने का उत्पादन गिरने से चीनी उत्पादन तीन साल के निचले स्तर पर रहेगा। वहीं चीनी मिलों को चीनी और एथेनॉल का बेहतर दाम मिलने के चलते उनका मुनाफा भी बेहतर हुआ है। उत्तर प्रदेश के पड़ोसी राज्य हरियाणा की सरकार ने चालू पेराई सीजन के लिए गन्ना भाव में 14 रुपये की बढ़ोतरी के साथ 386 रुपये प्रति क्विटंल का एसएपी तय किया है। जबकि पंजाब सरकार 391 रुपये प्रति क्विटंल गन्ना भाव दे रही है।

चालू पेराई सीजन में उत्तर प्रदेश करीब 110 लाख टन चीनी उत्पादन के साथ देश में सबसे अधिक चीनी उत्पादन करने वाला राज्य रहेगा। पिछले साल यहां 104.80  लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ था। इस साल उत्तर प्रदेश का चीनी उत्पादन देश के कुल अनुमानित चीनी उत्पादन करीब 290 लाख टन के एक तिहाई से अधिक रह सकता है। कमजोर मानसून के चलते महाराष्ट्र और कर्नाटक में गन्ने की फसल को नुकसान हुआ है। कमजोर फसल के चलते वहां चीनी उत्पादन 85 लाख टन और 38 लाख रहने का अनुमान उद्योग ने लगाया है। जो पिछले साल महाराष्ट्र में 105.30 लाख टन और कर्नाटक में 59.80 लाख टन रहा था। इन परिस्थितियों में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा चालू सीजन के लिए गन्ने के एसएपी का तय नहीं किया जाना किसानों की मुश्किल तो बढ़ा ही रहा है, चीनी मिलों को भी हैरान कर रहा है।

चीनी उद्योग के सूत्रों ने रूरल वॉयस के साथ एक बातचीत में कहा कि हमें भी इस देरी की कोई वजह नहीं दिख रही है। अभी कोई चुनाव भी नहीं है। जिसकी वजह से देरी हो रही है। अगर सरकार दाम घोषित कर देती है तो हमारे लिए भी स्थिति साफ हो जाएगी कि हमें कितना भुगतान करना है।  राज्य की अधिकांश चीनी मिलें समय से भुगतान कर रही है।  कुछ चीनी मिलें और बजाज हिंदुस्थान जैसा सबसे अधिक क्षमता वाला चीनी मिल समूह भी गन्ना मूल्य भुगतान में पिछड़ा हुआ है।

गन्ना मूल्य को लेकर किसानों की परेशानी भी बढ़ती जा रही है। सरकार पर गन्ना किसानों के प्रति लापरवाही का रवैया अपनाने का आरोप लगाते हुए भारतीय किसान यूनियन ने तय किया है कि पांच जनवरी को उत्तर प्रदेश के सभी जिला मुख्यालयों पर धरना प्रदर्शन करेगी। इस प्रदर्शन की मुख्य वजह गन्ने के एसएपी में बढ़ोतरी नहीं किया जाना है।

चीनी और गुड़ व खांडसारी उद्योग को समझ आ रहा है कि इस साल गन्ने की कमी है और दाम बढ़ेंगे। शामली जिले में ऊन के पास एक अत्याधुनिक गुड़ संयंत्र चलाने वाले उद्यमी केपी सिंह ने रूरल वॉयस को बताया कि वह अभी गन्ने का दाम 340 रुपये प्रति क्विंटल दे रहे हैं और कल यानी 2 जनवरी से हम दाम बढ़ाकर 350 रुपये प्रति क्विंटल कर देंगे। चौबीस घंटे क्षमता के 60 फीसदी पर चल रही उनकी गुड़ इकाई के सारे गुड़ की खपत हो रही है और वह पंजाब को गुड़ की आपूर्ति कर रहे हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ने के दाम 340 रुपये से 370 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गये हैं। ऐसे में सरकार अगर गन्ने के एसएपी में अधिक बढ़ोतरी नहीं करेगी तो चीनी मिलों और गुड़ उद्योग के बीच दाम को लेकर प्रतिस्पर्धा रहेगी। वहीं गुड़ खांडसारी इकाइयों में जल्द भुगतान के चलते किसान चीनी मिलों को आपूर्ति कम कर सकते हैं।

गन्ने के एसएपी को लेकर उत्तर प्रदेश की मौजूदा भाजपा नेतृत्व सरकार का रवैया उदासीनता भरा रहा है। साल 2017 में सत्ता में आई भाजपा सरकार ने पहली बार 2017-18 में गन्ने के एसएपी में 10 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी कर इसे 325 रुपये प्रति क्विंटल तय किया था। वहीं उसके बाद तीन सीजन में गन्ने का एसएपी फ्रीज रखा था। यहां तक कि 2020-21 के किसान आंदोलन के दौरान भी राज्य सरकार ने दाम नहीं बढ़ाया था। उसके बाद 2022 के राज्य विधान सभा चुनाव के पहले एसएपी में 25 रुपये की बढ़ोतरी कर इसे 350 रुपये प्रति क्विंटल तय किया था। उसके बाद 2022-23 सीजन में भी इसे 201-22 पेराई सीजन के 350 रुपये प्रति क्विटंल दाम पर ही फ्रीज रखा था। जबकि पड़ौसी राज्य हरियाणा सरकार ने इसे बढ़ाकर 372 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया था। यानी छह साल में मात्र 35 रुपये प्रति क्विटंल की बढ़ोतरी उत्तर प्रदेश सरकार ने की है। जबकि इस दौरान गन्ना उत्पादन की हर तरह की लागत में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है जिसके चलते किसानों की आय प्रभावित हुई है।

साल 2024 में लोक सभा के चुनाव हैं और भारतीय जनता पार्टी के लिए उत्तर प्रदेश की 80 लोक सभा सीटें बहुत अहम हैं। राज्य के 45 लाख गन्ना किसान एक बड़ा वोट बैंक हैं लेकिन जिस तरह से पिछले चुनावों के नतीजे रहे हैं उनसे लगता है कि राज्य की गन्ना राजनीति अब कमजोर हो गई है। मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बसपा ने गन्ना किसानों के दाम को लेकर कोई बड़ा प्रदर्शन या विरोध नहीं किया। थोड़ा बहुत राष्ट्रीय लोक दल ही इस मुद्दे पर बोलता रहा है लेकिन  इस साल उसका भी गन्ना एसएपी को लेकर कोई बड़ा प्रदर्शन या विरोध देखने को नहीं मिला है।

भारतीय किसान यूनियन पांच जनवरी को प्रदेश में प्रदर्शन करेगी वह राज्य सरकार पर कितना दबाव बना पाएगी, यह देखना होगा। हालांकि यह ज्यादातर स्टेकहोल्डर मान रहे हैं कि इस साल सरकार एसएपी में बढ़ोतरी करेगी। लेकिन कब करेगी यह अपने आप में एक रहस्य की तरह है क्योंकि मौजूदा परिस्थिति में एसएपी तय करने में देरी करने और दाम नहीं बढ़ाने की कोई वजह नहीं दिखती है। लेकिन यह भी सच है कि जैसा शामली जिले के किसान राजपाल सिंह की स्थिति है, पारदर्शी नीति के अभाव में राज्य के लाखों गन्ना किसानों की मुश्किल एक जैसी ही है। जब दाम बेहतर मिल सकता है और समय से मिल सकता है तब भी सरकार की यह उदासीनता न किसानों के लिए अच्छी है और न ही उद्योग के हित में है। 

 

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