महाराष्ट्र में केले की फसल के नुकसान के सर्वे में देरी से किसान नाराज, बोले- एक महीने तक खेत कैसे खाली रखें

महाराष्ट्र में आंधी-बारिश से 18,121 हेक्टेयर में केले की फसल नष्ट होने के करीब तीन हफ्ते बाद सरकार ने ड्रोन सर्वे के आदेश दिए हैं। लेकिन सर्वे में इतनी देरी से किसान नाराज हैं। उनका कहना है कि इतने लंबे समय तक वे खेत खाली नहीं छोड़ सकते।

महाराष्ट्र में केले की फसल के नुकसान के सर्वे में देरी से किसान नाराज, बोले- एक महीने तक खेत कैसे खाली रखें

महाराष्ट्र में जून की शुरुआत में आंधी-बारिश के कारण केले की फसल को जो नुकसान हुआ, राज्य सरकार उसका सर्वे ड्रोन से करवाने जा रही है। लेकिन नुकसान के तीन हफ्ते बाद सर्वे के इस आदेश से किसान नाखुश हैं। उनका कहना है कि सर्वे के इंतजार में कोई भी किसान अपना खेत इतने दिनों तक खाली नहीं रख सकता। वह गिरे हुए पौधे हटा कर नए सिरे से खेती शुरू कर देता है।

राज्य के कृषि विभाग के अनुसार मई और जून में आंधी-बारिश की वजह से 61004 हेक्टेयर क्षेत्र में फसलों को नुकसान हुआ। इसमें से 18121 हेक्टेयर क्षेत्र में केले की फसल तबाह हो गई। लेकिन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने मंगलवार, 23 जून को कृषि और आपदा प्रबंधन विभाग के अधिकारियों को ड्रोन से सर्वे कराने के निर्देश दिए। मुख्यमंत्री का कहना था कि ड्रोन के जरिए फसल नुकसान का सही आकलन किया जा सकेगा। इससे बीमा कंपनियों को बिना किसी परेशानी के मुआवजा देने में मदद मिलेगी।

कृषि विभाग के अनुसार जून के पहले सप्ताह में खराब मौसम के कारण 14 जिलों में 18908 हेक्टेयर क्षेत्र में केले की फसल को नुकसान हुआ। जलगांव जिले में सबसे अधिक 5471 हेक्टेयर में केले की फसल खराब हुई। नुकसान वाले दूसरे प्रमुख जिलों में सोलापुर शामिल है, जहां 4110 हेक्टेयर में फलों की खेती बर्बाद हो गई। भारत में हर साल 300 से 330 लाख टन केले की पैदावार होती है। महाराष्ट्र इसका सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है, जहां 13 से 14 प्रतिशत उत्पादन होता है। 

सोलापुर जिले के किसान गणेश वाघ ने रूरल वॉयस को बताया कि वे पांच एकड़ क्षेत्र में केले की खेती करते हैं। इसमें से ढाई एकड़ में खड़ी फसल बारिश और तूफान से नष्ट हो गई। उन्होंने बताया कि उनके खेत में पौधों में फूल आ रहे थे और दो महीने में हार्वेस्टिंग हो जाती। गणेश का कहना है कि ढाई एकड़ में उन्हें कम से कम नौ लाख रुपये का नुकसान हुआ है। इस समय बाजार भाव 30 प्रति किलो का है, इस आधार पर देखें तो नुकसान करीब 20 लाख रुपये बैठता है।

गणेश ने बताया कि फसल गिरने के तीन सप्ताह बीत जाने पर भी अभी तक उनके इलाके में नुकसान का सर्वे नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि सर्वे तत्काल होना चाहिए क्योंकि फसल गिरने के बाद किसान पुराने पौधों को हटाकर नए पौधे लगाते हैं। सर्वे के इंतजार में किसान इतने लंबे समय तक नहीं बैठ सकते। उन्होंने यह भी बताया कि पहले जलगांव में सर्वे होगा उसके बाद दूसरे इलाकों में। इस तरह सोलापुर में सर्वे होने में डेढ़ से दो महीने निकल जाएंगे और इतने दिनों तक कोई भी किसान अपने खेत को खाली नहीं छोड़ सकता।

सोलापुर जिले के ही किसान दत्तात्रेय मुळे पाटील ने बताया कि उनकी पांच एकड़ में केले की फसल को तो नुकसान कम हुआ, लेकिन आसपास के क्षेत्र में कम से कम 1000 हेक्टेयर में फसल नष्ट हो गई है। उन्होंने बताया कि अभी भाव 25 से 30 रुपये प्रति किलो है। इस लिहाज से प्रति हेक्टेयर 15 लाख से 20 लाख रुपये का नुकसान किसानों को हुआ है।

पाटील ने बताया कि अभी उनके इलाके में नुकसान का कोई सर्वे नहीं हुआ है। कुछ अधिकारी आए थे और उन्होंने एक हेक्टेयर के लिए 22,500 रुपये का मुआवजा देने की बात कही। लेकिन गिरे हुए पेड़ों को हटाने में ही इससे ज्यादा खर्च हो जाएगा।

सोलापुर जिले के एक और किसान सुरेश पेनुरकर भी करीब पांच एकड़ में केले की खेती करते हैं। उनकी फसल को भी कोई खास नुकसान नहीं हुआ। उन्होंने बताया कि जिले में भीमा-सिना नदी के आसपास पंढरपुर तथा अन्य इलाकों में केले की खेती अधिक होती है। एक अनुमान के अनुसार सोलापुर में करीब 7700 हेक्टेयर यानी लगभग 19000 एकड़ में केले की खेती होती है।

केले का पौधा लगाने से हार्वेस्टिंग तक करीब 11 महीने लगते हैं। दत्तात्रेय पाटील ने बताया कि वैसे तो पूरे साल केले के पौधे लगाए जाते हैं और लेकिन सोलापुर इलाके में अगस्त-सितंबर में प्लांटेशन अधिक होता है। जलगांव में प्लांटेशन दिसंबर से फरवरी तक और नांदेड़ में जून-जुलाई में अधिक होता है।

पाटील ने बताया कि पिछले साल केले की फसल अच्छी थी और भाव 27 रुपये किलो तक पहुंच गए थे। लेकिन दिवाली से ठीक पहले दाम घटकर सात-आठ रुपये किलो तक आ गए। किसानों को पौधा लगाने से हार्वेस्टिंग तक प्रति हेक्टेयर करीब चार लाख रुपये का खर्च आता है, जबकि सात-आठ रुपये किलो की दर से उन्हें मुश्किल से पांच लाख रुपये मिले। जनवरी-फरवरी में रेट तो बढ़े, लेकिन ईरान युद्ध के कारण निर्यात बंद होने से दाम फिर गिर गए। पाटील के अनुसार नुकसान के कारण केले की खेती करने वाले करीब 70% किसान इसकी खेती छोड़ चुके हैं और वे गन्ना, अमरूद जैसी दूसरी फसलों की ओर जा रहे हैं।

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