मशीनें होने के बावजूद पंजाब के किसान क्यों जला रहे हैं पराली? CEEW के शोध ने बताई असली वजह

काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (CEEW) के एक शोध में पाया गया है कि पंजाब के एक-तिहाई किसान मशीनों की उपलब्धता के बावजूद पराली जला रहे हैं। कीटों के हमले का डर, बुवाई के लिए सीमित समय और सरकार की अप्रभावी संवाद व्यवस्था इसके प्रमुख कारण हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि किसानों का भरोसा फिर से जीतना और उनके साथ प्रभावी संवाद स्थापित करना बेहद जरूरी है।

मशीनें होने के बावजूद पंजाब के किसान क्यों जला रहे हैं पराली? CEEW के शोध ने बताई असली वजह

स्नेहिल चौबे

हर साल सर्दियों में घना धुआं दिल्ली और आसपास के इलाकों को अपनी चपेट में ले लेता है। इसके लिए अक्सर उत्तर-पश्चिम भारत के किसानों के फसल अवशेष जलाने को जिम्मेदार ठहराया जाता है। इस समस्या को रोकने के लिए सरकार भारी-भरकम धनराशि खर्च करती रही है। वर्ष 2018 से केंद्र सरकार ने फसल अवशेष प्रबंधन (Crop Residue Management) योजना के तहत 4,237 करोड़ रुपये से अधिक वितरित किए हैं। राज्यों में 3.53 लाख से अधिक विशेष मशीनें उपलब्ध कराई गईं और 43,535 से अधिक कस्टम हायरिंग सेंटर स्थापित किए गिए, फिर भी समस्या बरकरार है।

आम तौर पर उपग्रह के आंकड़े बड़े पैमाने पर लगने वाली आग की घटनाओं में सामान्य गिरावट दिखाते हैं। इसके बावजूद हवा जहरीली बनी रहती है। अक्टूबर और नवंबर के दौरान दिल्ली में पीएम 2.5 (PM 2.5) प्रदूषण का लगभग 30 से 35 प्रतिशत हिस्सा खेतों में लगाई गई आग के धुएं से आता है।

काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (CEEW) के एक हालिया शोध ने इस समस्या का चौंकाने वाला जवाब दिया है। इसके मुताबिक संकट केवल किसानों को मशीनें उपलब्ध कराने का नहीं है। असली संकट मानव मनोविज्ञान, गहरे बैठे डर और सरकारी संवाद व्यवस्था की विफलता से जुड़ा हुआ है।

कितने किसान जलाते हैं पराली 

यह धारणा गलत है कि जिस किसान के पास मशीन है, वह पराली जलाना बंद कर देता है। शोध में पाया गया कि सर्वेक्षण में शामिल 63 प्रतिशत किसानों ने पूरी तरह से पराली जलाना बंद कर दिया है। दूसरी तरफ, केवल 6 प्रतिशत किसान पूरी पराली जलाते हैं।

असल समस्या बीच की श्रेणी में है। 31 प्रतिशत किसान "आंशिक रूप से पराली जलाने वाले" हैं। इसका मतलब है कि हर तीन में से एक किसान मशीन किराए पर लेता है या उसके पास मशीन होती है। वह भारी मशीन से खेत में फसल अवशेष का प्रबंधन करता है, लेकिन उसके बाद बची हुई पराली में आग लगा देता है।

सरकारी उपग्रह इन आग की कई घटनाओं को दर्ज ही नहीं कर पाते। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के विश्लेषण से पता चलता है कि किसान अब आग लगाने का समय बदल रहे हैं। वे सरकार की निगरानी से बचने के लिए उस समय खेतों में आग लगाते हैं, जब उपग्रह उन्हें रिकॉर्ड नहीं कर पाते। इसलिए आग की कम दर्ज हुई घटनाएं जमीनी हकीकत को सही तरीके से नहीं दर्शातीं।

कीटों के हमले का डर

किसानों ने पराली जलाना क्यों जारी रखा है? इसका सबसे बड़ा कारण कीटों का डर है। जो किसान अब भी पराली जलाते हैं, उनमें से 67 प्रतिशत का कहना है कि वे अगली गेहूं की फसल को कीटों के हमले से बचाने के लिए ऐसा करते हैं। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से 57 प्रतिशत किसानों ने स्वीकार किया कि उन्होंने अपने खेतों में कभी वास्तविक कीट प्रकोप देखा ही नहीं। वे केवल अन्य किसानों की बातों और अफवाहों के आधार पर खेती से जुड़े निर्णय लेते हैं। यदि किसी पड़ोसी किसान की फसल कीटों से खराब होने की एक अफवाह भी फैल जाए, तो वह सरकारी सलाह से कहीं अधिक प्रभावी साबित होती है। इसलिए किसान केवल सुरक्षित महसूस करने के लिए पराली जला देते हैं।

आग की वास्तविक कीमत

फसल अवशेष जलाने से भूमि को गंभीर नुकसान पहुंचता है। एक टन धान की पराली जलाने से 5.5 किलोग्राम नाइट्रोजन, 2.3 किलोग्राम फॉस्फोरस, 25 किलोग्राम पोटाश और 1.2 किलोग्राम सल्फर नष्ट हो जाते हैं। आग की अत्यधिक गर्मी मिट्टी में मौजूद लाभकारी जीवाणुओं और फफूंद (फंगस) को भी समाप्त कर देती है। भारत में पराली जलाने से होने वाले वायु प्रदूषण की कुल आर्थिक लागत का अनुमान हर वर्ष लगभग 30 अरब डॉलर लगाया गया है। इससे मिट्टी के बहुमूल्य पोषक तत्वों का नुकसान होता है।

कटाई के बाद केवल 15 दिनों का समय

किसानों पर पड़ने वाले समय के भारी दबाव को भी समझना जरूरी है। भूजल संरक्षण के उद्देश्य से बनाया गया पंजाब प्रिजर्वेशन ऑफ सबसॉइल वाटर एक्ट में (Punjab Preservation of Subsoil Water Act) धान की बुवाई को कानूनी रूप से मानसून के मौसम तक टालने का प्रावदान है। इस कानून से भूजल संरक्षण में सफलता मिली है।

लेकिन इसका परिणाम यह हुआ कि पूरी फसल कटाई का कार्यक्रम साल के अंत तक खिसक गया। इससे किसानों के पास धान की कटाई और रबी की गेहूं की बुवाई के बीच केवल 10 से 15 दिनों का बेहद सीमित समय बचता है।

यदि किसान पराली को प्राकृतिक रूप से सड़ने दें, तो इसमें काफी समय लगेगा। गेहूं की बुवाई में थोड़ी भी देरी उत्पादन को गंभीर रूप से प्रभावित करती है। किसान पर समय का अत्यधिक दबाव होता है। आग लगाने से खेत कुछ घंटों में साफ हो जाता है। इसलिए किसान अपनी आय सुरक्षित रखने के लिए सबसे तेज उपलब्ध तरीका अपनाता है।

संवाद व्यवस्था की बड़ी विफलता

सरकार जागरूकता अभियानों के जरिए इन आशंकाओं को दूर करने की कोशिश करती है, लेकिन ये अभियान पूरी तरह विफल रहे हैं। सरकार किसानों को भागीदार की बजाय अपराधी की तरह देखती है। सरकारी प्रचार सामग्री में चेतावनी और जुर्माने की भाषा का इस्तेमाल किया जाता है। किसान इस तरीके को स्वीकार नहीं करते। वे फसल उत्पादन और मिट्टी की सेहत के आधार पर निर्णय लेते हैं। उन्हें कृषि संबंधी व्यावहारिक सलाह चाहिए, न कि केवल चेतावनी।

वर्ष 2024-25 के लिए पंजाब सरकार ने फसल अवशेष प्रबंधन योजना के तहत 375 करोड़ रुपये आवंटित किए। लेकिन इसमें से किसानों तक प्रभावी संवाद स्थापित करने के लिए केवल 4.5 करोड़ रुपये खर्च करने का प्रावधान किया गया। यह पूरी योजना के बजट का मात्र 1.3 प्रतिशत है।

बजट आवंटन की श्रेणी

आवंटन

योजना का कुल बजट

375 करोड़ रुपये

संचार व्यय

4.5 करोड़ रुपये

प्रिंटेड पर्चे

संचार व्यय का 6.15 प्रतिशत

खेत में प्रदर्शन

संचार व्यय का 6.59 प्रतिशत

राज्य सरकार छपे हुए पर्चों पर पैसा खर्च करती है, जबकि सर्वेक्षण से साबित हुआ कि किसानों तक पहुंच बनाने के मामले में पर्चे सबसे कम प्रभावी माध्यम हैं। सरकार ने किसानों को मशीन किराए पर लेने में मदद के लिए उन्नत किसान (Unnat Kisan) नाम का डिजिटल ऐप शुरू किया। लेकिन सर्वेक्षण में शामिल 86 प्रतिशत किसानों ने इसका नाम तक नहीं सुना था।

सरकार मशीनों के उपयोग का प्रशिक्षण भी आयोजित करती है। इसके बावजूद 78 प्रतिशत किसान किसी भी प्रशिक्षण कार्यक्रम की जानकारी से पूरी तरह अनजान हैं। जो किसान प्रशिक्षण में शामिल हुए, उनमें भी गहरी असंतुष्टि देखी गई। प्रशिक्षण लेने वाले 73 प्रतिशत किसानों ने बताया कि पूरा प्रशिक्षण केवल व्याख्यान आधारित था। किसान केवल कक्षा में बैठकर अपने खेतों में जटिल मशीन चलाना नहीं सीख सकते।

सामाजिक व्यवहार का अंतर

सामाजिक प्रभाव लोगों के व्यवहार को किस तरह प्रभावित करता है, इसे समझना भी जरूरी है। यह शोध किसानों की सोच और उनके व्यवहार के बीच बड़ा विरोधाभास उजागर करता है। सर्वेक्षण में शामिल 90 प्रतिशत किसान व्यक्तिगत रूप से पराली जलाने का विरोध करते हैं। वे पर्यावरण और स्वास्थ्य पर इसके दुष्प्रभावों को समझते हैं।

लेकिन 73 प्रतिशत किसान बताते हैं कि उन्होंने अपने पड़ोसियों को पराली जलाते हुए देखा है। आसपास के खेतों में लगातार लगती आग इसे सामान्य बना देती है। यह दृश्य सामूहिक प्रयासों को कमजोर कर देता है। यदि पूरा गांव पराली जला रहा हो, तो कोई भी किसान टिकाऊ खेती अपनाने में समय और पैसा लगाने के लिए तैयार नहीं होता।

दोबारा भरोसा बनाने की जरूरत

खराब संवाद व्यवस्था के सहारे कृषि संकट का समाधान नहीं किया जा सकता। जब किसानों को मशीन की जरूरत होती है, तो वे जटिल सरकारी पोर्टल का उपयोग नहीं करते। मशीन किराए पर लेने वाले 56 प्रतिशत किसान सीधे अपने पड़ोसियों से मशीन प्राप्त करते हैं। केवल 34 प्रतिशत किसान सरकारी कस्टम हायरिंग सेंटर का उपयोग करते हैं। किसान एक-दूसरे पर भरोसा करते हैं। वे स्थानीय कृषि अधिकारियों पर भी विश्वास करते हैं। कृषि विस्तार अधिकारियों के खाते जाने पर 62 प्रतिशत किसानों ने भरोसा जताया।

सरकार को इस शोध से मिले आंकड़ों के आधार पर कदम उठाने चाहिए। सामान्य पोस्टर और पर्चों पर पैसा खर्च करने के बजाय धनराशि का उपयोग खेतों में शिविर आयोजित करने और व्यावहारिक प्रदर्शन पर किया जाना चाहिए। इन अभियानों की शुरुआत अगस्त में हो ताकि कटाई के सीमित समय से पहले किसानों की आशंकाओं को दूर किया जा सके।

पूरे क्षेत्र में एक जैसा संदेश प्रसारित करने की बजाय लक्षित अभियान चलाने की जरूरत है। जिन इलाकों में पराली जलाने की घटनाएं अधिक हैं, वहां आमने-सामने संवाद के जरिए आक्रामक हस्तक्षेप की जरूरत है ताकि वर्षों से चली आ रही आदतों को बदला जा सके। वहीं जहां आंशिक रूप से पराली जलाई जाती है, वहां किसानों को कीट नियंत्रण के संबंध में ठोस तकनीकी भरोसा दिलाना होगा।

सरकार को किसानों को यह भरोसा दिलाना होगा कि उपलब्ध मशीनें प्रभावी हैं और कीटों का खतरा वास्तविकता की तुलना में कहीं अधिक बढ़ा-चढ़ाकर माना जाता है। किसानों का भरोसा दोबारा जीतना और उनकी वास्तविक आशंकाओं का समाधान करना आवश्यक है। जब तक संवाद की रणनीति नहीं बदलेगी, तब तक सर्दियों का आसमान धुएं से ढका ही रहेगा।

(स्नेहिल चौबे दिल्ली स्थित डॉ. बी.आर. आंबेडकर विश्वविद्यालय के पब्लिक पॉलिसी एंड गवर्नेंस में मास्टर्स की दूसरे वर्ष की छात्रा हैं। अभी वे रूरल वॉयस में इंटर्नशिप कर रही हैं)

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