कपास उत्पादकता बढ़ाने में रासी सीड्स की नई पहल

रासी सीड्स के चेयरमैन डॉ. एम. रामासामी का कहना है कि बीटी हाइब्रिड ने भारत की कपास उत्पादकता को बदलने में अहम भूमिका निभाई, लेकिन पिंक बॉलवर्म के बढ़ते प्रतिरोध से पैदावार में लंबे समय से गिरावट आई है। उन्होंने नई पीढ़ी की बीटी तकनीक, HDPS, कम दूरी पर बुवाई, मशीनीकरण और बेहतर नीतिगत समर्थन पर जोर दिया।

कपास उत्पादकता बढ़ाने में रासी सीड्स की नई पहल

रासी सीड्स 50 वर्ष पुरानी भारतीय बीज कंपनी है, जिसके पास विश्वस्तरीय अनुसंधान एवं विकास, उत्पादन, बिक्री एवं विपणन क्षमता है। रासी कपास और अन्य प्रमुख फसलों में उत्कृष्टता के लिए जानी जाती है और अपने गुणवत्तापूर्ण उत्पाद पोर्टफोलियो के माध्यम से भारत के प्रमुख कृषि क्षेत्रों में मजबूत उपस्थिति दर्ज करा चुकी है।

रासी सीड्स वर्ष 1988 से कपास अनुसंधान और नवाचार में अग्रणी रही है। कंपनी ने अधिक उपज, कीटरोधी, जलवायु अनुकूल और बेहतर फाइबर गुणवत्ता वाली संकर किस्में विकसित की हैं। गैर-बीटी संकर किस्मों के विकास से लेकर बीटी तकनीक, उच्च घनत्व वाली रोपण प्रणाली (HDPS) और मशीनीकरण आधारित ब्रीडिंग तकनीकों को आगे बढ़ाने तक, रासी ने कपास की उत्पादकता, लाभप्रदता, फाइबर क्वालिटी और टिकाऊपन को बेहतर बनाने में योगदान किया है। इससे किसानों को लाभ हुआ और भारत के कपास उत्पादन तथा टेक्सटाइल इकोनॉमी को भी मजबूती मिली है।

पिछले तीन दशकों में रासी सीड्स ने भारत में कपास की संकर किस्मों का बड़ा नेटवर्क स्थापित किया है। भारत में कपास की खेती लगभग 114 लाख हेक्टेयर में होती है, जिसमें 20-30 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में रासी की संकर किस्मों की खेती हुई है। इससे 20 लाख से अधिक किसान जुड़े रहे हैं। रासी की संकर किस्मों को किसानों के बीच व्यापक स्वीकार्यता मिली है।

1. तकनीक का आगमन : बोलगार्ड और संकर किस्म

प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भारत ने मार्च 2002 में जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी के माध्यम से कपास की व्यावसायिक खेती के लिए बीटी कपास को मंजूरी दी थी। यह देश की पहली आनुवंशिक रूप से संशोधित फसल थी। रासी की RCH2 बीटी तकनीक वाली पहली और व्यावसायिक रूप से सफल संकर किस्म बनी।

वर्ष 2002-03 में भारत में 76.67 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में कपास की खेती होती थी। इससे 136 लाख गांठ कपास का उत्पादन हुआ और उत्पादकता 302 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर थी। बीटी कपास के व्यावसायिक उपयोग की शुरुआत के समय संकर कपास का हिस्सा कुल कपास क्षेत्र का करीब 40 प्रतिशत था। किसानों ने बीटी तकनीक को तेजी से अपनाया क्योंकि इससे कीटनाशकों के उपयोग और उत्पादन लागत में उल्लेखनीय कमी आई तथा कीटों के कारण फसल को होने वाले नुकसान को कम करने में मदद मिली। तकनीक और संकर किस्मों के आने से किसानों के लिए कपास की खेती आसान हुई। इसके व्यापक उपयोग से संकर कपास के रकबे में वृद्धि हुई।

वर्ष 2013-14 तक कपास का क्षेत्र बढ़कर 119.6 लाख हेक्टेयर हो गया। उत्पादन 398 लाख गांठ तक पहुंच गया और उत्पादकता बढ़कर 566 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गई। इस अवधि में बीटी संकर किस्मों का हिस्सा कुल कपास क्षेत्र के करीब 95 प्रतिशत तक पहुंच गया था।

2002-03 और 2013-14 के बीच कपास के रकबे में 56 प्रतिशत, उत्पादन में 193 प्रतिशत और उत्पादकता में 88 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इस उल्लेखनीय वृद्धि में संकर किस्मों और बीटी तकनीक की प्रमुख भूमिका रही। बीटी तकनीक ने कीटों से फसल को होने वाले नुकसान को नियंत्रित किया। हाइब्रिड शक्ति और बीटी तकनीक के इस समन्वित प्रभाव से भारत की कपास उत्पादकता में उल्लेखनीय सुधार हुआ। इससे भारत कपास की कमी वाले देश से दुनिया के प्रमुख कपास उत्पादक देशों में शामिल हो गया

2. उत्पादन में ठहराव और 100 लाख गांठ की गिरावट क्यों?

बीटी तकनीक का प्रभाव धीरे-धीरे कम होने लगा और 2015-16 के दौरान प्रमुख कपास उत्पादक क्षेत्रों में पिंक बॉलवर्म के व्यापक प्रकोप के बाद इसके कमजोर पड़ने को आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया गया। परिणामस्वरूप पिछले कुछ वर्षों में कपास की उत्पादकता लगभग स्थिर बनी रही और पिछले 7-8 वर्षों के दौरान इसमें गिरावट शुरू हो गई। इसका प्रमुख कारण कोई बड़ी तकनीकी सफलता सामने न आना है।

2024-25 में कपास के क्षेत्रफल में तो लगभग छह लाख हेक्टेयर की मामूली कमी आई, लेकिन उत्पादकता 566 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से घटकर 440 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रह गई। इससे कुल उत्पादन 398 लाख गांठ से घटकर 290 लाख गांठ रह गया। यह गिरावट पिंक बॉलवर्म के कारण होने वाले नुकसान को दर्शाता है। पिंक बॉलवर्म ने मौजूदा बीटी तकनीक का प्रतिरोध विकसित कर लिया है। हालांकि संकर किस्में अपनी बेहतर आनुवंशिक उपज क्षमता के कारण उत्पादकता को बनाए रखने में अब भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

पिंक बॉलवर्म का प्रकोप कई अन्य समस्याएं भी पैदा करता है। प्रभावित पौधों में बॉल रॉट यानी सड़न बढ़ती है, फाइबर की गुणवत्ता खराब होती है और कपास चुनने में कठिनाई आती है। इससे चुनाई की लागत बढ़ती है और किसानों को उपज का कम मूल्य मिलता है। इन चुनौतियों के कारण अनेक किसानों ने ऐसी वैकल्पिक फसलों का रुख किया जिनकी खेती अपेक्षाकृत आसान है और जिनमें उत्पादन जोखिम कम है। परिणामस्वरूप, किसानों में कपास की खेती को लेकर भय और अरुचि बढ़ रही है।

3. उत्पादकता बढ़ाने के लिए रासी की पहल क्या है?

भारत में कपास के उत्पादन में वृद्धि के दो सबसे महत्वपूर्ण आधार रहे हैं - संकर कपास और बीटी तकनीक। उत्पादकता में मौजूदा ठहराव को दूर करने, कीटों की उभरती चुनौतियों से निपटने और कपास की खेती को आसान बनाने के लिए रासी सीड्स ने दो प्रमुख पहल शुरू की हैं - नेक्स्ट जेनरेशन बीटी तकनीक और रासी मैक्स (RASI MAX) प्रोजेक्ट।

नेक्स्ट-जेनरेशन बीटी तकनीक

रासी ने बोलगार्ड-II प्रतिरोधी पिंक बॉलवर्म से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए नेक्स्ट जेनरेशन बीटी तकनीक विकसित की है। यह एक भारतीय कंपनी द्वारा, भारतीय वैज्ञानिकों के प्रयासों से विकसित स्वदेशी तकनीक है, जिसे विशेष रूप से भारतीय कपास किसानों के सामने मौजूद चुनौतियों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। यह तकनीक फिलहाल रेगुलेटरी मंजूरी की प्रक्रिया के तहत जैव-सुरक्षा परीक्षणों से गुजर रही है। इसके व्यवसायीकरण के बाद पिंक बॉलवर्म से भारतीय किसानों के सामने मौजूद कठिनाइयों को दूर करने और इस कीट से फसल के नुकसान को रोकने में मदद मिल सकती है। इससे किसानों का कपास की खेती पर भरोसा फिर से मजबूत हो सकता है।

रासी मैक्स प्रोजेक्ट

रासी मैक्स उपज को बढ़ाने वाली पहल है, जिसे उत्पादकता में मौजूदा ठहराव को दूर करने के लिए तैयार किया गया है। यह परियोजना प्रति इकाई क्षेत्र अधिकतम उत्पादकता हासिल करने के लिए उच्च घनत्व रोपण प्रणाली (एचडीपीएस) और कम दूरी (क्लोजर स्पेसिंग) को बढ़ावा देती है। इसका उद्देश्य कपास उत्पादन में संपूर्ण मशीनीकरण की नींव तैयार करना भी है। इसके लिए एचडीपीएस के अनुकूल संकर किस्मों के साथ उच्च जिनिंग    आउट टर्न (GOT), सटीक कृषि तकनीक, प्लांट ग्रोथ रेगुलेटर (PGR) आधारित कैनोपी प्रबंधन और मशीन से हार्वेस्टिंग के लिए डिफोलिएशन प्रबंधन को बढ़ावा दिया जा रहा है।

मशीनीकरण को बढ़ावा

रासी सीड्स उन एग्री-टेक स्टार्टअप्स को सक्रिय रूप से समर्थन देती है, जो किफायती प्लांटर, हार्वेस्टर, डिफोलिएशन समाधान और सटीक खेती की तकनीक विकसित कर रहे हैं। इसका उद्देश्य मशीनीकरण की गति बढ़ाना और खेत स्तर पर कपास की उत्पादकता में सुधार करना है।

नेक्स्ट जेनरेशन बीटी तकनीक, एचडीपीएस, संपूर्ण मशीनीकरण और उच्च जीओटी वाली संकर किस्मों को एक साथ जोड़कर इन पहलों का लक्ष्य भारत की कपास उत्पादकता को बढ़ाना और ऐसी उपज हासिल करना है, जो वैश्विक औसत के बराबर या उससे अधिक हो।

4. कपास उत्पादकता मिशन

भारत सरकार ने कपास क्षेत्र को पुनर्जीवित करने और राष्ट्रीय स्तर पर उत्पादकता बढ़ाने के मकसद से 2026-27 से 2030-31 की अवधि के लिए कपास उत्पादकता मिशन शुरू किया है। इसे आधिकारिक तौर पर ‘कपास क्रांति’ नाम दिया गया है। इस मिशन के लिए 5,960 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित है। मिशन में एचडीपीएस, कम दूरी, अधिक लंबे रेशे और एकीकृत फसल प्रबंधन (आईसीएम) को बढ़ावा देने पर जोर है। मिशन का लक्ष्य बेहतर उत्पादन तकनीक और वैज्ञानिक तरीके से फसल प्रबंधन उपायों को बड़े पैमाने पर अपनाकर उपज बढ़ाना है। इसके तहत कपास उत्पादन को बढ़ाकर 498 लाख गांठ और उत्पादकता को बढ़ाकर 755 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर करने का लक्ष्य है।

5. मिशन के लक्ष्य हासिल करने के लिए किस तरह के सहयोग की जरूरत है?

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि किसान कपास की खेती को लेकर उत्साहित क्यों नहीं हैं। पिंक बॉलवर्म का प्रभावी नियंत्रण करके कपास की खेती को आसान बनाना होगा। इससे पेस्टीसाइड छिड़काव पर होने वाला खर्च कम होगा और उपज में 25 प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है। इससे सकल आय में भी लगभग 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी होगी, और किसानों में कपास की खेती का रकबा बढ़ाने में रुचि पैदा होगी। इससे उत्पादन स्तर को बढ़ाकर 560 किलोग्राम और कुल उत्पादन को 400 लाख गांठ तक पहुंचाने में मदद मिल सकती है।

इसके बाद सरकार द्वारा निर्धारित 755 किलोग्राम लिंट प्रति हेक्टेयर के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए एचडीपीएस और क्लोजर स्पेसिंग प्रणाली पर विशेष ध्यान देना होगा। इसके अलावा, मशीनों के इस्तेमाल को रोपण की प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए। बड़ी संख्या में रोपण और हार्वेस्टिंग मशीनों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए व्यापक समर्थन की जरूरत होगी। हालांकि, मिशन के संदर्भ में सरकार की मंशा और इस दिशा में प्रस्तावित उपाय अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं।

हमारा यह अनुरोध भी है उच्च घनत्व रोपण प्रणाली, कम दूरी और मशीनीकरण को तेजी से अपनाने के लिए उपयुक्त इनपुट सब्सिडी और प्रोत्साहनों के माध्यम से नीतिगत समर्थन दिया जाए। किफायती प्लांटर, हार्वेस्टर, प्री-क्लीनर और डिफोलिएशन रसायनों की उपलब्धता के लिए समर्थन विशेष रूप से महत्वपूर्ण होगा। इससे छोटे और सीमांत किसानों के लिए भी कपास की मशीनीकृत खेती को संभव बनाने में मदद मिलेगी।

(लेखक रासी सीड्स प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन हैं)

 

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