अगस्त के आखिर तक मानसूनी बारिश 14% कम, पूर्वोत्तर और दक्षिणी भारत सबसे ज्यादा प्रभावित; अल नीनो का खतरा बढ़ा

29 अगस्त तक भारत में मानसूनी बारिश सामान्य से 14% कम रही है। पूर्व और पूर्वोत्तर भारत में 27% तथा दक्षिणी प्रायद्वीप में 23% बारिश की कमी दर्ज की गई, जबकि मध्य भारत में स्थिति लगभग सामान्य है।

अगस्त के आखिर तक मानसूनी बारिश 14% कम, पूर्वोत्तर और दक्षिणी भारत सबसे ज्यादा प्रभावित; अल नीनो का खतरा बढ़ा

भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून अगस्त के अंत तक कमजोर और बेहद असमान बना हुआ है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के अनुसार, 1 जून से 29 अगस्त 2026 तक देश में 592.4 मिमी बारिश हुई, जबकि सामान्य बारिश 686.8 मिमी होती है। इस तरह देश में मानसूनी बारिश सामान्य से 14% कम है।

मानसून की बारिश में कमी के साथ इसकी क्षेत्रीय असमानता भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। जहां मध्य भारत में बारिश लगभग सामान्य है, वहीं पूर्व और पूर्वोत्तर भारत तथा दक्षिणी प्रायद्वीप में 20% से अधिक की कमी दर्ज की गई है। IMD के ताजा पूर्वानुमान से संकेत मिलता है कि सितंबर की शुरुआत में भी प्रायद्वीपीय भारत में बारिश की गतिविधियां कमजोर रह सकती हैं।

पूर्व और पूर्वोत्तर भारत में सबसे ज्यादा कमी

बारिश की कमी से पूर्व और पूर्वोत्तर भारत सबसे ज्यादा प्रभावित है। यहां 29 अगस्त तक 783.8 मिमी बारिश हुई, जबकि सामान्य बारिश 1,066.5 मिमी है। यानी 27% की कमी है।

दक्षिणी प्रायद्वीप में 418.5 मिमी बारिश हुई, जबकि सामान्य 545.4 मिमी है। यहां 23% की कमी दर्ज की गई। उत्तर-पश्चिम भारत में 425.6 मिमी बारिश के मुकाबले सामान्य 476.3 मिमी है, यानी 11% की कमी

इसके विपरीत, मध्य भारत अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में है। यहां 755.7 मिमी बारिश हुई, जो सामान्य 781.8 मिमी से केवल 3% कम है। यह अंतर बताता है कि देश का 14% का औसत घाटा पूरे भारत की वास्तविक तस्वीर नहीं दिखाता। कई क्षेत्रों में बारिश की कमी काफी ज्यादा है, जबकि मध्य भारत में अच्छी बारिश ने राष्ट्रीय आंकड़े को कुछ हद तक संभाला है।

47% जिलों में बारिश की कमी

जिला स्तर पर भी मानसून का वितरण असमान है। 29 अगस्त तक उपलब्ध 741 जिलों में से 309 जिले यानी करीब 42% जिले बारिश की कमी वाली श्रेणी में हैं। देश में 39 जिले ऐसे हैं जहां बारिश में बड़ी कमी दर्ज की गई। इस तरह देश के 47 फीसदी जिले बारिश में कमी से जूझ रहे हैं।।

इसके विपरीत, 292 जिलों में बारिश सामान्य रही और 81 जिलों में सामान्य से अधिक बारिश हुई। 13 जिले अत्यधिक अधिक बारिश वाली श्रेणी में रहे। इससे साफ है कि इस साल मानसून की मुख्य समस्या सिर्फ बारिश की कुल मात्रा नहीं, बल्कि बारिश का समय और स्थान है। कहीं लंबे शुष्क दौर हैं तो कहीं कम समय में अत्यधिक बारिश हो रही है।

जून की कमी की भरपाई नहीं हुई

इस साल मानसून की शुरुआत ही कमजोर रही। जून में देश में बारिश सामान्य से 35.4% कम रही। जुलाई में स्थिति में सुधार आया और मध्य भारत में अच्छी बारिश के कारण देशव्यापी बारिश सामान्य से लगभग 1% अधिक रही। लेकिन क्षेत्रीय असमानता बनी रही और अगस्त में फिर बारिश कमजोर पड़ने से संचयी घाटा बढ़ गया। 

IMD के अनुसार, जून में करीब 70% जिलों में बारिश की कमी थी। जुलाई में देशव्यापी आंकड़ा सुधरने के बावजूद 47% जिलों में बारिश सामान्य से कम या बहुत कम रही। 

अल नीनो का असर

कमजोर मानसून के पीछे अल नीनो एक प्रमुख जलवायु कारक माना जा रहा है। IMD ने अप्रैल में 2026 के मानसून के लिए 92% LPA बारिश का अनुमान लगाया था, जिसे बाद में घटाकर 90% LPA किया गया और अल नीनो के विकसित होने की संभावना को इसके प्रमुख कारणों में शामिल किया गया। 

सरकारी जानकारी के अनुसार, भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र में जून 2026 में कमजोर अल नीनो विकसित हुआ, जो बाद में मध्यम तीव्रता तक पहुंचा। आने वाले महीनों में अल नीनो प्रभाव और मजबूत होने के आसार हैं। जिसका असर अगले साल फरवरी तक बना रह सकता है। 

प्रायद्वीपीय भारत के लिए चिंता

मौसम विभाग के ताजा पूर्वानुमान के अनुसार अगले एक सप्ताह तक प्रायद्वीपीय भारत में बारिश की गतिविधियां कमजोर रहने की संभावना है। 

यह दक्षिणी प्रायद्वीप के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि 29 अगस्त तक इस क्षेत्र में पहले ही सामान्य से 23% कम बारिश हुई है। यदि सितंबर की शुरुआत में भी बारिश कमजोर रहती है, तो बारिश में कमी और बढ़ सकती है। दूसरी ओर, बंगाल की खाड़ी में बन रहे निम्न दबाव क्षेत्र के कारण पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों में भारी बारिश हो सकती है। 

खरीफ फसलों पर असर

कम और असमान बारिश का असर खरीफ सीजन की फसलों पर पड़ेगा। अगस्त के अंत तक कुल मानसूनी बारिश का घाटा 14% होना खरीफ फसलों के लिए चिंता का विषय है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां बारिश की कमी 20-30% या उससे अधिक है। वहीं कुछ इलाकों में अत्यधिक बारिश से जलभराव और फसल नुकसान अलग चुनौती पैदा कर रहा है।

अल नीनो के मजबूत होने और मानसून के अंतिम चरण में प्रवेश के साथ सितंबर की बारिश अब देश की कृषि के लिए निर्णायक होगी।

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