WMO Update: अल नीनो तेजी से होगा मजबूत, दुनिया भर में लू, सूखा और अतिवृष्टि का बढ़ेगा खतरा
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने चेतावनी दी है कि अल नीनो विकसित हो चुका है और सितंबर 2026 तक इसके मजबूती से उभरने की संभावना है। इससे दुनिया के कई हिस्सों में लू, सूखा, भारी बारिश और समुद्री हीटवेव की घटनाएं बढ़ सकती हैं, जिसका कृषि, जल संसाधनों और खाद्य सुरक्षा पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने चेतावनी दी है कि प्रशांत महासागर के उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में अल नीनो की स्थिति विकसित हो चुकी है और अगले कुछ महीनों में इसके तेजी से मजबूत होने की संभावना है। इसके चलते दुनिया के कई हिस्सों में लू, सूखा, भारी वर्षा और अन्य चरम मौसमी घटनाओं की आशंका बढ़ जाएगी।
डब्ल्यूएमओ के नवीनतम ग्लोबल सीजनल क्लाइमेट अपडेट के अनुसार, जलवायु मॉडल संकेत दे रहे हैं कि जुलाई से सितंबर 2026 के दौरान अल नीनो तेजी से एक मजबूत (Strong) श्रेणी में बदल जाएगा। मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का सतही समुद्री तापमान सामान्य से 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक बढ़ने का अनुमान है।
WMO की महासचिव सेलेस्टे साउलो ने कहा, “अल नीनो की स्थिति पहले ही विकसित हो चुकी है और डब्ल्यूएमओ के पूर्वानुमान के अनुरूप इसके तेजी से एक मजबूत घटना बनने की संभावना है। इससे दुनिया के कई क्षेत्रों में सूखा, भारी वर्षा, लू तथा समुद्री हीटवेव की घटनाएं बढ़ सकती हैं।”
डब्ल्यूएमओ के अनुसार, उत्तरी गोलार्ध में शरद ऋतु के दौरान अल नीनो और अधिक मजबूत होगा तथा इसका प्रभाव दुनिया के अनेक क्षेत्रों तक फैलेगा। वहीं, भूमध्यरेखीय अटलांटिक महासागर का तापमान भी सामान्य से अधिक रहने का अनुमान है।
कृषि और खाद्य उत्पादन पर बढ़ेगा खतरा
डब्ल्यूएमओ का कहना है कि मजबूत अल नीनो वैश्विक कृषि के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। वर्षा के पैटर्न में बदलाव और तापमान में वृद्धि से फसल उत्पादन, पशुपालन और जल उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। एशिया, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के वे क्षेत्र जो मौसमी वर्षा पर निर्भर हैं, वहां सामान्य से कम बारिश होने पर कृषि पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
अधिकांश क्षेत्रों में सामान्य से अधिक तापमान का अनुमान
ग्लोबल सीजनल क्लाइमेट अपडेट के अनुसार, जुलाई से सितंबर के दौरान 60° दक्षिण से 60° उत्तर अक्षांश के बीच स्थित लगभग सभी आबादी वाले स्थलीय क्षेत्रों में सामान्य से अधिक तापमान रहने की प्रबल संभावना है।
महासागरों में भी भूमध्यरेखीय प्रशांत, हिंद महासागर और उष्णकटिबंधीय अटलांटिक में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक रहने का अनुमान है। भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक रहने की संभावना 80 प्रतिशत से अधिक बताई गई है। इसके विपरीत, उत्तरी अटलांटिक के कुछ हिस्सों में समुद्र का तापमान सामान्य या सामान्य से कम रह सकता है।

दुनिया भर में बदलेगा वर्षा का स्वरूप
डब्ल्यूएमओ के अनुसार, वर्षा का पूर्वानुमान मजबूत होते अल नीनो के अनुरूप रहेगा। मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र में सामान्य से अधिक वर्षा होने की संभावना है, जबकि हिंद महासागर के उष्णकटिबंधीय क्षेत्र, भारतीय उपमहाद्वीप और ऑस्ट्रेलिया के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से कम वर्षा का अनुमान है। इससे जल उपलब्धता और कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
अफ्रीका में वर्षा का स्वरूप क्षेत्रवार अलग-अलग रहने की संभावना है। गिनी की खाड़ी के उत्तरी हिस्सों में सामान्य से अधिक वर्षा हो सकती है, जबकि ग्रेटर हॉर्न ऑफ अफ्रीका क्षेत्र में सामान्य से कम वर्षा का अनुमान है।
डब्ल्यूएमओ ने मध्य अमेरिका, कैरेबियाई क्षेत्र और उत्तर-पश्चिमी दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों में सामान्य से कम वर्षा का अनुमान लगाया है। वहीं, संयुक्त राज्य अमेरिका के दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्रों में सामान्य से अधिक वर्षा होने की संभावना जताई गई है। यूरोप में उत्तर और दक्षिण के बीच स्पष्ट अंतर देखने को मिल सकता है। दक्षिणी यूरोप में सामान्य से अधिक वर्षा होने की संभावना है, जबकि उत्तरी यूरोप अपेक्षाकृत शुष्क रह सकता है।
डब्ल्यूएमओ की सलाह
डब्ल्यूएमओ ने सरकारों, आपदा प्रबंधन एजेंसियों और कृषि विभागों से अपील की है कि वे मौसमी पूर्वानुमानों पर लगातार नजर रखें और आवश्यक तैयारी करें, क्योंकि आने वाले महीनों में मजबूत होता अल नीनो वैश्विक मौसम, कृषि उत्पादन और जल संसाधनों पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है।
डब्ल्यूएमओ ने बताया कि अल नीनो और ला नीना, अल नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO) की दो विपरीत अवस्थाएं हैं, जो वर्ष-दर-वर्ष वैश्विक जलवायु परिवर्तन के सबसे प्रभावशाली कारकों में से एक हैं। अल नीनो आमतौर पर हर दो से सात वर्ष में विकसित होता है और 9 से 12 महीने तक बना रहता है। इसकी तीव्रता सामान्यतः नवंबर से फरवरी के बीच चरम पर पहुंचती है। इसका सबसे अधिक प्रभाव अक्सर इसके शुरू होने के अगले वर्ष वैश्विक तापमान पर देखने को मिलता है।
संगठन ने स्पष्ट किया कि प्रत्येक अल नीनो घटना का प्रभाव उसकी तीव्रता, अवधि, विकास के समय और हिंद महासागर द्विध्रुव (Indian Ocean Dipole) जैसी अन्य जलवायु प्रणाली के साथ उसकी पारस्परिक क्रिया पर निर्भर करता है। डब्ल्यूएमओ ने यह भी स्पष्ट किया कि आम चर्चा में प्रयुक्त "सुपर अल नीनो" शब्द उसकी आधिकारिक वर्गीकरण प्रणाली का हिस्सा नहीं है। डब्ल्यूएमओ केवल अल नीनो को कमजोर, मध्यम, मजबूत और अत्यंत मजबूत श्रेणियों में वर्गीकृत करता है।

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