इस वर्ष कृषि वृद्धि दर घटकर 1.4% रहने का अंदेशा, अल नीनो और कमजोर मानसून से खरीफ पर बढ़ा संकटः ICRA

ICRA ने चेतावनी दी है कि जून में 40 प्रतिशत कम मानसूनी वर्षा, खरीफ बुवाई में 22.7 प्रतिशत गिरावट और अल नीनो के बढ़ते खतरे के कारण FY2027 में कृषि जीवीए वृद्धि दर 1.4 प्रतिशत रह सकती है। आगे इसके और घटने का जोखिम है। जुलाई-अगस्त की वर्षा कृषि उत्पादन और ग्रामीण मांग के लिए निर्णायक रहेगी।

इस वर्ष कृषि वृद्धि दर घटकर 1.4% रहने का अंदेशा, अल नीनो और कमजोर मानसून से खरीफ पर बढ़ा संकटः ICRA

भारत के कृषि क्षेत्र के लिए वित्त वर्ष 2026-27 चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है। कमजोर दक्षिण-पश्चिम मानसून की शुरुआत और अल नीनो की बढ़ती आशंका के बीच ICRA ने चेतावनी दी है कि कृषि, वानिकी एवं मत्स्य क्षेत्र की वृद्धि दर वित्त वर्ष 2026-27 में घटकर 1.4 प्रतिशत रह सकती है। पिछले वर्ष यह 3 प्रतिशत थी। यही नहीं, एजेंसी का कहना है कि यदि जुलाई और अगस्त में सामान्य से कम वर्षा जारी रहती है तो कृषि वृद्धि का उसका मौजूदा अनुमान और नीचे जा सकता है।

दक्षिण-पश्चिम मानसून और कृषि पर जारी अपनी नवीनतम थीमैटिक रिपोर्ट में ICRA ने कहा है कि जून 2026 में देश में दीर्घकालिक औसत (LPA) का केवल 60 प्रतिशत वर्षा हुई, यानी सामान्य से 40 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई। यह कमी भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के जून के लिए जारी सामान्य से कम, लेकिन 92 प्रतिशत LPA से अधिक रहने के अनुमान से भी कहीं अधिक रही।

ICRA ने स्पष्ट किया है कि यदि जुलाई और अगस्त में अल नीनो का प्रभाव और मजबूत होता है तथा वर्षा सामान्य से कम बनी रहती है, तो वित्त वर्ष 2027 के लिए कृषि, वानिकी एवं मत्स्य क्षेत्र की 1.4 प्रतिशत जीवीए वृद्धि को और घटाना पड़ सकता है। एजेंसी ने इस वर्ष की पहली तिमाही में कृषि जीवीए वृद्धि 1.5 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है, जबकि पिछले वर्ष की समान अवधि में यह 4.4 प्रतिशत थी। 

कमजोर मानसून का असर खेती पर तुरंत दिखाई देने लगा है। 25 जून तक खरीफ फसलों की बुवाई 22.7 प्रतिशत घटकर 1.83 करोड़ हेक्टेयर रह गई, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 2.36 करोड़ हेक्टेयर थी। इसके साथ ही जून के अंत तक देश के जलाशयों में जल भंडार घटकर कुल क्षमता का केवल 26 प्रतिशत रह गया, जो एक वर्ष पहले इसी समय 36 प्रतिशत था। इससे खरीफ ही नहीं बल्कि आगामी रबी फसलों के लिए सिंचाई जल की उपलब्धता को लेकर भी चिंता बढ़ गई है।

ICRA के अनुसार जुलाई का महीना कृषि क्षेत्र के लिए निर्णायक रहेगा क्योंकि देश में पूरे दक्षिण-पश्चिम मानसून की लगभग 32 प्रतिशत वर्षा और कुल खरीफ बुवाई का लगभग 55 प्रतिशत हिस्सा इसी महीने होता है। लेकिन चिंता की बात यह है कि IMD ने जुलाई 2026 में भी सामान्य से कम यानी दीर्घकालिक औसत का 94 प्रतिशत वर्षा का अनुमान जताया है।

रिपोर्ट के अनुसार जुलाई और अगस्त में होने वाली वर्षा ही यह तय करेगी कि खरीफ उत्पादन, ग्रामीण मांग और समग्र कृषि अर्थव्यवस्था पर मानसून की कमी का कितना असर पड़ेगा।

मानसून के देर से आने और लंबे शुष्क दौर के कारण लगभग सभी प्रमुख खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित हुई है। 25 जून तक तिलहनों का रकबा 53.3 प्रतिशत, कपास का 34.6 प्रतिशत, दलहनों का 30.5 प्रतिशत, धान का 25.2 प्रतिशत और मोटे अनाजों का 11.7 प्रतिशत घट गया। केवल गन्ने का रकबा 1.2 प्रतिशत बढ़ा, क्योंकि इसकी सिंचाई व्यवस्था बेहतर है और इसकी बुवाई अपेक्षाकृत पहले पूरी हो जाती है।

ICRA ने चेतावनी दी है कि अल नीनो का सबसे अधिक असर देश के मॉनसून कोर जोन (MCZ) वाले राज्यों पर पड़ सकता है। इनमें राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक, ओडिशा और छत्तीसगढ़ प्रमुख हैं। इन राज्यों में देश के कुल खरीफ क्षेत्र का लगभग 35 प्रतिशत हिस्सा होता है, लेकिन यहां सिंचाई कवरेज 55 प्रतिशत से कम है, जिससे ये मानसून पर अत्यधिक निर्भर हैं। मध्य प्रदेश इस क्षेत्र का एकमात्र बड़ा अपवाद है, जहां सिंचाई कवरेज लगभग 82 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। माइक्रो इरिगेशन और पाइप आधारित सिंचाई नेटवर्क के विस्तार ने इस राज्य की मानसून पर निर्भरता काफी कम कर दी है।

रिपोर्ट में 2015, 2018 और 2023 के पिछले तीन अल नीनो वर्षों का विश्लेषण करते हुए बताया गया है कि इन राज्यों में सामान्य से 10 से 40 प्रतिशत तक कम वर्षा दर्ज की गई थी। इसका असर जलाशयों के जलस्तर और कृषि उत्पादन दोनों पर पड़ा। विशेष रूप से दलहन, तिलहन, मोटे अनाज और कपास जैसी कम सिंचित फसलों के राष्ट्रीय उत्पादन में इन वर्षों के दौरान 3 से 14.5 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई थी। इसके विपरीत धान उत्पादन अपेक्षाकृत स्थिर रहा क्योंकि इसका बड़ा हिस्सा बेहतर सिंचाई वाले राज्यों में होता है।

ICRA के अनुसार ये मॉनसून कोर जोन वाले राज्य देश के कृषि उत्पादन में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। देश के कुल खरीफ दलहन उत्पादन का 72 प्रतिशत, मोटे अनाज उत्पादन का 67 प्रतिशत तथा तिलहन उत्पादन का 64 प्रतिशत इन्हीं राज्यों से आता है। ऐसे में यदि इन राज्यों में वर्षा सामान्य से कम रहती है तो इसका असर राष्ट्रीय खाद्य उत्पादन और कृषि बाजारों पर व्यापक रूप से पड़ सकता है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कमजोर मानसून का प्रभाव केवल खरीफ फसलों तक सीमित नहीं रहेगा। यदि मानसून के दौरान जलाशय पर्याप्त नहीं भरते हैं तो रबी सीजन में सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता भी प्रभावित होगी। ICRA के विश्लेषण से पता चलता है कि प्रमुख अल नीनो वर्षों में महाराष्ट्र, कर्नाटक, छत्तीसगढ़ और ओडिशा जैसे राज्यों में जलाशयों का जलस्तर सामान्य से काफी नीचे चला गया था, जिससे रबी फसलों के उत्पादन पर भी नकारात्मक असर पड़ा।

बागवानी क्षेत्र भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। हालांकि अधिकांश फल एवं सब्जियां सिंचित परिस्थितियों में उगाई जाती हैं, लेकिन भिंडी, करेला जैसी कुछ खरीफ सब्जियां मानसूनी वर्षा पर निर्भर रहती हैं। भारत के कृषि जीवीए में बागवानी क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग 33 प्रतिशत है, इसलिए इसमें किसी भी प्रकार की गिरावट का व्यापक आर्थिक प्रभाव हो सकता है।

हालांकि ICRA का मानना है कि कृषि अर्थव्यवस्था को गैर-फसल क्षेत्रों से कुछ राहत मिल सकती है। पशुपालन, वानिकी और मत्स्य पालन जैसे गैर-फसली क्षेत्रों की कृषि जीवीए में हिस्सेदारी बढ़कर अब 46 प्रतिशत हो चुकी है, जो 2012 में 35 प्रतिशत थी। पिछले अल नीनो प्रभावित वर्षों में जहां फसल क्षेत्र का जीवीए 2 से 4 प्रतिशत तक घटा, वहीं गैर-फसल क्षेत्रों ने 5 से 8 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि दर्ज की। इससे समग्र कृषि जीवीए पर पड़ने वाला असर कुछ हद तक सीमित रहा।

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