बृंदा करात ने कृषि मंत्री को लिखा पत्र, नए ग्रामीण रोजगार कानून के नियम वापस लेने और मनरेगा जारी रखने की मांग
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई-एम) की वरिष्ठ नेता बृंदा करात ने केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान से वीबी-जीरामजी अधिनियम के तहत बनाए गए नियम वापस लेने और मनरेगा को जारी रखने की मांग की है। उन्होंने कहा कि नए कानून के प्रावधान श्रमिकों के अधिकारों को कमजोर करते हैं और तकनीक पर अत्यधिक निर्भर हैं।
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई-एम) की वरिष्ठ नेता बृंदा करात ने केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान को पत्र लिखकर विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम (VB-G-RAM-G Act) के तहत बनाए गए नियमों को वापस लेने और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) को उसके मौजूदा स्वरूप में जारी रखने की मांग की है।
नया कानून 1 जुलाई से लागू होने जा रहा है। इससे पहले लिखे गए पत्र में करात ने आरोप लगाया है कि मनरेगा को समाप्त किए जाने से ग्रामीण मजदूरों, विशेषकर आदिवासी क्षेत्र के लोगों पर गंभीर असर पड़ा है। उन्होंने राजस्थान के उदयपुर जिले के बड़ापाला गांव के अपने हालिया दौरे का हवाला देते हुए कहा कि वहां अधिकांश महिला श्रमिक कई घंटे तक काम शुरू होने का इंतजार करती रहीं, लेकिन ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज करने वाली प्रणाली काम नहीं कर सकी। इस कारण उस दिन काम ही शुरू नहीं हो सका। उनका दावा है कि ऐसी तकनीकी समस्याएं आम हो गई हैं और इससे ग्रामीण मजदूरों के रोजगार के अवसर प्रभावित हो रहे हैं।
बृंदा करात ने पत्र में कहा कि गांव के मजदूरों को जनवरी से जून के बीच केवल 18 दिन ही काम मिला। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कई बुजुर्ग महिलाओं की उपस्थिति बायोमेट्रिक फेस रिकग्निशन तकनीक के जरिए दर्ज नहीं हो सकी, जिससे वे काम से वंचित रह गईं।
सीपीआई-एम नेता ने आरोप लगाया कि नए कानून के क्रियान्वयन के लिए बनाए गए नियम ग्रामीण मजदूर संगठनों और ट्रेड यूनियनों से बिना किसी परामर्श के तैयार किए गए हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या इन नियमों के कुछ प्रावधान संविधान में केंद्र और राज्यों के बीच अधिकारों के बंटवारे की भावना के अनुरूप हैं। उनका कहना है कि नियम राज्यों पर वित्तीय और प्रशासनिक जिम्मेदारियां तो डालते हैं, लेकिन उन्हें निर्णय प्रक्रिया में पर्याप्त भूमिका नहीं देते।
बृंदा करात ने धन आवंटन की नई व्यवस्था पर भी आपत्ति जताई। उनका कहना है कि यदि राज्यों को धन आवंटन 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर किया गया तो कम आबादी वाले राज्यों को नुकसान हो सकता है, भले ही वहां ग्रामीण रोजगार की मांग अधिक हो। उन्होंने केरल और तमिलनाडु का उदाहरण देते हुए कहा कि मनरेगा के तहत अधिक कार्यदिवस उपलब्ध कराने के बावजूद इन राज्यों को कम धन मिल सकता है।
पत्र में आधार आधारित ई-केवाईसी, अनिवार्य ऑनलाइन पंजीकरण और बायोमेट्रिक उपस्थिति व्यवस्था पर भी सवाल उठाए गए हैं। करात का कहना है कि स्मार्टफोन या अन्य तकनीकी सुविधाओं के अभाव में बड़ी संख्या में ग्रामीण मजदूर रोजगार से वंचित हो सकते हैं।
उन्होंने राष्ट्रीय स्तर की संचालन समिति (नेशनल लेवल स्टीयरिंग कमेटी) के गठन पर भी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि इसमें राज्य सरकारों का प्रतिनिधित्व सीमित रखा गया है, जबकि श्रमिक संगठनों तथा जनजातीय कार्य, सामाजिक न्याय और महिला एवं बाल विकास जैसे मंत्रालयों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है।
बृंदा करात ने कृषि मंत्री से नए नियमों को वापस लेने, मनरेगा को जारी रखने और श्रमिक संगठनों, राज्य सरकारों तथा अन्य संबंधित पक्षों से व्यापक परामर्श के बाद ही नए प्रावधान लागू करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि यदि 1 जुलाई से मनरेगा को समाप्त कर दिया गया तो इसका सबसे अधिक असर ग्रामीण गरीबों और रोजगार गारंटी योजना पर निर्भर मजदूरों पर पड़ेगा।

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