हरियाणा में पंचायती भूमि पर प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए बनेगी नई नीति

कुरुक्षेत्र में कृषि कार्यशाला के दौरान कई नई घोषणाएं, जैविक किसानों को प्रति एकड़ 10 हजार रुपये वार्षिक सहायता मिलेगी।

हरियाणा में पंचायती भूमि पर प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए बनेगी नई नीति

हरियाणा सरकार राज्य में प्राकृतिक और जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए नई पहल करने जा रही है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कहा है कि पंचायतों के स्वामित्व वाली भूमि पर प्राकृतिक एवं जैविक खेती को प्रोत्साहित करने के लिए अगले वर्ष विशेष नीति बनाई जाएगी। इसके साथ ही कृषि विभाग की लगभग 800 एकड़ भूमि केवल उन किसानों को पट्टे पर दी जाएगी, जो कम से कम 10 वर्षों तक वहां प्राकृतिक और जैविक खेती करने के लिए तैयार होंगे।

मुख्यमंत्री रविवार को कुरुक्षेत्र में कृषि एवं किसान कल्याण विभाग द्वारा आयोजित "कृषि कार्यशाला" को संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम में गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत और हरियाणा के कृषि मंत्री श्याम सिंह राणा भी मौजूद रहे।

मुख्यमंत्री ने बताया कि एपीडा (APEDA) से प्रमाणित प्राकृतिक एवं जैविक किसानों को पांच वर्षों तक प्रति वर्ष 10 हजार रुपये प्रति एकड़ की वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी। साथ ही, जैविक खेती के प्रमाणीकरण की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए हरियाणा राज्य बीज प्रमाणीकरण एजेंसी को प्रमाणन संस्था के रूप में विकसित किया जाएगा।

उन्होंने कहा कि पंचकूला, यमुनानगर, करनाल, सोनीपत, रोहतक, गुरुग्राम, फरीदाबाद, हिसार, चरखी दादरी और नारनौल की मंडियों में प्राकृतिक एवं जैविक उत्पादों की बिक्री के लिए विशेष स्थान उपलब्ध कराया जाएगा। किसानों को बेहतर बाजार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से परीक्षण प्रयोगशालाएं और एपीडा से मान्यता प्राप्त प्रमाणीकरण केंद्र भी स्थापित किए जाएंगे।

मुख्यमंत्री ने बताया कि हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के सहयोग से कुरुक्षेत्र जिले में 2,000 एकड़ क्षेत्र में ‘स्मार्ट एग्रीकल्चर’ योजना के तहत आधुनिक तकनीकों के साथ प्राकृतिक खेती शुरू की जाएगी। इस योजना में किसानों को होने वाले किसी भी नुकसान की भरपाई राज्य सरकार करेगी। इसके अलावा मोरनी ब्लॉक को प्राकृतिक एवं जैविक खेती आधारित मॉडल ब्लॉक के रूप में विकसित किया जाएगा।

उन्होंने कहा कि हरियाणा देश का पहला राज्य है जिसने बागवानी किसानों को मौसम संबंधी जोखिमों से सुरक्षा देने के लिए ‘मुख्यमंत्री बागवानी बीमा योजना’ के तहत 21 फसलों को शामिल किया है। मुख्यमंत्री ने किसानों से प्राकृतिक खेती अपनाने और हरियाणा को प्राकृतिक खेती का मॉडल राज्य बनाने में सहयोग करने का आह्वान किया।

प्राकृतिक खेती को बढ़ावा 

मुख्यमंत्री के अनुसार, राज्य सरकार ने वर्ष 2022 में प्राकृतिक खेती योजना शुरू की थी और इसके लिए एक समर्पित पोर्टल भी विकसित किया गया है। अब तक लगभग दो लाख किसानों ने तीन लाख एकड़ क्षेत्र का पंजीकरण कराया है। इनमें से 23,930 किसानों का 44,077 एकड़ क्षेत्र के लिए सत्यापन किया जा चुका है। वर्ष 2025-26 के दौरान प्रदेश में 20,727 एकड़ क्षेत्र में प्राकृतिक खेती की गई।

उन्होंने बताया कि प्राकृतिक खेती के प्रशिक्षण के लिए कुरुक्षेत्र, जींद, सिरसा और करनाल में प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किए गए हैं। अब तक 12,188 प्रतिभागियों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है, जिनमें किसान, महिलाएं और सरकारी कर्मचारी शामिल हैं। इसके अतिरिक्त 6,234 सरपंचों को भी ऑनलाइन प्रशिक्षण दिया गया है।

मुख्यमंत्री ने बताया कि वर्ष 2025 से देसी गाय खरीद पर मिलने वाली सब्सिडी बढ़ाकर 30,000 रुपये कर दी गई है। प्राकृतिक खेती के लिए आवश्यक कच्चे माल के भंडारण और प्रसंस्करण हेतु चार ड्रम खरीदने पर प्रत्येक किसान को 3,000 रुपये की सहायता दी जा रही है। अब तक 2,500 किसानों को ड्रम खरीदने के लिए 75 लाख रुपये तथा 1,171 किसानों को देसी गाय खरीदने के लिए कुल 2.97 करोड़ रुपये की अनुदान राशि सीधे उनके बैंक खातों में भेजी जा चुकी है।

प्राकृतिक खेती समय की मांग: आचार्य देवव्रत

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने कहा कि प्राकृतिक कृषि मिशन को आगे बढ़ाने के लिए समर्पित प्रयासों की आवश्यकता है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग की वर्तमान प्रवृत्ति जारी रही तो भूमि की उर्वरता लगातार घटती जाएगी और भविष्य में जमीन बंजर होने का खतरा बढ़ जाएगा।

उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद खाद्य आत्मनिर्भरता के लिए सीमित मात्रा में नाइट्रोजन उपयोग की सलाह दी गई थी, लेकिन आज रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक प्रयोग हो रहा है। इसके परिणामस्वरूप मिट्टी की गुणवत्ता, जल स्रोतों और मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

राज्यपाल ने कहा कि प्राकृतिक खेती देशी गाय आधारित, कम लागत वाली और पर्यावरण अनुकूल कृषि प्रणाली है, जो मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के साथ-साथ किसानों की लागत भी कम कर सकती है। उन्होंने किसानों से अपील की कि वे अपनी भूमि के छोटे हिस्से पर ही सही, प्राकृतिक खेती की शुरुआत करें।

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