मीठे ज्वार से इथेनॉल उत्पादन प्रोजेक्ट विवादों में घिरा, आईआईएमआर ने जताई अलग होने की मंशा
देश में इथेनॉल उत्पादन के लिए मीठे ज्वार (स्वीट सोरगम) के इस्तेमाल को बढ़ावा देने वाली परियोजना विवादों में घिर गई है। आईआईएमआर ने प्रोजेक्ट के मौजूद प्रारूप पर असहमति जताते हुए इससे अलग हटने की मंशा जताई है।
देश में इथेनॉल उत्पादन के लिए वैकल्पिक फीड स्टॉक के तौर पर ज्वार के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की एक अहम परियोजना विवादों में उलझ गई है। कानपुर स्थित नेशनल शुगर इंस्टीट्यूट (NSI) ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मिलेट्स रिसर्च (IIMR), हैदराबाद के साथ मिलकर मीठे ज्वार (Sweet Sorghum) से इथेनॉल उत्पादन की संभावनाएं तलाशने के लिए एक प्रोजेक्ट शुरू किया था, जिसे पेट्रोलियम कंपनी भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (BPCL) से वित्तीय सहयोग प्राप्त हो रहा है।
प्रोजेक्ट के तहत इथेनॉल उत्पादन के लिए निजी बीज कंपनी एडवांटा की हाईब्रिड ज्वार किस्म 'मेगास्वीट' के उपयोग सहित कई मामलों पर आईआईएमआर ने आपत्ति जताई है। बीज कंपनी भी इस प्रोजेक्ट में हिस्सेदार है। प्रोजेक्ट के तहत ट्रायल सहित कई मसलों पर असहमति जताते हुए आईआईएमआर ने इस प्रोजेक्ट से अलग होने की मंशा जताई है।
ज्वार सहित विभिन्न मोटे अनाजों पर रिसर्च के लिए आईआईएमआर कृषि मंत्रालय के तहत देश का नोडल संस्थान है, जबकि नेशनल शुगर इंस्टीट्यूट खाद्य मंत्रालय के तहत काम करता है और शुगर क्षेत्र में विशेषज्ञता रखने वाला संस्थान है। मीठे ज्वार से इथेनॉल उत्पादन के इस प्रोजेक्ट में ट्रायल के तौर-तरीकों और कई अन्य मसलों को लेकर दोनों संस्थानों के बीच असहमतियां सामने आई हैं।
आईआईएमआर ने 24 मार्च 2026 को एनएसआई को पत्र भेजकर प्रोजेक्ट के मौजूदा प्रारूप को सही न मानते हुए बीपीसीएल-एनएसआई स्वीट सोरगम प्रोजेक्ट से तत्काल प्रभाव से हटने की बात कही है। आईआईएमआर ने प्रोजेक्ट के ट्रायल्स और कई अन्य मसलों को लेकर भी अपनी चिंताएं व्यक्त की हैं।
हालांकि, इसके जवाब में एनएसआई की निदेशक ने 2 अप्रैल, 2026 को आईआईएमआर को पत्र भेजकर तमाम आशंकाओं को खारिज करते हुए प्रोजेक्ट से हटने के फैसले पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया था। लेकिन आईआईएमआर की ओर से पुनः 15 अप्रैल, 2026 को भेजे गए पत्र में एनएसआई के तर्कों से असहमति जताते हुए प्रोजेक्ट से अलग होने के निर्णय को दोहराया गया। रूरल वॉयस के पास दोनों संस्थानों के बीच हुए पत्राचार की प्रतियां मौजूद हैं।
15 अप्रैल को भेजे गए पत्र में आईआईएमआर ने इस बात पर गंभीर चिंता जताई कि प्रोजेक्ट के तहत हाईब्रिड किस्म ‘मेगास्वीट’ पर बेवजह जोर दिया जा रहा है, जिसे भारत सरकार द्वारा फॉरेज सोरगम (चारे) के लिए जारी और अधिसूचित किया गया था। आरोप है कि इस हाईब्रिड ज्वार का ICAR–AICRP के तहत कभी मूल्यांकन नहीं हुआ। प्रोजेक्ट के तहत ट्रायल के तौर-तरीकों को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं।
आईआईएमआर के पत्र के मुताबिक, खरीफ 2025 में कर्नाटक के निरानी शुगर्स और महाराष्ट्र के एनएसएल जय महेश शुगर्स लिमिटेड में हुए ट्रायल्स में स्थापित कृषि सिद्धांतों (Agronomic Principles) और ICAR द्वारा अनुशंसित दिशानिर्देशों (Package of Practices) की अनदेखी की गई। इनमें मानकों से इतर बीजों की मात्रा, पौधों के बीच की दूरी और अनाज की अलग से कटाई न करना आदि शामिल हैं।
आईआईएमआर का कहना है कि मानकों और दिशानिर्देशों का पालन न होने से न सिर्फ ट्रायल्स के नतीजे प्रभावित हुए, बल्कि वैज्ञानिक डेटा की विश्वसनीयता पर भी संदेह पैदा हो गया। यहां तक कि प्रोजेक्ट के तहत किसानों के प्रशिक्षण और तकनीकी पर्यवेक्षण जैसी महत्वपूर्ण गतिविधियां भी आईआईएमआर की सार्थक भागीदारी के बिना संचालित की गईं।
आईआईएमआर का तर्क है कि ICAR–AICRP प्रणाली के अंतर्गत स्वतंत्र और मजबूत मल्टीलोकेशनल डेटा के अभाव में हाईब्रिड ज्वार को प्रोत्साहन और परीक्षण देना अनुचित प्रतीत होता है। संस्थान ने ज्वार किस्म ‘मेगास्वीट’ को स्वीट सोरगम हाईब्रिड के रूप में मान्यता देने से यह कहते हुए इंकार कर दिया है कि इससे वैज्ञानिक प्रक्रिया, पारदर्शिता और संस्थान की विश्वसनीयता प्रभावित होने का खतरा है। संस्थान ने हाईब्रिड ज्वार किस्म को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देने या इथेनॉल के लिए इस्तेमाल से पहले ICAR–AICRP प्रणाली के तहत मल्टीलोकेशन मूल्यांकन को जरूरी माना है।
इथेनॉल उत्पादन के लिए ज्वार के इस्तेमाल से जुड़ी इस अहम परियोजना में दोनों संस्थानों के बीच पैदा हुए मतभेदों की जानकारी कृषि और खाद्य मंत्रालय तक पहुंच चुकी है। आईसीएआर से जुड़े उच्च पदस्थ सूत्रों ने रूरल वॉयस को बताया कि यदि स्वीट सोरगम प्रोजेक्ट आईसीएआर के मानकों के अनुरूप लागू नहीं होता है, तो आईसीएआर के संस्थान आईआईएमआर का इसके साथ जुड़े रहना संभव नहीं होगा।

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