भूख पीड़ित घटे, लेकिन पौष्टिक आहार अब भी करोड़ों भारतीयों की पहुंच से दूर; वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर भी नए खतरेः FAO रिपोर्ट
एसओएफआई 2026 (SOFI) रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक स्तर पर भूख पीड़ितों की संख्या लगातार तीसरे वर्ष घटी है, लेकिन करोड़ों लोगों के लिए पौष्टिक भोजन अब भी महंगा बना हुआ है। भारत ने कृषि उत्पादन और खाद्य वितरण के जरिए खाद्य सुरक्षा मजबूत की है, फिर भी पोषणयुक्त भोजन की बढ़ती कीमतें, कमजोर आपूर्ति श्रृंखला और जलवायु जोखिम पोषण सुरक्षा के सामने बड़ी चुनौती बने हुए हैं।
भारत ने खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने, सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत करने और कृषि क्षेत्र में निरंतर प्रगति के माध्यम से खाद्य सुरक्षा में उल्लेखनीय सुधार किया है। इसके बावजूद प्रत्येक परिवार तक किफायती और पौष्टिक भोजन पहुंचाना अब भी देश की सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल है। संयुक्त राष्ट्र की पांच एजेंसियों - खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ), अंतरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष (आईएफएडी), यूनिसेफ, विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्ल्यूएफपी) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा संयुक्त रूप से जारी 'स्टेट ऑफ फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रिशन इन द वर्ल्ड (SOFI) 2026' रिपोर्ट में यह निष्कर्ष सामने आया है।
यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब कोविड-19 महामारी के बाद वैश्विक खाद्य सुरक्षा में धीरे-धीरे सुधार हो रहा है, हालांकि विभिन्न क्षेत्रों में इसकी गति अलग-अलग है। वर्ष 2025 में लगातार तीसरे साल वैश्विक भूख पीड़ितों में कमी दर्ज की गई। अनुमान के अनुसार दुनिया में 64.5 करोड़ लोग, यानी वैश्विक आबादी का 7.8 प्रतिशत, अल्पपोषण का शिकार रहे। यह संख्या 2022 के 68.8 करोड़ लोगों की तुलना में कम है, लेकिन सतत विकास लक्ष्यों की तुलना में अब भी अधिक है। इससे स्पष्ट है कि वर्ष 2030 तक 'जीरो हंगर' का लक्ष्य हासिल करना कठिन रहेगा।
क्षेत्रीय स्तर पर तस्वीर काफी अलग दिखाई देती है। एशिया में वर्ष 2025 में केवल 6 प्रतिशत आबादी ही भूख से प्रभावित रही, लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई देशों में भी सुधार जारी रहा। इसके विपरीत अफ्रीका में प्रत्येक पांच में से एक व्यक्ति आज भी अल्पपोषित है। अब दुनिया में सबसे अधिक भूखे लोग अफ्रीका में हैं और अनुमान है कि वर्ष 2030 तक वैश्विक स्तर पर भूखे लोगों में 56 प्रतिशत हिस्सेदारी अकेले अफ्रीका की होगी।
रिपोर्ट चेतावनी देती है कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष सहित हालिया भू-राजनीतिक घटनाक्रम खाद्य सुरक्षा में हो रहे सुधार को धीमा कर सकते हैं। ऊर्जा, उर्वरक और खाद्य कीमतों में संभावित वृद्धि से एशिया में वर्ष 2030 तक पहले के अनुमान की तुलना में एक करोड़ और अफ्रीका में 80 लाख अतिरिक्त लोग भुखमरी का शिकार हो सकते हैं।
भारत के लिए रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि चुनौती अब केवल पर्याप्त खाद्यान्न उपलब्ध कराने की नहीं, बल्कि संतुलित और पौष्टिक भोजन को आम लोगों की पहुंच में लाने की है। देश ने रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन, सरकारी खरीद प्रणाली और दुनिया की सबसे बड़ी खाद्य सब्सिडी योजनाओं में से एक के जरिए खाद्य उपलब्धता सुनिश्चित की है। लेकिन पोषण सुरक्षा अब केवल गेहूं और चावल से नहीं, बल्कि फल, सब्जियां, दालें, दूध और अन्य पोषक खाद्य पदार्थों तक लोगों की पहुंच पर निर्भर करती है, जिनकी कीमतें हाल के वर्षों में अनाज की तुलना में कहीं तेजी से बढ़ी हैं।
रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2025 में वैश्विक स्तर पर स्वस्थ आहार की लागत लगातार बढ़ी। एक व्यक्ति के लिए प्रतिदिन पौष्टिक भोजन की औसत वैश्विक लागत बढ़कर 4.28 पीपीपी डॉलर हो गई, जो 2021 में 3.44 पीपीपी डॉलर और 2017 में 2.94 पीपीपी डॉलर थी। इसका प्रमुख कारण खाद्य महंगाई और पोषणयुक्त खाद्य पदार्थों की कीमतों में निरंतर वृद्धि है। भारत में यह 4.11 पीपीपी डॉलर है।
भारत के संदर्भ में इसका विशेष महत्व है। रिपोर्ट में कहा गया है कि खाद्यान्न की उपलब्धता में सुधार के बावजूद बड़ी संख्या में परिवार अब भी संतुलित भोजन खरीदने में सक्षम नहीं हैं। भारत पर किए गए अध्ययनों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि स्वस्थ आहार की वास्तविक लागत का आकलन केवल सामान्य खाद्य मूल्य सूचकांक से नहीं किया जा सकता, क्योंकि पोषक खाद्य पदार्थों की कीमतें अक्सर अनाज की तुलना में कहीं अधिक तेजी से बढ़ती हैं।
रिपोर्ट का एक अन्य महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि खाद्य पदार्थों की कीमत कम करने की सबसे बड़ी संभावना खेत के बाहर मौजूद है। उपभोक्ता जिस कीमत पर खाद्य पदार्थ खरीदते हैं, उसका 70 से 75 प्रतिशत हिस्सा कटाई के बाद की गतिविधियों जैसे भंडारण, प्रसंस्करण, परिवहन, थोक व्यापार और वितरण से जुड़ा होता है। मूल्य श्रृंखला की कुल लागत का लगभग 40 प्रतिशत इन्हीं गतिविधियों में खर्च होता है। इसलिए यदि कोल्ड चेन, भंडारण, परिवहन और बाजार अवसंरचना में निवेश बढ़ाया जाए तो पौष्टिक खाद्य पदार्थों को काफी सस्ता बनाया जा सकता है।
रिपोर्ट सुझाव देती है कि कृषि नीति को अब केवल अनाज उत्पादन तक सीमित नहीं रहना चाहिए। भविष्य में कृषि उत्पादकता बढ़ाने का फोकस फल, सब्जियों और दलहनों पर होना चाहिए। अनुसंधान एवं विकास, सिंचाई, गुणवत्तापूर्ण बीज, कृषि विस्तार सेवाओं और जलवायु-अनुकूल खेती में निवेश से इन फसलों का उत्पादन बढ़ेगा, उनकी कीमतें कम होंगी और किसानों की आय में भी वृद्धि होगी।
भारत में यह सुझाव सरकार के कृषि विविधीकरण, बागवानी, दलहन और तिलहन उत्पादन बढ़ाने तथा किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) को मजबूत करने के प्रयासों के अनुरूप है। स्वस्थ भोजन की बढ़ती मांग और कुपोषण के साथ-साथ मोटापे जैसी दोहरी पोषण चुनौती से निपटने के लिए यह बदलाव आवश्यक होगा।
वैश्विक खाद्य असुरक्षा में भी कुछ सकारात्मक सुधार दर्ज किए गए हैं। वर्ष 2025 में दुनिया की 25.8 प्रतिशत आबादी, यानी लगभग 210 करोड़ लोग, मध्यम या गंभीर खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे थे। यह संख्या 2024 की तुलना में 8.6 करोड़ कम है। गंभीर खाद्य असुरक्षा झेलने वाले लोगों की संख्या में भी लगभग 2.5 करोड़ की कमी आई है। हालांकि, वैश्विक खाद्य सुरक्षा अभी भी महामारी-पूर्व स्तर तक नहीं पहुंच सकी है।
रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि वर्ष 2030 तक सतत विकास लक्ष्य-2 (जीरो हंगर) हासिल करने के लिए केवल खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। सरकारों को कृषि एवं खाद्य प्रणाली के पूरे ढांचे - अनुसंधान, सिंचाई, गुणवत्तापूर्ण बीज, भंडारण, कोल्ड चेन, परिवहन, व्यापार और पोषण-केंद्रित नीतियों - में निवेश करना होगा। यदि पौष्टिक भोजन को सस्ता और सुलभ बनाने के लिए संरचनात्मक सुधार नहीं किए गए, तो दुनिया पर्याप्त खाद्य उत्पादन करने के बावजूद करोड़ों लोगों को स्वस्थ जीवन के लिए आवश्यक पोषण उपलब्ध नहीं करा पाएगी।

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