भारत की कृषि वृद्धि दर में बागवानी बना इंजन, लेकिन चुनौतियां बरकरारः आरबीआई बुलेटिन
पिछले तीन दशकों में भारत की कृषि वृद्धि दर मुख्यतः पैदावार में सुधार, विविधीकरण और फसल गहनता (क्रॉप इंटेंसिटी) पर आधारित रही है। आरबीआई के अगस्त 2025 के बुलेटिन के अनुसार, फल और सब्ज़ियां इस वृद्धि का सबसे बड़ा कारण बनीं, खासकर छोटे किसानों को लाभ हुआ। हालांकि, पैदावार में अस्थिरता, कोल्ड स्टोरेज की कमी और मूल्य उतार-चढ़ाव जैसी चुनौतियां अब भी सामने हैं।

पिछले तीन दशकों में भारत की कृषि वृद्धि दर में मुख्य रूप से पैदावार (उपज) में सुधार, उच्च मूल्य वाली फसलों की ओर विविधीकरण और फसल गहनता (क्रॉपिंग इंटेंसिटी) बढ़ने के कारण इजाफा हुआ है। भारतीय रिजर्व बैंक के अगस्त 2025 के बुलेटिन में प्रकाशित एक अध्ययन में बताया गया है कि खासकर बागवानी—फलों और सब्जियों—ने कृषि क्षेत्र की मजबूती में केंद्रीय भूमिका निभाई है। हालांकि, पैदावार में उतार-चढ़ाव, भंडारण इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी और मूल्य अस्थिरता अब भी बड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं।
यह अध्ययन आरबीआई के आर्थिक नीति और अनुसंधान विभाग के शिवम ने किया है। इसमें कृषि विकास को चार हिस्सों—क्षेत्र विस्तार, पैदावार में सुधार, मूल्य प्रभाव और विविधीकरण—में विभाजित कर विश्लेषण किया गया। अध्ययन आठ प्रमुख फसलों—धान, गेहूं, दालें, मोटे अनाज, फल और सब्जियां, तिलहन, गन्ना और तंबाकू—पर केंद्रित रहा, जो सकल फसल क्षेत्र का 80 प्रतिशत और सकल उत्पादन मूल्य का 75 प्रतिशत हिस्सा बनाती हैं।
यील्ड और विविधीकरण रहे सबसे बड़े कारक
1992-93 से 2022-23 के बीच कृषि विकास में सबसे अधिक योगदान यील्ड सुधार (1.67 प्रतिशत) का रहा। इसके बाद विविधीकरण (0.68 प्रतिशत) और क्षेत्रफल विस्तार (0.54 प्रतिशत) रहे। इस दौरान मूल्य प्रभाव नकारात्मक (-0.11 प्रतिशत) रहा।
यह विश्लेषण दशकवार किया गया है। इसमें 1990 के दशक में उपज वृद्धि और विविधीकरण मुख्य कारक रहे। 2002-03 से 2011-12 के बीच विविधीकरण और क्षेत्रफल वृद्धि का असर ज्यादा दिखा। वहीं 2012-13 से 2022-23 तक चारों घटक—क्षेत्र, मूल्य, उपज और विविधीकरण—ने सकारात्मक योगदान दिया। इस दौरान फसल गहनता 139.15 प्रतिशत से बढ़कर 155.4 प्रतिशत हो गई।
फल और सब्जियां बने वृद्धि का आधार
अध्ययन में पाया गया कि फल और सब्जियां लगातार पारंपरिक खाद्यान्नों से बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं। 2022-23 में सकल फसल क्षेत्र में केवल 5.77 प्रतिशत हिस्सेदारी के बावजूद उन्होंने सकल उत्पादन मूल्य में 28.19 प्रतिशत योगदान दिया।
तीनों दशकों में फलों और सब्जियों की वार्षिक वृद्धि दर सबसे अधिक रही— 1992-2002 के बीच 5.86 प्रतिशत, 2002-2012 में 4.33 प्रतिशत और 2012-2023 में 3.84 प्रतिशत। इनके बिना कुल कृषि वृद्धि दर काफी धीमी होती।
घरेलू उपभोग के आंकड़े भी इसी प्रवृत्ति को दर्शाते हैं। 2004-05 में परिवारों के खान-पान के कुल खर्च में फलों का हिस्सा 2 प्रतिशत था, जो 2023-24 में बढ़कर 3.9 प्रतिशत हो गया। वहीं अनाज पर खर्च का हिस्सा लगातार घटा है।
छोटे किसान बने अगुवा
कृषि जनगणना के अनुसार, छोटे किसानों ने बागवानी की ओर सबसे अधिक रुझान दिखाया है। 2015-16 में छोटे किसानों ने अपने सकल फसल क्षेत्र का 6.08 प्रतिशत बागवानी में लगाया, जबकि मध्यम आकार के किसानों ने 5.32 प्रतिशत और बड़े किसानों ने 5.04 प्रतिशत।
सब्जियां छोटे किसानों की पहली पसंद रही हैं क्योंकि वे श्रम-प्रधान होती हैं, जल्दी उत्पादन देती हैं और कम पूंजी मांगती हैं। इसके विपरीत बड़े किसान फलों और मसालों की खेती को प्राथमिकता देते हैं, जिनमें अधिक निवेश और लंबा समय लगता है।
चुनौतियां: उपज, भंडारण और मूल्य
यील्ड में उतार-चढ़ाव अब भी एक बड़ी चुनौती है, खासकर आम, अंगूर और सपोटा जैसी फसलों में जहां उत्पादकता में गिरावट देखी गई। सब्जियों में सामान्य तौर पर वृद्धि हुई है लेकिन मटर और कसावा जैसी फसलों में अस्थिरता बनी रही। इस समस्या से निपटने के लिए सरकार ने मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर और 2021 में शुरू किए गए हॉर्टिकल्चर क्लस्टर डेवलपमेंट प्रोग्राम जैसे कार्यक्रम लागू किए हैं।
कटाई के बाद भंडारण की कमी एक और बड़ी बाधा है। अनुमान है कि हर साल करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये का नुकसान होता है। 2022 तक भारत की कोल्ड स्टोरेज क्षमता 382 लाख टन थी, लेकिन इसका 71 प्रतिशत हिस्सा केवल चार राज्यों—उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात और पंजाब—में केंद्रित है और 75 प्रतिशत क्षमता सिर्फ आलू के लिए उपयोग होती है। हाल के वर्षों में कृषि अवसंरचना निधि (AIF) और मेगा फूड पार्क जैसी योजनाएं इस समस्या को कम करने के प्रयास में हैं।
मूल्य अस्थिरता तीसरी बड़ी चुनौती है। 2012-13 के बाद फलों की कीमतों में स्थिरता आई है, लेकिन सब्जियों की कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ा है, खासकर प्याज, आलू और टमाटर में। इसके विपरीत धान और गेहूं जैसी अनाज फसलों की कीमतें स्थिर और बढ़ती रही हैं क्योंकि भारतीय खाद्य निगम (FCI) इनकी बड़े पैमाने पर खरीद करता है। इस असंतुलन को देखते हुए सरकार ने 2018-19 में ऑपरेशन ग्रीन्स की शुरुआत की, जिसे बाद में सभी फल और सब्जियों (TOTAL scheme) तक विस्तारित किया गया।
आगे की राह
अध्ययन में निष्कर्ष निकाला गया है कि कृषि की स्थायी वृद्धि के लिए यील्ड सुधार और बागवानी का विविधीकरण ही सबसे मजबूत आधार हैं। किसानों को निर्यात बाजारों और शहरी उपभोक्ताओं से जोड़ना, अंतरफसली खेती को बढ़ावा देना और एग्रो-प्रोसेसिंग उद्योगों का विस्तार भविष्य की प्राथमिकताएं होनी चाहिए।
साथ ही, जलवायु परिवर्तन और कीट प्रबंधन जैसी नई चुनौतियों से निपटने के लिए कृषि अनुसंधान को और मजबूत करना आवश्यक है। इससे किसानों की आय में स्थिरता आएगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी।