संविधान सभा की बहस में पंचायतों के बारे में क्या थी डॉ भीमराव आंबेडकर की राय

आंबेडकर ने कहा, मेरा मानना है कि गांव भारत के लिए तबाही की तरह हैं। इसलिए मुझे आश्चर्य होता है कि जो लोग क्षेत्रवाद और संप्रदायिकता का विरोध करते हैं वे गांव के बड़े पैरोकार बनते हैं। अज्ञानता, संकीर्णता और सांप्रदायिकता के सिवाय गांव और क्या है? मुझे खुशी है कि संविधान के ड्राफ्ट में गांव को खत्म कर व्यक्ति को इकाई माना गया

संविधान सभा की बहस में पंचायतों के बारे में क्या थी डॉ भीमराव आंबेडकर की राय

बाबा साहब भीमराव आंबेडकर भारत के महान सपूतों में एक थे। वे सिर्फ सांसद, जाने-माने विद्वान और संविधान विशेषज्ञ ही नहीं बल्कि भारत में दलित उत्थान के बड़े सुधारक भी थे (1)। वे अपनी पूरी जिंदगी ऐसी सामाजिक व्यवस्था स्थापित करने के लिए संघर्ष करते रहे जो स्वाधीनता, समानता और सार्वभौमिक भाईचारे पर आधारित हो। इसके लिए ना सिर्फ समाज के दलित और शोषित वर्ग की आजादी और मुक्ति जरूरी है, बल्कि ऐसे संस्थानों की स्थापना भी जरूरी है जो लोकतांत्रिक होने के साथ-साथ आम जन के नजदीक हो तथा सरकार में विभिन्न स्तरों पर महिलाओं और वंचित वर्ग का प्रतिनिधित्व हो। इसे हासिल करने के लिए विकेंद्रीकृत ग्रामीण गवर्नेंस बहुत महत्वपूर्ण है ताकि समाज के हर व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए सामाजिक आर्थिक विकास का उचित वातावरण तैयार किया जा सके (2)। इस नजरिए से यह देखना बड़ा ही रोचक है कि संविधान सभा में बहस के बाद किस तरह पंचायतें संविधान का हिस्सा बनीं, संविधान में पंचायतों को शामिल करने पर बाबासाहेब के क्या विचार थे और आखिरकार किस तरह ये संस्थान संविधान का हिस्सा बने। इस लेख में इन सवालों पर विचार किया गया है ताकि विद्वानों और शोधकर्ताओं कि इस क्षेत्र में रुचि जगे।

1.संविधान सभा में बहस और पंचायतें

आंबेडकर ने 4 नवंबर 1948 को संविधान सभा में एक प्रस्ताव रखा। मैटकाफ को उद्धृत करते हुए उन्होंने लिखा, "एक के बाद एक राजवंश खत्म हो जाते हैं, एक के बाद दूसरी क्रांति आती है, हिंदू, पठान, मुगल, मराठा, सिख, अंग्रेज सभी बारी बारी से मालिक बनते हैं, लेकिन ग्रामीण समुदाय वहीं रहते हैं। मुसीबत के समय वे एकजुट होकर अपना बचाव करते हैं। जब शत्रु की सेना गुजरती है तो यह ग्राम समुदाय अपने मवेशियों को बाड़े के भीतर रखते हैं और शत्रु सेना को गुजर जाने देते है।" (जाकर, 1964, पेज 35) मैटकाफ के उद्धरण के बाद आंबेडकर ने टिप्पणी की, "ग्राम समुदायों ने अपने देश के इतिहास में इस तरह की भूमिका निभाई है। यह जानकर किसी के मन में उनके प्रति गर्व का क्या भाव आता है? तमाम विपत्तियों में उन्होंने अपने आप को सुरक्षित रखा। लेकिन जीवित रहने मात्र का कोई मोल नहीं है। सवाल है कि वह किस धरातल पर जीवित रहे। निश्चित रूप से वह एक निचले और खुदगर्ज धरातल पर थे। मेरा मानना है कि यह गांव भारत के लिए तबाही की तरह थे। इसलिए मुझे आश्चर्य होता है कि जो लोग क्षेत्रवाद और संप्रदायिकता का विरोध करते हैं वे गांव के बड़े पैरोकार बनते हैं। स्थानीय बोली, अज्ञानता, संकीर्णता और सांप्रदायिकता के सिवाय गांव और क्या है? मुझे खुशी है कि संविधान के ड्राफ्ट में गांव को खत्म कर व्यक्ति को इकाई माना गया है। (वही, 1964, पेज 35)

संविधान सभा में आंबेडकर के इन शब्दों के कहने के बाद ग्राम पंचायत के मुद्दे पर बहस शुरू हुई। संविधान सभा के कुछ सदस्यों के विचार यहां दिए जा रहे हैं ताकि यह समझा जा सके कि संविधान में पंचायतों को कैसे शामिल किया गया।

दामोदर स्वरूप सेठ ने स्थानीय स्व सरकार की वकालत की। प्रोफेसर एस एल सक्सेना ने ग्राम स्वराज या ग्राम पंचायत के लिए महात्मा गांधी के विचारों का समर्थन किया। एच वी कामत ने भी पंचायतों का समर्थन करते हुए कहा कि अगर पंचायती राज नहीं तो डॉ आंबेडकर गांवों के विकास के लिए और क्या सुझाव देते हैं। के संथानम ने डॉ आंबेडकर के कुछ बातों पर तो सहमति जताई लेकिन उन्होंने यह स्वीकार नहीं किया की ग्राम पंचायत ही सभी राष्ट्रीय समस्याओं की जड़ हैं। आरके सिधवा ने कहा, यह संविधान इस देश में लोकतंत्र के लिए तैयार किया गया है और डॉ आंबेडकर ने स्थानीय निकायों और गांव की अनदेखी कर लोकतंत्र के विचार का ही विरोध किया है। स्थानीय निकाय देश की सामाजिक और आर्थिक जीवन का आधार हैं और अगर इस संविधान में स्थानीय निकायों के लिए कोई जगह नहीं है तो मैं आपसे कहना चाहूंगा कि यह संविधान विचार के काबिल ही नहीं है। (वही, 1964, पेज 39)

डॉ मनमोहन दास ग्राम पंचायत से असहमत तो नहीं थे लेकिन उन्होंने चेताया कि जब तक हमारे गांव के लोगों को शिक्षित ना किया जाए, जब तक वे राजनीतिक रूप से जागरूक ना हों, जब तक वह अपने नागरिक अधिकारों और जिम्मेदारियों से वाकिफ ना हों तब तक ग्राम पंचायत की व्यवस्था उनके लिए फायदेमंद के बजाय नुकसानदायक साबित होगी। (वही, 1964, पेज 40)

प्रो एनजी रंगा ने कहा, हम प्रशासन का केंद्रीकरण चाहते हैं अथवा विकेंद्रीकरण? महात्मा गांधी ने 30 वर्षों तक विकेंद्रीकरण की वकालत की। हम कांग्रेसी होने के तौर पर भी विकेंद्रीकरण को समर्पित हैं। सच तो यह है कि आज पूरी दुनिया विकेंद्रीकरण के पक्ष में है। (वही, 1964, पेज 41)

तमाम सदस्यों के विचारों से यह तो स्पष्ट होता है कि संविधान सभा के लगभग सभी सदस्य संविधान में पंचायत को शामिल करने के पक्ष में थे। इसलिए उन्होंने डॉ आंबेडकर के विचारों के प्रति असहमति जताई।

के. संथानम ने 22 नवंबर 1948 को यह प्रस्ताव रखा:-

अनुच्छेद 31 के बाद अनुच्छेद 31ए जोड़ा जाए। राज्य ग्राम पंचायतों को संगठित करने के लिए कदम उठाएंगे और उन्हें वह अधिकार देंगे जो स्वशासन इकाई के तौर पर कार्य करने के लिए आवश्यक होंगे। डॉ आंबेडकर ने तत्काल यह कहकर संशोधन प्रस्ताव का समर्थन किया कि मुझे और कुछ नहीं जोड़ना है। इस तरह प्रस्ताव को सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया और अनुच्छेद 31ए अंततः राज्य नीति के डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स के हिस्से के रूप में अनुच्छेद 40 बना। (वही, 1964, पेज 43)

यहां यह बात गौर करने लायक है कि पंचायतों की आलोचना करने वाले आंबेडकर संविधान में ग्राम पंचायतों को शामिल करने के संथानम के प्रस्ताव पर सहमत हुए। 

2.पंचायतों पर 1932 में डॉ आंबेडकर के विचार

यह जानना रोचक है कि डॉ आंबेडकर ने 1948 में संविधान सभा की बहस में पंचायतों में कमजोर वर्ग के लिए जगह की वकालत क्यों नहीं की, जबकि 16 साल पहले 6 अक्टूबर 1932 को जब बांबे असेंबली में ग्राम पंचायत विधेयक पर चर्चा हो रही थी तब उन्होंने वंचित वर्ग के लिए विशेष प्रावधान की खातिर अधिकारों के हस्तांतरण की नीति का समर्थन किया था। तब डॉ आंबेडकर ने कहा था, मैं यह कहना चाहूंगा कि अधिकार सौंपने की नीति में सिद्धांत रूप से मेरी कोई आपत्ति नहीं है। अगर ऐसा लगता है कि इस प्रेसिडेंसी के स्थानीय बोर्ड पर स्थानीय बोर्ड अधिनियम के तहत बताए गए कार्यों के कारण अधिक काम का बोझ होता है और वह अपने काम को प्रभावी तरीके से अंजाम नहीं दे पा रहे हैं, तब मैं कहना चाहूंगा कि स्थानीय बोर्ड के बोझ को कम करने के लिए ग्राम पंचायतों की स्थापना की जाए। (मून, 1982, पेज 106)

जहां तक वंचित वर्ग के लिए स्थान की बात है तो डॉ आंबेडकर ने टिप्पणी की, "बिल में यह प्रावधान है कि ग्राम पंचायत को सभी वयस्क पुरुष और स्त्रियां मिलकर चुनें। लेकिन मैं यहां वंचित वर्गों की तरफ से बोलते हुए यह स्पष्ट करना चाहूंगा कि मुझे इस बात में जरा भी संदेह नहीं कि वयस्क मताधिकार हमारे लिए पर्याप्त नहीं हैं। माननीय मंत्री महोदय यह बात भूल रहे हैं कि हर गांव में वंचित वर्ग अल्प संख्या में हैं। उनकी स्थिति बेहद खराब है। ऐसे में यह मान लेना ठीक नहीं कि वह वयस्क मताधिकार को सहर्ष स्वीकार करेंगे। मेरा मानना है कि सिर्फ वयस्क मताधिकार से अल्पसंख्यक बहुसंख्यक नहीं हो जाएंगे।

इसलिए मैं यह कहने को बाध्य हूं कि यदि पंचायत गठित की जाती हैं तो उनमें अल्पसंख्यकों के लिए विशेष प्रतिनिधित्व होना चाहिए। किसी भी सूरत में वंचित वर्गों के लिए विशेष स्थान होना चाहिए। मैं तब तक भारत में स्वशासन के सिद्धांत को स्वीकार नहीं कर सकता जब तक प्रत्येक स्वशासन संस्थान में वंचित वर्ग को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए विशेष प्रतिनिधित्व का प्रावधान ना किया जाए।

3.आलोचना

शुरुआत में डॉ आंबेडकर ने संविधान में पंचायतों को शामिल करने का विरोध किया लेकिन जब संविधान सभा के ज्यादातर सदस्यों ने पंचायतों के पक्ष में तर्क दिया और संथानम ने पंचायतों को राज्यों के डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स में शामिल करने का प्रस्ताव रखा तो डॉ आंबेडकर पंचायतों को संविधान में शामिल करने पर राजी हो गए। उनके सहमत होने की एक वजह शायद यह रही होगी कि उन्होंने यह सोचा होगा कि पंचायतें राज्य सरकारों की इच्छा पर निर्भर करेंगी, इसलिए यह संस्थान मजबूत नहीं होंगे और अनुच्छेद 40 के प्रावधान संविधान तक ही सीमित रहेंगे। 1932 के बाद पंचायतों के कामकाज के अनुभव से डॉ आंबेडकर को एहसास हुआ होगा कि अगर पंचायतों को राज्यों के डायरेक्टिव प्रिंसिपल का हिस्सा बनाया जाए तो राजनीतिक नेता और अफसर उन्हें मजबूत नहीं होने देंगे क्योंकि वह खुद नहीं चाहेंगे कि पंचायतें मजबूत हों।

आजादी के बाद पंचायतों के कामकाज से यह स्पष्ट है कि उन्होंने ग्रामीणों के विकास में कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं निभाई है। जिन नेताओं ने संविधान सभा में ग्राम पंचायत के विकास के पक्ष में बढ़-चढ़कर बहस की थी उन्होंने एक दशक तक पंचायतों के विकास में कोई सक्रिय योगदान नहीं किया। (जाकर, 1964, पेज 45)

हालांकि इस लेखक का मानना है कि डॉ आंबेडकर को संविधान के भाग 9 में पंचायतों को रखने के पक्ष में बहस करनी चाहिए थी। उन्हें अनुसूचित जाति, जनजाति और महिलाओं को इन संस्थानों में पर्याप्त स्थान देने के प्रावधान के लिए संविधान सभा को सुझाव देना चाहिए था। अगर ऐसा उसी समय किया जाता, जैसा संविधान लागू होने के 43 वर्षों बाद 73वें संविधान संशोधन के तहत किया गया, तो आज वंचित वर्ग की स्थिति बेहतर होती। संभव है कि डॉ आंबेडकर ने पंचायतों में समाज के समृद्ध वर्ग के अधिकारों और शक्तियों को तथा वंचित वर्ग की दुर्दशा को देखा हो, इसलिए वह पंचायतों के खिलाफ थे। लेकिन इसके लिए वह प्रतिनिधि चुनने की क्षमता विकसित करने के पक्ष में बहस कर सकते थे, खासकर वंचित वर्ग के लिए।

अंत में यही कहा जा सकता है कि डॉ आंबेडकर ने जो कहा था पंचायतों के कामकाज में आखिरकार वही दिख रहा है। अगर डॉ आंबेडकर की बातों को हमें गलत साबित करना है तो उसके लिए पंचायतों को भारतीय संघवाद का अभिन्न अंग बनाना पड़ेगा। जिस तरह संविधान में केंद्र और राज्यों के अधिकार अलग-अलग बताए गए हैं उसी तरह राज्यों और पंचायतों के अधिकारों का भी बंटवारा होना चाहिए। पंचायतों को राज्य की विधायिका की दया पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए, संविधान में उनके लिए अधिकार निर्धारित किए जाने चाहिए।

(लेखक इंडियन इकोनामिक सर्विस के पूर्व अधिकारी और स्थानीय गवर्नेंस के विशेषज्ञ हैं)

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1.दलित का अभिप्राय ग्रामीण भारत के दमित, शोषित और वंचित वर्ग से है। मोटे तौर पर अनुसूचित जाति, जनजाति, अत्यधिक पिछड़ा वर्ग और महिलाएं इस परिभाषा के दायरे में आती हैं। 

2.गवर्नेंस का अर्थ आमजन, सिविल सोसाइटी, सरकार और बाजार को शामिल करते हुए सामूहिक कार्य है। यहां विकेंद्रीकृत ग्रामीण स्थानीय गवर्नेंस का मतलब पंचायती राज संस्थानों के माध्यम से गवर्नेंस है।