स्थानीय निकायों में विकेंद्रीकरण के लिए 15वें आयोग वित्त की सिफारिशों पर 'अकाउंटेंट अप्रोच' हावी

स्थानीय निकायों के विकेंद्रीकरण के नजरिए से देखा जाए तो 15वें वित्त आयोग की सिफारिशें ‘अकाउंटेंट अप्रोच’ पर आधारित है ‘अर्थशास्त्री के अप्रोच’ पर नहीं। समस्याओं को समग्र रूप से देखने के लिए यह नजरिया व्यवहारिक नहीं है

स्थानीय निकायों में विकेंद्रीकरण के लिए  15वें आयोग वित्त की सिफारिशों पर 'अकाउंटेंट अप्रोच' हावी

15वें वित्त आयोग का गठन 27 नवंबर 2017 को हुआ था। इसने 9 नवंबर, 2020 को राष्ट्रपति को अपनी सिफारिशें सौंपी। इसे जो जिम्मेदारियां दी गई थीं उनमें एक राज्यों के लिए परफॉर्मेंस आधारित इंसेंटिव मापने का तरीका भी था। राज्यों की परफॉर्मेंस इन क्षेत्रों में देखी जानी थी- 1) गुणवत्तापूर्ण मानव संसाधन समेत बुनियादी सुविधाओं के लिए स्थानीय निकायों को ग्रांट का प्रावधान और सेवाओं की डिलीवरी सुधारने में परफॉर्मेंस ग्रांट सिस्टम पर अमल तथा 2) साफ-सफाई, सॉलि़ड वेस्ट मैनेजमेंट और खुले में शौच रोकने के लिए व्यावहारिक बदलाव की दिशा में की गई प्रगति। उल्लेखनीय है कि स्थानीय निकायों के दायरे में पंचायती राज संस्थान और शहरी स्थानीय निकाय दोनों आते हैं। लेकिन इस लेख में हम पंचायती राज संस्थानों की चर्चा करेंगे।

 

टेबल 1

स्थानीय प्रशासन को ग्रांट (करोड़ रुपये में)

 

 

ग्रांट

 

2021-22

 

2022-23

 

2023-24

 

2024-25

 

2025-26

 

Total

  1. ग्रामीण और शहरी निकायों के लिए कुल ग्रांट

80207

82613

85091

89997

90003

427911

(a) प्राथमिक स्वास्थ्य के लिए ग्रांट

13192

13192

13851

14544

15272

70051

(b) प्राथमिक स्वास्थ्य के अतिरिक्त स्थानीय निकायों को दी जाने वाली अन्य ग्रांट

67015

69421

71240

75453

74731

357860

ग्रामीण निकायों और शहरी निकायों के बीच ग्रांट (b) का वितरण

67 : 33

67 : 33

66 : 34

66 : 34

65 : 35

-

(I) ग्रामीण स्थानीय निकायों को ग्रांट

44901

46513

47018

49800

48573

236805

(ii) शहरी स्थानीय निकायों को ग्रांट

22114

22908

24222

25653

26158

121055

2. नए शहरों के इन्क्यूबेशन के लिए ग्रांट

 

2000

2000

2000

2000

8000

3. साझी म्युनिसिपल सेवाओं के लिए ग्रांट

90

90

90

90

90

450

कुल (1+2+3)

80297

84703

87181

92087

92093

436361

 

टेबल 1 में पंचायती राज्य संस्थानों (ग्रामीण स्थानीय निकाय) और शहरी स्थानीय निकायों का हिस्सा बताया गया है। पंचायती राज संस्थानों और शहरी स्थानीय निकायों के लिए निर्धारित कुल रकम में 2,36,805 करोड़ पंचायती राज संस्थानों के लिए हैं। टेबल में पंचायती राज संस्थानों और शहरी स्थानीय निकायों का सालाना हिस्सा भी बताया गया है। स्वास्थ्य और शहरों के लिए अन्य ग्रांट भी टेबल में दिए गए हैं।

रोचक बात है कि पिछले वित्त आयोग में सिर्फ ग्राम पंचायतों को ग्रांट दी थी जबकि 15वें वित्त आयोग में हर स्तर (निचले, मध्यम और सर्वोच्च) के पंचायती राज संस्थानों को शामिल किया है। यही नहीं, सभी इलाकों को 15वें वित्त आयोग की ग्रांट में शुमार किया गया है, भले ही वहां पंचायत हों या नहीं। छठी अनुसूची और अन्य अनुसूची के क्षेत्र इसमें आते हैं। यह क्षेत्र देश के उत्तर पूर्व में स्थित हैं। विभिन्न स्तर के संस्थानों को फंड आवंटित करने के बारे में आयोग का कहना है कि यह नवीनतम राज्य वित्त फाइनेंस आयोग की सिफारिशों पर आधारित है।  इसमें इन बातों का ख्याल रखा गया हैः-

  • ग्राम पंचायतः 70% से कम नहीं और 85% से अधिक नहीं
  • ब्लॉक पंचायतः 10% से कम नहीं और 25% से अधिक नहीं
  • जिला पंचायतः 5% से कम नहीं और 15% से अधिक नहीं

 

ग्रांट के लिए ग्रामीण स्थानीय निकायों की पात्रता

15वें वित्त आयोग ने स्थानीय निकायों को ग्रांट देने के लिए एंट्री लेवल की शर्तें रखने की सिफारिश की है। इन सिफारिशों में शामिल हैं 1) राज्य वित्त आयोग का गठन, उसकी सिफारिशों पर अमल और की गई कार्रवाई (एक्शन टेकेन) के बारे में विस्तृत मेमोरेंडम मार्च 2024 तक या उससे पहले राज्य की विधायिका में रखना और 2) प्रोविजनल तथा ऑडिटेड अकाउंट ऑनलाइन सार्वजनिक डोमेन में रखना। इसका अर्थ यह है कि पंचायती राज संस्थाएं बिना ऑडिट के फंड नहीं पाएंगी। यह महत्वपूर्ण प्रावधान चुने हुए प्रतिनिधियों और अधिकारियों दोनों के संज्ञान में लाया जाना चाहिए, क्योंकि उनके स्तर पर की गई ढिलाई के कारण गांव 15वें वित्त आयोग की मदद से महरूम रह जाएंगे।

 

संबद्ध और निर्बंध ग्रांट

संबद्ध ग्रांट का मतलब है कि इस राशि का इस्तेमाल पहले बताए कार्यों में ही हो सकेगा। इस मामले में पंचायती राज संस्थानों को कोई छूट नहीं है। निर्बंध ग्रांट में इन संस्थानों को स्थानीय जरूरतों के मुताबिक ग्रांट की राशि खर्च करने की छूट होती है। यह इस प्रकार हैः-

  • कुल ग्रांट का 40% हिस्सा निर्बंध होगा और वह राशि ग्यारहवीं अनुसूची में शामिल 29 मदों में खर्च की जा सकती है। इसमें वेतन और अन्य इस्टैब्लिशमेंट खर्च शामिल नहीं हैं। बाहरी एजेंसी से खाते की ऑडिटिंग पर होने वाले खर्च को राज्य सरकार अनुमति देगी और वह राशि इसी ग्रांट से खर्च होगी।
  • ग्रामीण स्थानीय निकाय को दी गई  कुल ग्रांट का 30% पेयजल, बारिश के पानी के संचय और पानी की रीसाइक्लिंग पर खर्च होगा।
  • कुल ग्रांट का 30% हिस्सा साफ-सफाई (सैनिटेशन) और खुले में शौच से मुफ्त (ओडीएफ) का स्टेटस बनाए रखने में होगा। घरों से निकलने वाले कचरे, मानव मल-मूत्र और विष्ठा गाद के प्रबंधन और ट्रीटमेंट पर होने वाला खर्च इसमें शामिल है।

 

ग्रांट का जारी होना

हर साल जून और अक्टूबर में दो बराबर किस्तों में राशि जारी की जाएगी। इससे पहले यह सुनिश्चित किया जाएगा कि संस्थान एंट्री लेवल के बेंचमार्क और अन्य मानदंड पूरे करता है या नहीं। केंद्र सरकार से रकम मिलने के 10 कार्य दिवसों के भीतर राज्य सरकार स्थानीय निकायों को ग्रांट की रकम ट्रांसफर करेगी। इसमें देरी होने पर राज्य सरकार ब्याज समेत वह रकम देगी। ब्याज की दर पिछले साल बाजार से जुटाई गई रकम या स्टेट डेवलपमेंट लोन की ब्याज दर के बराबर होगी।

 

स्वास्थ्य  क्षेत्र 

15वें वित्त आयोग की सिफारिशों में स्वास्थ्य क्षेत्र पर फोकस किया गया है। यह बात इन तथ्यों से साबित होती हैः-

  • स्थानीय निकायों के लिए निर्धारित कुल ग्रांट में से ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए 70,051 करोड़ रुपये निर्धारित किए गए हैं। यह राशि 5 वर्षों के लिए है।
  • स्वास्थ्य के लिए ग्रांट की राशि स्थानीय प्रशासन (पंचायतों और निगमों) के जरिए दी जाएगी।
  • यह सहायता राशि उप केंद्र स्तर पर 27,581 स्वास्थ्य एवं वैलनेस केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र स्तर पर 681 स्वास्थ्य एवं वैलनेस केंद्रों में आवश्यक इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने में खर्च होगी। ग्रामीण इलाकों में यह राशि पंचायतों की मदद से खर्च होगी।

 

पंचायत और आपदा 

15वें वित्त आयोग ने  आपदा  की तैयारी और प्रबंधन के लिए  पंचायती राज संस्थानों को अधिकार संपन्न बनाने की सिफारिश की है। आयोग का मत है कि स्टेट डिजास्टर रिस्पांस फंड (एसडीआरएफ) और स्टेट डिजास्टर मिटिगेशन फंड (एसडीएमएफ) के लिए आवंटित राशि में से कुछ हिस्सा राज्य सरकारों को जिलों को देना चाहिए। कुछ मामलों में पंचायत नोडल एजेंसी के तौर पर काम करेंगे। इनमें शामिल हैं 1) वाटर टैंक, तालाब और अन्य भंडारण की जगहों को गहरा करना 2) पौधे लगाना और वनों का विकास 3) लोगों के लिए बाढ़ शेल्टर का निर्माण 4) मवेशियों के शेल्टर का निर्माण 5) बाढ़ बीमा के लिए इंसेंटिव 6) वैकल्पिक फसल योजना 7) परकोलेशन टैंक में सुधार 8) गांव के तालाब/टैंक का सुधार 9) बारिश केजल का संचयन 10) ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई सिस्टम 11) जलाशय प्रणाली का निर्माण और उनकी मॉनिटरिंग  12) पानी का इस्तेमाल करने वाली एसोसिएशन का गठन 13) तड़ित बिजली कंडक्टर नेटवर्क की स्थापना 14) तड़ित बिजली गिरने की चेतावनी जारी करना और 15) तड़ित बिजली से होने वाले नुकसान के प्रति लोगों को जागरूक करना।

 

समीक्षा

आयोग की सिफारिशें, जिन्हें केंद्र सरकार ने स्वीकार किया है, विकेंद्रीकृत व्यवस्था में निचले स्तर तक लोकतंत्र को ले जाने के लिए महत्वपूर्ण हैं। पंचायतों की मांग थी कि ग्राम पंचायतों के अलावा दूसरे स्तर की संस्थानों को भी 15वें वित्त आयोग की मदद के दायरे में लाया जाना चाहिए। आयोग की सिफारिशों में इस मांग को शामिल किया गया है। आयोग की सिफारिशों पर निम्न टिप्पणियां की जा सकती हैं।

  1. स्थानीय निकायों के कामकाज की परफॉर्मेंस देखने के लिए पंचायती राज संस्थानों में गवर्नेंस के पहलू को शामिल नहीं किया गया है। बजाय इसके सिर्फ ऑडिट पर फोकस किया गया है जो महज एक तकनीकी काम है। अभी तक ऑडिट ना किए जाने का मुख्य कारण यही है कि नियमों को लागू करने में गवर्नेंस का ख्याल नहीं रखा जाता है। पंचायती राज कानून में जो प्रावधान किए गए हैं उन्हें लागू नहीं किया गया है। अगर वास्तव में ग्राम सभा की बैठक में हो, ग्राम पंचायत के सभी वार्ड सदस्यों को एजेंडा नोट दिए जाएं, सब्जेक्ट कमेटी/स्थायी समिति गठित की जाए और वे काम करें तो ऑडिटिंग की समस्या ही ना खड़ी हो। पंचायती राज कानून में अलग-अलग फोरम पर लोगों की भागीदारी के बारे में जो बातें कही गई हैं उन्हें तरजीह दी जानी चाहिए। यहां एक अतिरिक्त शर्त जोड़ी जा सकती है कि अगर गवर्नेंस के मुद्दे का समाधान नहीं किया गया तो सहायता राशि काटी जा सकती है। ऑडिट तो सिर्फ एक तकनीकी मुद्दा है। इससे लोगों की भागीदारी नहीं होती जबकि हर तरह के विकास के लिए वह जरूरी है। इस आधार पर मेरा कहना है कि ऑडिट में अकाउंटेंट का नजरिया अपनाने के बजाय विकेंद्रीकृत व्यवस्था में लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
  2. संविधान की 11वीं अनुसूची में शामिल 29 मदों पर राशि खर्च करने की खुली छूट दी गई है। यहां आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय की योजना बनाना और उस पर अमल की शर्त को राशि जारी करने से जोड़ा जाना चाहिए। योजना पहले ग्राम स्तर पर बने और फिर उसे जिला स्तर (डिस्टिक प्लानिंग कमिटी) पर ले जाया जाए। पुराने अनुभव बताते हैं कि 40% निर्बंध राशि नालों, सड़कों आदि के निर्माण पर खर्च की जा सकती है। यानी गांव में खड़ंजा और पड़ंजा बिछाए जाते रहेंगे, जो काम एक योजना से दूसरी योजना में चला आ रहा है।
  3. आयोग की सिफारिशों में पंचायती राज संस्थानों के चुने हुए प्रतिनिधियों और अधिकारियों के क्षमता विकास पर फोकस किया जाना चाहिए था। इस पर अलग अध्ययन की जरूरत है क्योंकि यह एक समस्या है और इस पर अलग से ध्यान दिया जाना चाहिए। यह देखा जाना चाहिए था  कि ग्रामीण इलाकों में प्रशिक्षण संस्थान क्या कर रहे हैं। यहां भी फोकस हार्डवेयर (कंस्ट्रक्शन) पर है, सॉफ्टवेयर (फैकल्टी) पर नहीं। आयोग को इस पर फोकस करना चाहिए था और ग्रांट को इससे जोड़ना चाहिए था ताकि कानून और स्कीम के दिशानिर्देशों में जो लिखा है, वह पंचायतों के कामकाज में भी दिखे।

अंत में, विकेंद्रीकरण के नजरिए से देखा जाए तो आयोग की सिफारिशें ‘अकाउंटेंट अप्रोच’ पर आधारित है ‘अर्थशास्त्री के अप्रोच’ पर नहीं, जो समस्याओं को समग्र रूप से देखे।

(डॉ. महिपाल इंडियन इकोनॉमिक सर्विस के रिटायर्ड अधिकारी और कृपा फाउंडेशन के प्रेसिडेंट हैं। उनसे mpal1661@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है, लेख में व्यक्त राय उनकी निजी है)