'किसान नीति निर्धारण प्रक्रिया में दखल दें, तभी बनेगी बात'

किसान चैंबर ऑफ कॉमर्स की सालाना कॉन्फ्रेंस में वक्ताओं ने दिए कृषि उपकरणों पर टैक्स हटा कर सब्सिडी खत्म करने, ज्यादा कमाई के लिए अधिक मांग वाली फसलों की ओर जाने और 12वीं तक की पढ़ाई में कृषि को भी एक विषय के तौर पर शामिल करने के सुझाव

'किसान नीति निर्धारण प्रक्रिया में दखल दें, तभी बनेगी बात'

किसान हितैषी नीतियों के लिए किसानों को नीति निर्धारण प्रक्रिया में दखल देना पड़ेगा। अभी कृषि से जुड़ी नीतियों में कई खामियां हैं। अगर सरकार कृषि उपकरणों पर टैक्स हटा दे तो उनके दाम कम हो जाएंगे और सब्सिडी देने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। किसानों के पास अपनी फसल को अधिक समय तक भंडारण कर रखने की क्षमता नहीं होती, इसलिए उपज को तत्काल बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता है। ज्यादा कमाई के लिए किसान उस दिशा में जाएं जहां मांग ज्यादा तेजी से बढ़ रही है। इससे उन्हें अच्छी कीमत मिलने की संभावना बढ़ेगी। युवाओं की कृषि में रुचि बढ़ाने के लिए 12वीं तक की पढ़ाई में कृषि को भी एक विषय के तौर पर शामिल किया जाना चाहिए। वहीं किसानों को बिजनेस की तरफ जाना चाहिए और खुद को इंडस्ट्री के रूप में देखकर संबंधित नीतियों में बदलाव के लिए काम करना चाहिए। बुधवार को नई दिल्ली में आयोजित किसान चैंबर ऑफ कॉमर्स की चौथी सालाना कॉन्फ्रेंस में वक्ताओं ने ये सुझाव दिए। सम्मेलन को पूर्व केंद्रीय कृषि मंत्री सोमपाल शास्त्री, पूर्व केंद्रीय स्टील मंत्री चौधरी बीरेंद्र सिंह, नीति आयोग के सदस्य  प्रो. रमेश चांद और नाबार्ड के पूर्व चेयरमैन हर्ष भानवाला समेत कई जाने-माने लोगों ने संबोधित किया।

सभी देशों में किसानों को है सरकार का प्रश्रयः सोमपाल शास्त्री 

सोमपाल शास्त्री ने कहा कि हमारे किसानों के पास उपज को अपने पास रखने की क्षमता नहीं होती है। जब उनकी फसल आती है तभी उसे बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता है। वे अपनी उपज के बदले अधिक कीमत मांगने की स्थिति में नहीं होते। उन्होंने कहा कि सभी देशों में सरकारें किसानों को प्रश्रय देती हैं। स्विट्जरलैंड का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि वहां हर किसान को प्रति हेक्टेयर लगभग ढाई लाख रुपए की मदद हर साल मिलती है। लेकिन भारत में किसानों को मदद पर सवाल उठाए जाते हैं। सरकार 23 फसलों की एमएसपी घोषित करती है लेकिन किसानों को वास्तव में दो या तीन फसलों का एमएसपी ही मिलता है। इके साथ ही उन्होंने कहा कि जिन फसलों का एमएसपी नहीं है उनके लिए सरकार को न्यूनतम बिक्री मूल्य तय करना चाहिए। लगातार टर्म्स ऑफ ट्रेड कृषि के लिए प्रतिकूल बनी हुई है। इस ट्रेंड को बदलना होगा। करों के मोर्चे पर भी बदलाव की जरूरत है। कृषि से जुड़े उत्पादों और उपकरणों पर कर हटा दिये जाएं तो कम सब्सिडी देने की जरूत पड़ेगी। राजनीतिक नेतृत्व ही नीति निर्धारण करता है इसलिए किसानों को सोचना होगा कि इस तरह के नेतृत्व को कैसे मजबूत किया जाए।

देश की संपदा में किसानों का भी हिस्साः चौ. बीरेंद्र सिंह

पूर्व केंद्रीय मंत्री चौधरी बीरेंद्र सिंह ने कहा कि किसानों की लड़ाई एमएसपी, उर्वरकों पर नहीं बल्कि इस बात के लिए होनी चाहिए कि इस देश की संपदा में उनका हिस्सा है या नहीं। इसका उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि पांच सितारा होटलों में एक कॉफी के अगर 200 रुपए लिए जाते हैं तो किसान को उस में इस्तेमाल की गई कॉफी के सिर्फ 2.37 रुपए मिलते हैं। उन्होंने दुख प्रकट करते हुए कहा कि आईएएस बनने के बाद किसान का बेटा भी बदल जाता है। वह किसानों की जरूरतों से अपना नाता तोड़ लेता है।

उन्होंने कहा कि बीते कुछ दशकों के दौरान अगर कीमतों की तुलना की जाए तो सभी तरह के उत्पादों की कीमत कई गुना बढ़ी है लेकिन तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो किसानों की पैदावार की कीमत बहुत कम बढ़ी है। उन्होंने कहा कि यह किसानों के हक की लड़ाई है। किसानों को बताना पड़ेगा कि आर्थिक व्यवस्था में हमारा हिस्सा भी होना चाहिए।

मार्केट इंटेलिजेंस से पहले होगा कीमत का अनुमानः रमेश चंद

मार्केट इंटेलिजेंस की जरूरत पर जोर देते हुए प्रोफेसर रमेश चंद ने सुझाव दिया कि अगर किसानों को फसल की बिजाई के समय यह बताया जाए कि उनकी उपज की संभावित कीमत क्या मिलेगी, तो उन्हें यह अंदाजा होगा कि कौन सी फसल कितने क्षेत्र में बोनी है। इसी तरह अगर उन्हें फसल की कटाई के समय यह पता चले कि आने वाले समय में क्या कीमत रहने वाली है तो वे यह तय कर सकते हैं कि उपज को कब बेचना है। इसी तरह मार्केट इंटेलिजेंस के आधार पर किसानों को यह भी बताया जाना चाहिए कि अगले सीजन में किसी फसल की क्या कीमत रह सकती है।

कृषि विश्वविद्यालयों में स्किल आधारित पाठ्यक्रम की जरूरतः हर्ष भनवाला

नाबार्ड के पूर्व चेयरमैन हर्ष भनवाला ने कृषि विश्वविद्यालयों में स्किल आधारित पाठ्यक्रम की जरूरत बताई। उन्होंने सुझाव दिया कि 12वीं तक की पढ़ाई में कृषि को भी एक विषय के तौर पर शामिल किया जाना चाहिए। इससे युवाओं में रुचि पैदा होगी और जागरूकता बढ़ेगी। उन्होंने कहा कि किसानों को भी उद्योगों की तर्ज पर चैंबर में बिठाना पड़ेगा क्योंकि नीतियां वहीं बनती हैं। उन्होंने कहा कि कृषि क्षेत्र का मतलब सिर्फ खेती नहीं बल्कि इसे ग्रामीण विकास से जोड़कर भी देखना जरूरी है। उन्होंने नाबार्ड के एक पुराने सर्वेक्षण का हवाला देते हुए कहा कि किसानों की सिर्फ 35 फ़ीसदी आमदनी खेती से होती है। बाकी आमदनी दूसरे तरह के रोजगार से होती है। इससे पता चलता है कि ग्रामीण क्षेत्र में लोगों को रोजगार देना आवश्यक है। स्थायी रोजगार के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के प्रोजेक्ट शुरू किए जा सकते हैं।

उन्होंने कहा कि ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर किसानों के हित में भी है क्योंकि सड़क जैसी सुविधाएं खेती के लिए भी जरूरी हैं। उन्होंने कहा कि किसानों के लिए पारंपरिक आय के साधन कम हो रहे हैं। देश में दूध का उत्पादन भले ही बढ़ रहा हो लेकिन अनेक गांव में किसान दूध का पैसा छोड़ रहे हैं। भनवाला ने इंटीग्रेटेड खेती पर भी जोर दिया। उन्होंने बताया कि खेती में सबसे अधिक विविधता आंध्र प्रदेश में है और सबसे कम पश्चिमी उत्तर प्रदेश में। देश के कई हिस्सों में मिश्रित खेती से अनेक किसानों ने अपनी आमदनी बढ़ाई है।

उन्होंने इस बात पर खुशी जताई कि आज आईटी जैसे प्रोफेशनल क्षेत्र के युवा ग्रामीण क्षेत्रों में आकर कार्य कर रहे हैं। उन्होंने दो स्टार्टअप का भी जिक्र किया। एग नेक्स्ट नाम का स्टार्टअप स्पेक्ट्रोस्कॉपी के जरिए दूर बैठे व्यक्ति को बता सकता है कि फल या सब्जी की क्वालिटी कैसी है। इसी तरह एनिमॉल नाम का स्टार्टअप मवेशी क्षेत्र में कार्य कर रहा है। उन्होंने कहा कि खेती को उन्नत बनाने के लिए इस तरह के नए प्रयासों की जरूरत है।

किसान हर जगह हर फसल न बोएः डॉ. भीम सेन दहिया

कृषि वैज्ञानिक डॉ भीम सेन दहिया ने कृषि नीति की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि देश में आज तक कोई कृषि नीति नहीं बन पाई। कहां कौन सी और कितने क्षेत्र में फसल बोई जाए इसकी कोई नीति नहीं है। उन्होंने सुझाव दिया कि किसानों को हर फसल हर जगह नहीं बोनी चाहिए क्योंकि पैदावार पर जलवायु का भी असर होता है। उन्हें जलवायु के हिसाब से ही फसलों का चयन करना चाहिए। उन्होंने कृषि अनुसंधान में सरकारी हस्तक्षेप की जरूरत बताते हुए कहा कि अभी अनुसंधान पर बहुत कम खर्च होता है। अनेक संस्थानों में तो शिक्षक तक का अभाव है।

डॉ दहिया ने बीज, उर्वरक आदि की गुणवत्ता और उपलब्धता सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया उन्होंने कहा कि डाई अमोनियम फास्फेट (डीएपी) की जरूरत बुवाई के समय होती है। अगर यह किसानों को बाद में मिले तो उसका कोई फायदा नहीं। बल्कि इससे किसानों की लागत बिना मतलब बढ़ जाती है। उन्होंने कहा कि अनेक जगहों पर किसान प्रयोग कर अच्छा उत्पादन कर रहे हैं। उनके प्रयोग को देश के दूसरे इलाकों में भी आजमाया जा सकता है। दहिया ने आरोप लगाया कि बहुत कम एफपीओ हैं जो वास्तव में किसानों के लिए काम कर रहे हैं। एसपीओ सरकार से पैसा लेने की स्कीम बन गई है। उन्होंने कहा कि आजकल ऑर्गेनिक फूड की बड़ी चर्चा है लेकिन देश में कोई ऐसी प्रयोगशाला नहीं जो यह साबित कर सके कि कोई खाद्य पदार्थ ऑर्गेनिक है या नहीं। इसी तरह अनेक जगहों पर मिट्टी की जांच के लिए कोई प्रयोगशाला नहीं फिर भी किसानों को सॉयल हेल्थ कार्ड दिए जा रहे हैं।

एमएसपी किसानों के साथ धोखाः कप्तान सिंह

ग्रामीण कल्याण संस्थान से जुड़े कप्तान सिंह ने कहा कि नीति निर्धारण में किसानों की भूमिका लगभग शून्य है। उन्होंने एमएसपी तय करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसे तय करने में किसानों की वास्तविक लागत को ध्यान में नहीं रखा जाता। पहले यह तय किया जाता है कि इस वर्ष कितना एमएसपी देना है। उसके बाद लागत की बैक कैलकुलेशन की जाती है। बिचौलियों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि यहां वे किसानों और खरीदार दोनों से पैसे लेते हैं। कुछ देशों में बिचौलियों के लिए अधिकतम 20 फ़ीसदी कमीशन का नियम है। भारत में भी ऐसा नियम होना चाहिए।

किसान संगठन तथ्यों के आधार पर अपनी बात रखेः हरवीर सिंह

इस मौके पर रूरल वॉयस के एडिटर-इन-चीफ  हरवीर सिंह ने कहा कि किसानों की स्थिति तभी बदलेगी जब नीतियां उनके अनुकूल बनें। किसान हितैषी नीतियों के लिए किसानों को नीति निर्धारण प्रक्रिया में दखल देना पड़ेगा। लेकिन इसके लिए किसान संगठनों को तथ्यों और आंकड़ों के आधार पर अपनी बातें रखनी पड़ेगी। उद्योग चैंबरों का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि सभी चैंबर छोटे-छोटे बदलावों पर बोलते हैं लेकिन किसान संगठन सिर्फ एमएसपी उर्वरक जैसे बड़े विषयों पर ही बात करते हैं। इसका उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि डेढ़ साल से देश में उर्वरकों की समस्या बनी हुई है लेकिन किसानों की तरफ से अभी तक कोई संगठित आवाज नहीं उठाई गई है। इसी तरह इस वर्ष अचानक तापमान बढ़ने से गेहूं किसानों को जो नुकसान हुआ उसका उन्हें मुआवजा नहीं मिला लेकिन किसान संगठनों की तरफ से कोई आवाज नहीं उठाई गई। उन्होंने कहा कि बजट से पहले चर्चा में इंडस्ट्री के लोग तो जाते हैं लेकिन किसानों के प्रतिनिधि नहीं जाते।

उन्होंने कृषि से जुड़े फैसलों में समय-समय पर समीक्षा की जरूरत भी बताई। इसका भी उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि जब कृषि उत्पादों में फ्यूचर ट्रेडिंग की शुरुआत हुई तो उसके कुछ दिनों बाद ही बड़ा घोटाला सामने आया। इसलिए फ्यूचर ट्रेडिंग नीति की भी समीक्षा होनी चाहिए। कृषि और ग्रामीण क्षेत्र को तवज्जो ना देने के कारण उन्होंने मीडिया की भी आलोचना की और कहा कि इन्हें से जुड़े मुद्दे सामने नहीं आते। इनकी कवरेज कम होने के कारण नई सूचनाएं भी किसानों तक ठीक से नहीं पहुंच पाती हैं।

तीन सत्रों में चले इस कार्यक्रम का संचालन किसान चेंबर ऑफ कॉमर्स के जनरल सेक्रेटरी सुरेश देशवाल ने किया। साथ ही उन्होंने चेंबर के उद्देश्यों और उसके कामकाज पर एक प्रजेंटेशन भी दिया। चेंबर के अध्यक्ष वीरेंद्र सिवाच ने  चेंबर की आने वाले साल की गतिविधियों के बारे में जानकारी दी।