जीआई टैग से बंधी उम्मीदें: क्या ‘नागौरी अश्वगंधा’ बदलेगी किसानों की तकदीर?

नागौर की पारंपरिक औषधीय फसल नागौरी अश्वगंधा को जीआई टैग मिलने से किसानों में नई उम्मीद जगी है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि केवल टैग से आय नहीं बढ़ेगी। असली लाभ तभी मिलेगा, जब बाजार, प्रोसेसिंग और मूल्य श्रृंखला को मजबूत किया जाएगा।

जीआई टैग से बंधी उम्मीदें: क्या ‘नागौरी अश्वगंधा’ बदलेगी किसानों की तकदीर?
नागौरी अश्वगंधा को जीआई टैग दिलवाने वाली टीम के सदस्य

राजस्थान के नागौर जिले में प्राकृतिक रूप से उगने वाली नागौरी अश्वगंधा को हाल ही में जियोग्राफिकल इंडिकेशन (जीआई) टैग मिला है। इस घोषणा के साथ यह उम्मीद जगी है कि अब अश्वगंधा की बड़े पैमाने पर खेती शुरू होगी, यह औषधीय वनस्पति वैश्विक बाजार में अपनी अलग पहचान बनाएगी और स्थानीय किसानों को बेहतर दाम मिल सकेंगे।

नागौरी अश्वगंधा अभी तक बड़े पैमाने पर व्यावसायिक फसल नहीं है। नागौर जिले के विभिन्न इलाकों में यह प्राकृतिक रूप से उगती है और सीमित संख्या में किसान इसकी खेती करते हैं। पड़ोसी बीकानेर और चूरू जिलों में भी यह प्राकृतिक रूप से पाई जाती है। आयुर्वेदिक परंपरा और शास्त्रों में इसे सर्वोत्तम अश्वगंधा माना गया है। इस दृष्टि से नागौरी अश्वगंधा को मिला जीआई टैग केवल खेती का मामला नहीं है, बल्कि प्राकृतिक विरासत के संरक्षण से भी जुड़ा है।

जीआई टैग से इसके नाम को कानूनी सुरक्षा मिलेगी, किसान इसकी खेती की ओर उन्मुख होंगे और उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार आ सकता है। नागौर की विशिष्ट जलवायु, कम वर्षा और मिट्टी की प्रकृति इसे औषधीय दृष्टि से अलग बनाती है। जीआई टैग इसी विशिष्टता को कानूनी संरक्षण देता है।

नागौरी अश्वगंधा को जीआई पहचान दिलाने में नागौरी वेलफेयर सोसाइटी के प्रयास को आईसीएआर के डायरेक्टोरेट ऑफ मेडिसिनल एंड एरोमैटिक प्लांट्स रिसर्च, नेशनल मेडिसिनल प्लांट्स बोर्ड और राजस्थान सरकार के कृषि विभाग का सहयोग मिला। 

गुणवत्ता से अधिक प्रक्रिया का खेल?

किसान महापंचायत के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामपाल जाट मानते हैं कि जीआई टैग को लेकर अक्सर जमीनी हकीकत से अलग तस्वीर पेश की जाती है। राजस्थान में झालावाड़ के संतरे और श्रीगंगानगर का किन्नू जैसी कई फसलें अपनी गुणवत्ता के लिए जानी जाती हैं, लेकिन जीआई टैग मिलना केवल गुणवत्ता पर नहीं, बल्कि दस्तावेजी प्रक्रिया, संगठित दावेदारी और सरकारी स्तर पर प्रभावी पैरवी पर भी निर्भर करता है। जो लोग आंकड़ों का कागजी जाल खड़ा कर लेते हैं, वे यह टैग हासिल कर लेते हैं।

जाट कहते हैं कि नागौरी अश्वगंधा अभी बड़े पैमाने पर व्यावसायिक फसल नहीं है। नागौर जिले के कुछ हिस्सों में यह प्राकृतिक रूप से उगती है और बहुत कम किसान ही इसकी खेती करते हैं। इसके विपरीत कोटा संभाग के रामगंजमंडी और झालावाड़ क्षेत्रों में अश्वगंधा का बड़े स्तर पर व्यावसायिक उत्पादन होता है। जीआई टैग एक अवसर है, लेकिन इसकी सार्थकता तभी होगी जब नीतियां और बाजार किसानों के पक्ष में खड़े होंगे।

टैग तो मिला, इसके बाद क्या?

रामपाल जाट का कहना है कि केवल टैग दे देना पर्याप्त नहीं है। सवाल यह है कि क्या सरकार की भूमिका यहीं समाप्त हो जाती है? किसानों को भंडारण, पहचान निर्माण और बाजार तक सीधी पहुंच में सहयोग मिलेगा या नहीं, यही असली परीक्षा है। इनके बिना कोई भी टैग प्रभावी साबित नहीं हो सकता।

नागौर के वरिष्ठ आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ. गोपाल शर्मा नागौरी अश्वगंधा को विशिष्ट औषधि मानते हैं। उनके अनुसार अश्वगंधा एक बहुगुणी औषधि है। देश के कई हिस्सों में यह उगती है, लेकिन आयुर्वेदिक शास्त्रों में नागौरी अश्वगंधा को ही सर्वोत्तम और अत्यधिक गुणकारी माना गया है।

यह सामान्य दुर्बलता दूर करने, बलवर्धन, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और बढ़ती उम्र के प्रभाव कम करने में सहायक है। डॉ. शर्मा बताते हैं कि नागौर के स्थानीय वैद्य सदियों से इसका शास्त्रोक्त उपयोग करते आए हैं। आज भी इसकी गुणवत्ता सर्वोत्तम मानी जाती है। जीआई टैग मिलने से इसकी वैश्विक पहचान और मजबूत होगी।

वैश्विक पहचान मिलने की उम्मीद

नागौर में कृषि विभाग के संयुक्त निदेशक हरीश मेहरा बताते हैं कि नागौरी अश्वगंधा की पहचान उसके प्राकृतिक रूप से उगने से जुड़ी है। यह वन क्षेत्रों और परती भूमि में स्वतः उगती है। स्थानीय लोग और घुमंतू समुदाय इसका संग्रह करते हैं। फिलहाल लगभग 300 से 400 हेक्टेयर क्षेत्र में ही किसान प्रयोग के तौर पर इसकी व्यावसायिक खेती कर रहे हैं।

मेहरा के अनुसार, पड़ोसी चूरू और बीकानेर जिलों में भी यह प्राकृतिक रूप से पाई जाती है। जीआई टैग मिलने से इसे वैश्विक पहचान मिली है और अब उम्मीद है कि किसान इसकी खेती की ओर अधिक आकर्षित होंगे।

पद्मश्री से सम्मानित नागौर के वरिष्ठ पर्यावरण कार्यकर्ता और किसान चौधरी हिम्मताराम भांभू इसे नागौर के लिए सुखद उपलब्धि मानते हैं। उनका कहना है कि नागौरी अश्वगंधा का उपयोग नागौर के ग्रामीण जीवन में सदियों से होता रहा है, लेकिन इसकी विधिवत खेती कभी नहीं हुई। अब जब इसे पहचान मिली है, तो इसके विस्तार की संभावनाएं भी बनी हैं।

पान मेथी को भी मिलेगा जीआई 

जोधपुर स्थित दक्षिण एशिया जैव प्रौद्योगिकी संस्थान के संस्थापक निदेशक भागीरथ चौधरी जीआई टैग को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखते हैं। वे बताते हैं कि नागौर की पान मेथी और अश्वगंधा दोनों के लिए जीआई टैग का आवेदन किया गया था। अश्वगंधा को टैग मिल चुका है, जबकि पान मेथी को शीघ्र मिलने की संभावना है।

चौधरी के अनुसार, नागौर जिले में लगभग 6,000 हेक्टेयर क्षेत्र में पान मेथी का उत्पादन होता है, लेकिन यह पूरी दुनिया में कसूरी मेथी के नाम से बिकती है। नागौरी मेथी की कोई अलग पहचान नहीं बन पाई है। जीआई टैग मिलने के बाद इसे अपनी विशिष्ट पहचान मिलेगी, जिसका सीधा लाभ किसानों को होगा।

जीआई और जमीन हकीकत 

भागीरथ चौधरी बताते हैं कि भारत में करीब पौने तीन सौ खाद्य उत्पादों को जीआई टैग मिला है, लेकिन वास्तविक लाभ बहुत कम मामलों में ही किसानों तक पहुंचा है। समस्या यह है कि जीआई प्रमाण-पत्र मिलने के बाद उस पर आगे काम नहीं किया जाता। जबकि जीआई के साथ एक प्रमाणन संस्था भी बनती है, जिसका काम उत्पादन नियंत्रण, पहचान निर्माण और बाजार से जोड़ना होता है।

जब तक मूल्य श्रृंखला विकसित नहीं होगी, तब तक किसानों को वास्तविक लाभ नहीं मिलेगा। जीआई प्रमाण-पत्र अपने-आप में कोई चमत्कार नहीं करता।

रामपाल जाट कहते हैं कि जीआई टैग से पहचान और कानूनी सुरक्षा जरूर मिलती है, लेकिन किसानों को लाभ तभी होगा जब उसके साथ बाजार तक सीधी पहुंच, स्थानीय स्तर पर प्रोसेसिंग और प्रभावी बिक्री व्यवस्था विकसित की जाएगी। अकेला टैग किसान की आय नहीं बढ़ाता। असली बदलाव तब आता है, जब उसके साथ पूरी व्यवस्था खड़ी की जाती है।

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