अमेरिका के साथ व्यापार समझौते की अब क्या होगी रणनीति?
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा डोनाल्ड ट्रंप के रेसिप्रोकल टैरिफ को रद्द किए जाने के बाद भारत–अमेरिका ट्रेड डील को लेकर नई अनिश्चितता पैदा हो गई है। 15 फीसदी के अस्थायी टैरिफ और पहले तय रियायतों पर उठे सवालों के बीच भारत के सामने यह रणनीतिक चुनौती है कि वह पुराने फ्रेमवर्क पर आगे बढ़े या बदली हुई परिस्थितियों में नई शर्तों के साथ बातचीत करे।
अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के रेसिप्रोकल टैरिफ के फैसले को रद्द करने से भारत और अमेरिका के बीच होने वाले व्यापार समझौते (ट्रेड डील) को लेकर अनिश्चितता की स्थिति बन गई है। दोनों देशों ने फरवरी की शुरुआत में जिस अंतरिम ट्रेड डील का फ्रेमवर्क जारी किया था, उस पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कई सवाल खड़े हो गए हैं।
पहला सवाल यह है कि क्या भारत और अमेरिका के बीच जिस फ्रेमवर्क पर सहमति बनी थी, वह ट्रंप टैरिफ पर केंद्रित था, जिसमें अमेरिका द्वारा भारतीय निर्यात पर 18 फीसदी का रियायती टैरिफ लगाने की बात तय हुई थी। अब स्थिति बदल गई है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद रेसिप्रोकल टैरिफ की व्यवस्था ही नहीं रह गई है। इसके बाद ट्रंप ने 10 फीसदी टैरिफ की घोषणा की है, जिसे बाद में बढ़ाकर 15 फीसदी कर दिया। ऐसे में क्या भारत को अमेरिका की शर्तों पर समझौता करने की आवश्यकता है, यह एक बड़ा सवाल है।
ट्रेड मामलों के प्रतिष्ठित विशेषज्ञ और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के पूर्व प्रोफेसर डॉ. बिस्वजीत धर का कहना है कि भारत के सामने नए सिरे से मोलभाव करने का अवसर है। हमें अमेरिका की शर्तें मानने की आवश्यकता नहीं है। जिन परिस्थितियों में बातचीत चल रही थी, वे अब बदल चुकी हैं। कृषि और रूस से तेल खरीद जैसे मुद्दों पर समझौता करने की कोई अनिवार्यता नहीं है।
डब्ल्यूटीओ वार्ताओं में भारत, व्यापार मामलों में विकासशील देशों को साथ लेकर एक समूह के रूप में दबाव बनाता रहा है। इसी कारण विकसित देश भारत को ‘डील ब्रेकर’ कहते रहे हैं। उस समय भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भी नहीं था, लेकिन अब हम एक बड़ी अर्थव्यवस्था हैं। ऐसे में अमेरिका के साथ व्यापार समझौते में बिना किसी दबाव के, अपने हितों को केंद्र में रखकर बातचीत करनी चाहिए।
एक और सवाल यह है कि क्या प्रस्तावित व्यापार समझौते में हम शर्तें पहले ही स्वीकार कर चुके हैं। यदि स्वीकार भी कर ली हैं, तो क्या उन पर बने रहना आवश्यक है? फिलहाल कहा जा रहा है कि बातचीत जारी है और अंतिम समझौता नहीं हुआ है, केवल फ्रेमवर्क पर सहमति बनी है। यदि स्थिति यही है, तो नई परिस्थितियों के अनुसार आगे बढ़ने की जरूरत है।
कुछ विशेषज्ञ यह भी सवाल उठा रहे हैं कि जब निचली अदालत राष्ट्रपति ट्रंप के आईईईपीए के तहत टैरिफ लगाने के फैसले को रद्द कर चुकी थी और मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित था, तो हमारी सरकार ने अंतिम फैसले तक इंतजार क्यों नहीं किया। कई संगठनों और बड़ी संख्या में अमेरिकी कंपनियों ने ट्रंप के इस फैसले के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया था, जिससे संकेत मिल रहे थे। अमेरिकी संविधान के अनुसार, व्यापार मामलों में निर्णय लेने का अधिकार कांग्रेस के पास है। कांग्रेस पहले ही कनाडा के खिलाफ टैरिफ के फैसले में बदलाव कर चुकी है, जहां डेमोक्रेट्स के साथ कुछ रिपब्लिकन सांसदों ने भी समर्थन दिया था। ऐसे में अमेरिका में मौजूद हमारे लॉबिस्ट बेहतर सलाह दे सकते थे।
ट्रंप ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद धारा 122 के तहत जो 15 फीसदी टैरिफ लगाया है, जो केवल 150 दिनों के लिए वैध है और जुलाई में समाप्त हो जाएगा। इस प्रावधान के तहत भुगतान संतुलन (बैलेंस ऑफ पेमेंट) संकट की स्थिति में राष्ट्रपति यह कदम उठा सकता है। लेकिन अमेरिका के सामने ऐसा कोई संकट नहीं है। अमेरिकी डॉलर दुनिया की रिजर्व करेंसी है। इसलिए इस फैसले के खिलाफ भी अदालत जाने का रास्ता खुला है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि फैसले में असहमति जताने वाले जज कैवेनाग के नोट को ध्यान से देखना होगा, क्योंकि वे संकेत दे रहे हैं कि आने वाले दिनों में ट्रंप को कुछ सकारात्मक सुझाव मिल सकते हैं।
कुल मिलाकर, नई परिस्थितियों में सभी देशों पर 15 फीसदी टैरिफ लागू होगा और भारत भी इससे अछूता नहीं है। रेसिप्रोकल टैरिफ के तहत भारत पर 50 फीसदी टैरिफ की घोषणा की गई थी, जिसे ट्रेड डील के तहत घटाकर 18 फीसदी किया गया था। हालांकि, ट्रंप टैरिफ से पहले भारतीय निर्यात पर औसत टैरिफ लगभग तीन फीसदी था। अब यह बढ़कर 15 फीसदी होगा और इस स्तर पर हमें अन्य निर्यातक देशों के साथ प्रतिस्पर्धा करनी होगी।
ऐसे में सभी की नजरें सरकार पर हैं कि क्या भारत–अमेरिका व्यापार समझौता पहले से तय संभावित शर्तों पर ही आगे बढ़ेगा या नई परिस्थितियों के अनुसार शर्तें तय की जाएंगी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ने एक सवाल के जवाब में कहा है कि भारत टैरिफ देगा और अमेरिका कोई टैरिफ नहीं देगा। इन सभी परिस्थितियों में आगे की रणनीति बेहद अहम होगी।

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