अचानक क्यों बढ़ने लगे चीनी के दाम, जुलाई में प्रति क्विंटल 600 रुपये तक की बढ़ोतरी

चीनी उत्पादन में अनुमान से अधिक गिरावट, सीमित स्टॉक और सरकार की निर्यात नीति के असर से जुलाई में चीनी की एक्स-फैक्टरी कीमतों में 600 रुपये प्रति क्विंटल तक की तेजी आई है। उद्योग का मानना है कि कम उत्पादन, एथेनॉल डायवर्जन और घटते बफर स्टॉक के चलते त्योहारी सीजन में खुदरा कीमतों पर और दबाव बढ़ सकता है।

अचानक क्यों बढ़ने लगे चीनी के दाम, जुलाई में प्रति क्विंटल 600 रुपये तक की बढ़ोतरी

चीनी उत्पादन के अनुमान गड़बड़ाने और निर्यात से जुड़े सरकार के फैसलों का असर अब चीनी की कीमतों पर साफ दिखाई देने लगा है। जुलाई में चीनी की एक्स-फैक्टरी कीमतों में 600 रुपये प्रति क्विंटल तक की बढ़ोतरी हुई है। कीमतों में तेजी का रुख आगे भी जारी रह सकता है, क्योंकि चालू पेराई सीजन के अंत में चीनी का बकाया स्टॉक कई दशकों के निचले स्तर पर पहुंच सकता है।

जून के अंत में महाराष्ट्र और कर्नाटक में एस ग्रेड चीनी की एक्स-फैक्टरी कीमत 3,850 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास थी, जो अब बढ़कर 4,400–4,450 रुपये प्रति क्विंटल हो गई है। वहीं, उत्तर प्रदेश समेत उत्तरी राज्यों में एम ग्रेड चीनी की एक्स-फैक्टरी कीमत 4,450–4,550 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गई है। इस बढ़ोतरी का असर खुदरा कीमतों पर भी दिखने लगा है और आने वाले दिनों में इनमें और तेजी आ सकती है।

चीनी उद्योग के सूत्रों के मुताबिक, चालू पेराई सीजन (2025-26) में चीनी का उत्पादन 279 लाख टन के आसपास रहा है, जबकि देश में इसकी खपत करीब 285 लाख टन रहने का अनुमान है। यह लगातार दूसरा साल है, जब देश में चीनी का उत्पादन खपत से कम रहा है। सीजन की शुरुआत में चीनी उद्योग संगठनों ने 309 लाख टन उत्पादन का अनुमान लगाया था। लेकिन गन्ने की कमजोर फसल के कारण सबसे बड़े गन्ना उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश में उत्पादन पिछले साल के मुकाबले घट गया, जबकि दूसरे सबसे बड़े चीनी उत्पादक राज्य महाराष्ट्र में भी उत्पादन में बढ़ोतरी अनुमान से काफी कम रही। चालू चीनी वर्ष 2025-26 में 15 मई तक उत्तर प्रदेश में चीनी उत्पादन घटकर 89.70 लाख टन रह गया, जो पिछले एक दशक का सबसे निचला स्तर है। जबकि महाराष्ट्र का कुल चीनी उत्पादन 99.20 लाख टन रहा था।

गन्ने की कमजोर फसल के बावजूद सरकार ने दिसंबर 2025 में 15 लाख टन चीनी के निर्यात की अनुमति दी। इसके बाद फरवरी 2026 में अतिरिक्त पांच लाख टन चीनी के निर्यात का कोटा भी जारी किया। हालांकि, सीजन की शुरुआती अवधि में वैश्विक बाजार में कीमतें अनुकूल नहीं होने के कारण निर्यात धीमा रहा। बाद में दिसंबर के बाद इसमें तेजी आई और निर्यात पर प्रतिबंध लगने तक करीब आठ लाख टन चीनी का निर्यात हो चुका था। यदि जारी किया गया पूरा निर्यात कोटा इस्तेमाल हो जाता, तो स्थिति और अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकती थी। मई, 2026 में सरकार ने 30 सितंबर, 2026 तक के लिए चीनी निर्यात पर रोक लगा दी।

कीमतों में बढ़ोतरी की सबसे बड़ी वजह उत्पादन में कमी है। इसके अलावा महाराष्ट्र और कर्नाटक से निर्यात तथा एथेनॉल के लिए अधिक डायवर्जन के कारण इन दोनों राज्यों में चीनी का स्टॉक भी कम हो गया है। इस सीजन में एक खास बात यह रही है कि उत्तर राज्यों और महाराष्ट्र-कर्नाटक के बीच चीनी की एक्स-फैक्टरी कीमतों में करीब 200 रुपये प्रति क्विंटल का अंतर रहता था लेकिन अब यह अंतर 100 रुपये प्रति क्विंटल रह गया है। एक बड़े चीनी ट्रेडर ने रूरल वॉयस को बताया की इन राज्यों में कम स्टॉक चलते वहां कीमतें उत्तरी राज्यों के स्तर पर ही आ सकती हैं।

चालू सीजन की शुरुआत में, 1 अक्टूबर, 2025 को देश में 47 लाख टन चीनी का शुरुआती स्टॉक था। इसमें 279 लाख टन उत्पादन जोड़ने पर कुल उपलब्धता 326 लाख टन होती है। इसमें से 285 लाख टन घरेलू खपत और आठ लाख टन निर्यात के बाद 1 अक्टूबर, 2026 को शुरुआती स्टॉक करीब 33 लाख टन रहने का अनुमान है। चीनी उद्योग के सूत्रों का कहना है कि यह स्टॉक 33 से 35 लाख टन के बीच रहेगा।

हालांकि, इसमें से करीब 10 लाख टन चीनी स्टॉकिस्टों और व्यापारियों के पास रहती है जिसे कारोबारी भाषा में ट्रेड स्टॉक कहते हैं। ऐसे में यदि चीनी मिलों का पेराई सत्र समय पर शुरू नहीं होता, तो अक्टूबर और नवंबर में चीनी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। सामान्यतः चीनी मिलें नवंबर की शुरुआत में चालू हो जाती हैं। लेकिन इस वर्ष अल-नीनो के असर से मानसून कितना प्रभावित होता है और उसके कारण गन्ने की फसल कैसी रहती है, इसी पर निर्भर करेगा कि मिलें समय पर पेराई शुरू कर पाती हैं या नहीं।

इस स्थिति का सीधा असर चीनी की कीमतों पर पड़ेगा और त्योहारी सीजन में उपभोक्ताओं को चीनी के लिए अधिक कीमत चुकानी पड़ सकती है। वहीं, स्टॉक की स्थिति को देखते हुए सरकार के पास अतिरिक्त बिक्री कोटा जारी करने का विकल्प भी सीमित रह गया है। उद्योग का कहना है कि यदि गन्ने की फसल कमजोर रहती है, तो इससे चीनी से एथेनॉल उत्पादन की क्षमता भी प्रभावित होगी। साथ ही, अगले साल भी भारत से चीनी निर्यात की संभावना लगभग नगण्य रहेगी। चीनी की कीमतें हमेशा से राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील रही हैं और अतीत में कई सरकारों को इसकी कीमत चुकानी पड़ी है। ऐसे में सरकार इस मोर्चे पर स्थिति का प्रबंधन कैसे करती है, इस पर सबकी नजर रहेगी।

 

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