डब्ल्यूटीओ: भारत ने किया सार्वजनिक भंडार से अनाज निर्यात का समर्थन, मछुआरों की आजीविका के साथ समझौता नहीं

2021 में विश्व खाद्य कार्यक्रम के तहत सिर्फ 44.7 लाख टन अनाज खरीदा गया जिस पर 1.7 अरब डॉलर का खर्च आया। अनेक देश खाद्य सुरक्षा का संकट झेल रहे हैं और उनके लिए अनाज की इतनी कम मात्रा नाकाफी है। श्रीलंका, बांग्लादेश और भूटान जैसे देशों को खाद्य पदार्थों की आपूर्ति की जरूरत है

डब्ल्यूटीओ: भारत ने किया सार्वजनिक भंडार से अनाज निर्यात का समर्थन, मछुआरों की आजीविका के साथ समझौता नहीं

वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने सार्वजनिक भंडार से अंतरराष्ट्रीय मदद और मानवीय आधार पर अनाज का निर्यात करने का समर्थन किया है। उन्होंने कहा है कि संयुक्त राष्ट्र का विश्व खाद्य कार्यक्रम जरूरतमंद देशों की जरूरत पूरी करने में सक्षम नहीं है। गोयल सोमवार को जिनेवा में चल रही डब्ल्यूटीओ की बैठक के एक सत्र में बोल रहे थे।

उन्होंने कहा कि 2021 में विश्व खाद्य कार्यक्रम के तहत सिर्फ 44.7 लाख टन अनाज खरीदा गया जिस पर 1.7 अरब डॉलर का खर्च आया। अनेक देश खाद्य सुरक्षा का संकट झेल रहे हैं और उनके लिए अनाज की इतनी कम मात्रा नाकाफी है। श्रीलंका, बांग्लादेश और भूटान जैसे देशों को खाद्य पदार्थों की आपूर्ति की जरूरत है।

गोयल ने कहा, मैं यह समझ नहीं पा रहा हूं डब्ल्यूटीओ के सदस्य देशों को एक सरकार द्वारा दूसरी सरकार से मानवीय आधार पर अनाज खरीदने में क्या परेशानी है, खासकर ऐसे समय जब आयात करने वाला देश खाद्य सुरक्षा संकट झेल रहा हो। हमारा मानना है कि विश्व खाद्य कार्यक्रम ने खाद्य सुरक्षा में बहुत कम योगदान किया है। इस कार्यक्रम की अपनी सीमाएं हैं।

दुनिया में अनेक ऐसे देश हैं जिनके पास अनाज का सार्वजनिक भंडार है। इनका इस्तेमाल उनके पड़ोसी देशों और संकट में पड़े अन्य देशों में तत्काल किया जा सकता है। इसलिए भारत का मानना है कि दो सरकारों के बीच अनाज आयात-निर्यात के सौदे की अनुमति होनी चाहिए ताकि हम दूसरे देशों को खासकर मानवीय संकट के दौरान मदद कर सकें।

उन्होंने अनाज के सार्वजनिक भंडारण पर स्थाई समाधान की दिशा में आगे न बढ़ने की भी आलोचना की। बैठक के ड्राफ्ट का हवाला देते हुए उन्होंने कहा, पैरा 12 में ऐसा मान लिया गया है कि इस मंत्री स्तरीय बैठक में सार्वजनिक भंडारण को अंतिम रूप नहीं दिया जाएगा। मेरे विचार से यह बड़ा दुखद है कि जिस कार्यक्रम पर दशकों से विचार चल रहा है, 2013 में जिस पर डब्ल्यूटीओ में सहमति बनी, 2014 में जिस पर जनरल काउंसिल ने स्वीकृति दी और 2015 में पुनः स्वीकृति दी उसे अंतिम रूप नहीं दिया जा रहा है। ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दे को दबाकर नहीं रखा जाना चाहिए।

गोयल ने डब्ल्यूटीओ में विकासशील और अविकसित देशों के हितों की रक्षा का मुद्दा भी उठाया। डब्ल्यूटीओ के पक्षपात भरे सुधार प्रस्तावों पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि विकासशील देशों को विशेष रियायत जारी रहनी चाहिए। उन्होंने कहा कि डब्ल्यूटीओ में सुधार के जो मौजूदा प्रस्ताव हैं उनसे इस संगठन का ढांचा पूरी तरह बदल जाएगा और यह विकासशील देशों के हित हितों के खिलाफ होगा।

उन्होंने कहा, जो लोग विकासशील देशों के प्रति विशेष व्यवहार की आवश्यकता पर सवाल उठा रहे हैं उन्हें मालूम होना चाहिए कि विकसित देशों की प्रति व्यक्ति जीडीपी विकासशील देशों के मुकाबले 20 से 50 गुना ज्यादा है। 140 करोड़ आबादी वाले भारत में भी प्रति व्यक्ति जीडीपी बहुत कम है।

उन्होंने कहा कि कोविड-19 महामारी ने किसी भी बड़े संकट में तत्काल खड़े होने में हमारी अक्षमता को दर्शाया है। चाहे वह खाद्य सुरक्षा हो, स्वास्थ्य या सप्लाई चैन हो। जब पूरी दुनिया बेसब्री से राहत की उम्मीद कर रही थी तब डब्ल्यूटीओ कहीं नहीं दिख रहा था। उदाहरण के लिए महामारी आने के 2 साल बाद भी वैक्सीन की असमानता बरकरार है। अल्पविकसित और अनेक विकासशील देशों की बहुसंख्यक आबादी को अभी तक वैक्सीन का इंतजार है तो कुछ देशों में वैक्सीन की तीसरी और चौथी डोज भी दी जा चुकी है। यह ग्लोबल गवर्नेंस की सामूहिक विफलता है जिस पर हमें याद तो निरीक्षण करने की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि भरोसा और विश्वसनीयता दोबारा हासिल करने के लिए जरूरी है कि हम अनाज के सार्वजनिक भंडारण जैसे मुद्दों का स्थाई समाधान ढूंढें जिस पर एक दशक पहले सहमति बनी थी। मौजूदा वैश्विक खाद्य संकट बताता है कि हमें अभी इस दिशा में आगे बढ़ने की जरूरत है। क्या हम करोड़ों लोगों का जीवन जोखिम में डाल सकते हैं?

उन्होंने कहा कि महामारी के दौरान भारत में अकेले अपनी 80 करोड़ आबादी को 10 करोड़ टन अनाज मुफ्त में वितरित किया जिसकी कीमत करीब 50 अरब डॉलर है। यह राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम के तहत वितरित किए जाने वाले अनाज के अतिरिक्त है।

फिशरीज सब्सिडी का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि पारंपरिक मछुआरों की आजीविका के साथ समझौता नहीं किया जा सकता है। हम कुछ देशों के विशेषाधिकार को संस्थागत रूप नहीं दे सकते वह भी उन देशों के अधिकार छीनकर जो पहले ही हाशिए पर खड़े हैं। हमें दोनों के प्रति अलग नजरिया अपनाना पड़ेगा वरना कृषि समझौते जैसी स्थिति बन जाएगी जिसमें असमानता के चलते अनेक देश आज भी खाद्य सहायता पर आश्रित हैं।