मिलेट से होगा बच्चों का बेहतर विकास, कई लाइफस्टाइल बीमारियां रोकने में भी यह सक्षम

एक अध्ययन में पता चला है कि बच्चों और किशोरों के नियमित भोजन में चावल की जगह अगर मिलेट का इस्तेमाल किया जाए तो उनका विकास 26 से 39 फ़ीसदी ज्यादा होता है। इस अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि मिलेट (ज्वार, बाजरा, रागी, कोदो जैसे मोटे अनाज) कुपोषण को दूर करने में भी काफी मददगार हो सकता है। यही नहीं, इससे शरीर में आयरन और कैल्शियम की कमी दूर हो सकती है और डायबिटीज का असर भी कम हो सकता है

मिलेट से होगा बच्चों का बेहतर विकास, कई लाइफस्टाइल बीमारियां रोकने में भी यह सक्षम

मिलेट बच्चों और किशोरों के लिए नया स्मार्ट फूड बन सकता है। एक अध्ययन में पता चला है कि बच्चों और किशोरों के नियमित भोजन में चावल की जगह अगर मिलेट का इस्तेमाल किया जाए तो उनका विकास 26 से 39 फ़ीसदी ज्यादा होता है। इस अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि मिलेट (ज्वार, बाजरा, रागी, कोदो जैसे मोटे अनाज) कुपोषण को दूर करने में भी काफी मददगार हो सकता है। यही नहीं, इससे शरीर में आयरन और कैल्शियम की कमी दूर हो सकती है और डायबिटीज का असर भी कम हो सकता है।

यह अध्ययन ‘न्यूट्रिएंट्स’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। यह पहले प्रकाशित आठ अध्ययनों की समीक्षा और मेटा-एनालिसिस भी है। चार देशों के सात संगठनों ने मिलकर यह स्टडी की, जिसका नेतृत्व इंटरनेशनल क्रॉप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ द सेमी-एरिड ट्रॉपिक्स (इक्रिसैट) की वरिष्ठ वैज्ञानिक (पोषण) डॉ. एस. अनीता ने किया।

डॉ. अनीता के अनुसार, “अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि फिंगर मिलेट में टोटल प्रोटीन, सल्फरयुक्त अमीनो एसिड और कैल्शियम जैसे खनिज प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। ये पोषक तत्व बच्चों के विकास में सहायक होते हैं।” छोटे बच्चों के अलावा प्रीस्कूल और स्कूल जाने वाले बच्चों तथा किशोरों को भी इस अध्ययन में शामिल किया गया था। पांच अध्ययनों में फिंगर मिलेट, एक में  और ज्वार में मिलेट का मिश्रण (फिंगर, पर्ल, फॉक्सटेल, लिटिल और कोदो) का इस्तेमाल किया गया।

नियमित रूप से सिर्फ चावल खाने वाले बच्चों की तुलना में जिन बच्चों को मिलेट आधारित भोजन दिया गया, उनकी औसत लंबाई 28.2%, वजन 26%, बांह का घेरा 39% और छाती की चौड़ाई 37% अधिक थी। इन बच्चों ने तीन महीने से लेकर साढ़े चार साल तक मिलेट का इस्तेमाल किया।

इक्रीसैट की महानिदेशक डॉ. जैकलीन ह्यूजेज के अनुसार ये नतीजे इस बात को साबित करते हैं कि मिलेट का भोजन में इस्तेमाल करके पोषण कार्यक्रम तैयार किए जा सकते हैं। इससे खाने में विविधता भी आएगी। इस तरह स्कूलों में बच्चों को दिए जाने वाले खाने में और मां-शिशु कार्यक्रम के तहत अधिक पोषण वाला भोजन उपलब्ध कराया जा सकता है। अध्ययन को लिखने वाली भारत के नेशनल इंस्टीट्यूट आफ न्यूट्रिशन की डायरेक्टर डॉ. हेमलता ने कहा की मिलेट आधारित भोजन उपलब्ध कराने के लिए अलग आयु वर्ग के बच्चों की खातिर अलग मीनू बनाना पड़ेगा। इसमें सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील बातों और स्वाद का भी ध्यान रखना पड़ेगा।

ये सभी अध्ययन भारत में किए गए। अध्ययनकर्ताओं ने यह भी पाया कि खाने में सब्जियां, फल, दूध जैसे पदार्थों की विविधता होने पर जो अतिरिक्त ग्रोथ होती है वह मिलेट की तुलना में कम है। इससे पता चलता है कि चावल की जगह या उसके साथ मिलेट मिलाकर या खाने में और अधिक विविधता लाकर भोजन को अधिक पोषक बनाया जा सकता है जो बच्चों के विकास में लाभदायक होगा।

अध्ययन के एक और लेखक तथा इंग्लैंड स्थित इंस्टीट्यूट फॉर फूड न्यूट्रिशन एंड हेल्थ, यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग के डायरेक्टर प्रो. इयान गिवेन्स के अनुसार, “मिलेट दरअसल कई तरह के पोषक तत्वों का बास्केट है। ग्रोथ की यह स्टडी हमारे चार साल के कार्य का हिस्सा है। हमने ये कार्य दुनिया के अनेक संगठनों के साथ मिलकर किए।” गिवेन्स जिन अध्ययनों की बात बताते हैं, उनमें पता चला है कि मिलेट सेहत के लिए जरूरी सबसे अधिक पोषक तत्व उपलब्ध कराते हैं। इनसे न सिर्फ बच्चों में कुपोषण की समस्या दूर की जा सकती है, बल्कि ये टाइप 2 डायबिटीज को नियंत्रित करने, शरीर में आयरन की कमी दूर करने, कोलेस्ट्रॉल का स्तर घटाने, मोटापा कम करने और हृदय रोग का जोखिम कम करने में भी मददगार हो सकते हैं।

डॉ. अनीता के अनुसार फिंगर मिलेट में कैल्शियम प्रचुर मात्रा में होता है। 100 ग्राम मिलेट में 364 (+/-58) मिलीग्राम कैल्शियम होता है। इसमें से 23 प्रतिशत कैल्शियम शरीर में खप जाता है। यानी सौ ग्राम अनाज से शरीर में 100 मिलीग्राम कैल्शियम मिल सकता है। यानी अगर मिलेट पर्याप्त मात्रा में खाया जाए तो शरीर में कैल्शियम की कमी भी दूर हो जाएगी।