BRICS 2026: कृषि क्षेत्र में ब्रिक्स देशों की क्षमता और वैश्विक खाद्य सुरक्षा में इनकी बढ़ती भूमिका

ब्रिक्स देश वैश्विक खाद्य सुरक्षा में एक बड़ी ताकत बनकर उभरे हैं। कृषि भूमि, जल संसाधन, अनाज, पशुधन उत्पादन, खाद्य भंडार और कृषि व्यापार में इनकी महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है। इनका बढ़ता प्रभाव जलवायु और भू-राजनीतिक चुनौतियों के बीच अधिक लचीली खाद्य प्रणालियां विकसित करने, कृषि बाजारों को मजबूत करने और वैश्विक खाद्य स्थिरता बढ़ाने में मदद कर सकता है।

BRICS 2026: कृषि क्षेत्र में ब्रिक्स देशों की क्षमता और वैश्विक खाद्य सुरक्षा में इनकी बढ़ती भूमिका

भारत 12-13 सितंबर, 2026 को ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (BRICS India Summit 2026) की मेजबानी की तैयारी कर रहा है। ऐसे में वैश्विक खाद्य सुरक्षा में ब्रिक्स समूह की बढ़ती भूमिका पर दुनिया का ध्यान तेजी से बढ़ रहा है। हाल के वर्षों में ब्रिक्स देश कृषि कमोडिटी के प्रमुख उत्पादक, उपभोक्ता, निर्यातक और आयातक बनकर उभरे हैं। इससे वैश्विक खाद्य आपूर्ति, व्यापार प्रवाह और जिंस बाजारों पर समूह का प्रभाव लगातार बढ़ा है।

ब्रिक्स का महत्व केवल उसकी आर्थिक ताकत तक सीमित नहीं है। यह समूह अब दुनिया की 49.5% आबादी, लगभग 40% वैश्विक GDP और करीब 26% वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करता है। ऐसे समय में जब जलवायु परिवर्तन, भू-राजनीतिक संघर्ष, व्यापार प्रतिबंध और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं, ब्रिक्स का बढ़ता कृषि आधार उसे वैश्विक खाद्य प्रणाली का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बना रहा है।

उभरती अर्थव्यवस्थाओं से वैश्विक खाद्य शक्ति तक

ब्रिक्स का अंतरराष्ट्रीय बाजारों में एक बड़ी ताकत के रूप में परिवर्तन उल्लेखनीय रहा है। UNCTAD के आंकड़ों के अनुसार, ब्रिक्स देशों का कुल वस्तु निर्यात 2003 में 906 अरब डॉलर से बढ़कर 2024 में 5.9 लाख करोड़ डॉलर हो गया। विश्व निर्यात में इनकी हिस्सेदारी करीब 12% से बढ़कर लगभग 24% हो गई। इसी अवधि में वस्तु आयात भी 783 अरब डॉलर से बढ़कर 4.92 लाख डॉलर हो गया और वैश्विक आयात में हिस्सेदारी 10% से बढ़कर लगभग 20% हो गई।

इस बढ़ते व्यापार में कृषि की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। मूल्य के लिहाज से 2025 में वैश्विक कृषि व्यापार में ब्रिक्स देशों के कृषि निर्यात और आयात की हिस्सेदारी क्रमशः 16% और 17% रही। कृषि निर्यात की प्रमुख श्रेणियों में तिलहन, कपास, मछली, अनाज और मांस शामिल हैं। इन उत्पाद समूहों में ब्रिक्स प्लस देशों की वैश्विक निर्यात हिस्सेदारी 20% से 40% तक है। तिलहन निर्यात में सोयाबीन की हिस्सेदारी 80% से अधिक है, जबकि अनाज निर्यात में चावल, गेहूं और मक्का प्रमुख हैं। भारत वैश्विक चावल निर्यात में अग्रणी स्थान रखता है।

ब्रिक्स की विशाल खाद्य उत्पादन क्षमता

ब्रिक्सग्रेन के अनुसार, ब्रिक्स देश दुनिया के कुल खाद्य उत्पादन का लगभग 42% हिस्सा रखते हैं। समूह के पास दुनिया की करीब 33% कृषि भूमि और लगभग 39% वैश्विक जल संसाधन हैं। सामूहिक रूप से ब्रिक्स देशों का वैश्विक अनाज और मांस उत्पादन में 40% से अधिक हिस्सा है। मक्का और गेहूं आपूर्ति में भी इनका महत्वपूर्ण योगदान है।

ब्राजील हर साल 165 अरब डॉलर से अधिक के कृषि उत्पादों का निर्यात करता है और दुनिया के प्रमुख कृषि निर्यातकों में शामिल है। रूस दुनिया का सबसे बड़ा गेहूं निर्यातक बन चुका है। भारत प्रमुख चावल उत्पादक और निर्यातक है, जबकि चीन के पास विशाल और विविध कृषि क्षेत्र है। यह स्थिति ब्रिक्स को वैश्विक जिंस कीमतों, व्यापार और खाद्य आपूर्ति की स्थितियों को प्रभावित करने की क्षमता देती है।

अनाज ब्रिक्स की खाद्य सुरक्षा क्षमता का सबसे महत्वपूर्ण आधार है। 2009 के बाद से लगभग सभी ब्रिक्स देशों में अनाज उत्पादन बढ़ा है। चीन सबसे बड़ा उत्पादक है, जिसके बाद भारत, रूस और ब्राजील का स्थान आता है। FAO के कृषि उत्पादन स्टैटिस्टिक्स 2010-2023 के अनुसार, वैश्विक अनाज उत्पादन में ब्रिक्स देशों का योगदान असाधारण रूप से बड़ा है। ये देश दुनिया के करीब 60% चावल, 45% गेहूं, 40% मक्का, 25% ज्वार और 20% जौ का उत्पादन करते हैं। इस लिहाज से इनका कृषि उत्पादन वैश्विक खाद्य स्थिरता और ग्लोबल साउथ की व्यापक खाद्य सुरक्षा भूमिका का महत्वपूर्ण हिस्सा बन रहा है।

वैश्विक उर्वरक बाजार में बढ़ता ब्रिक्स का प्रभाव

ब्रिक्स देश उर्वरकों के बड़े उत्पादक और आयातक दोनों हैं। चीन, रूस और भारत ब्रिक्स की उर्वरक उत्पादन क्षमता के मुख्य केंद्र हैं। तीनों देश मिलकर ब्रिक्स के कुल उर्वरक उत्पादन का करीब 90% हिस्सा रखते हैं। इसमें चीन की हिस्सेदारी 40% से अधिक है, जबकि रूस करीब 25% और भारत लगभग 20% योगदान करता है। दूसरी ओर ब्राजील, भारत और चीन दुनिया के सबसे बड़े उर्वरक खरीदारों में भी शामिल हैं। ब्राजील के उर्वरक आयात में रूस की हिस्सेदारी करीब 32%, जबकि चीन की हिस्सेदारी लगभग 26% है। 

अनाज बाजार और नई मूल्य निर्धारण व्यवस्था की संभावना

ब्रिक्स में अनाज उत्पादन और इनके निर्यात ने एक स्वतंत्र कृषि मूल्य निर्धारण व्यवस्था विकसित करने की संभावनाओं पर भी चर्चा को बढ़ावा दिया है। प्रस्तावित ब्रिक्स ग्रेन एक्सचेंज से प्राइस डिस्कवरी को मजबूत करने, बाजार में पारदर्शिता बढ़ाने और प्रमुख उत्पादक व उपभोक्ता देशों के बीच व्यापार को सुगम बनाने में मदद मिल सकती है। 

यह पहल पहली बार 2023 में रूस के यूनियन ऑफ ग्रेन एक्सपोर्टर्स एंड प्रोड्यूसर्स द्वारा प्रस्तावित की गई थी। कजान शिखर सम्मेलन में इसे राजनीतिक समर्थन मिला और बाद की व्यापार मंत्रिस्तरीय बैठकों में इसकी संरचना को लेकर आगे चर्चा हुई। हालांकि, यह मंच अभी विचार-विमर्श के चरण में है। इसके लिए मुद्राओं, क्लियरिंग और भुगतान प्रणालियों, तरलता, अनुबंध मानकों और जोखिम प्रबंधन को लेकर सहमति जरूरी होगी।

पशुधन उत्पादन से मजबूत होती खाद्य सुरक्षा

वैश्विक खाद्य सुरक्षा में ब्रिक्स का योगदान केवल फसलों तक सीमित नहीं है। 2009 से 2023 के बीच ब्रिक्स देशों ने वैश्विक मांस (पोल्ट्री समेत) उत्पादन में लगभग 45%, अंडा उत्पादन में करीब 60% और दूध उत्पादन में लगभग 35% योगदान दिया। वैश्विक मांस और अंडा उत्पादन में चीन का योगदान सबसे बड़ा है, जबकि दूध उत्पादन में भारत अग्रणी योगदानकर्ता है।

कृषि व्यापार और ग्लोबल साउथ

ब्रिक्स देश वैश्विक कृषि निर्यात में भी प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं। 2023 में ब्रिक्स देशों के कुल कृषि निर्यात का मूल्य लगभग 397 अरब डॉलर रहा, जो मूल्य के आधार पर वैश्विक कृषि निर्यात का करीब 21% था। ब्राजील की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। FAO के 2023 के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया का सबसे बड़ा द्विपक्षीय कृषि व्यापार प्रवाह ब्राजील और चीन के बीच दर्ज किया गया, जिसका मूल्य 53.6 अरब डॉलर था। व्यापक ब्रिक्स ढांचे में इंडोनेशिया भी ब्राजील के तीन प्रमुख व्यापारिक साझेदारों में शामिल था और दोनों के बीच कृषि व्यापार लगभग 1.9 अरब डॉलर रहा।

हालांकि, 2024 में ब्रिक्स देशों का संयुक्त कृषि निर्यात घटकर करीब 387 अरब डॉलर रह गया। यह गिरावट भू-राजनीतिक तनाव, लॉजिस्टिक्स में व्यवधान और तेजी से खंडित होती वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के प्रति कृषि व्यापार की संवेदनशीलता को दर्शाती है।

भू-राजनीतिक और जलवायु दबावों के बीच खाद्य सुरक्षा

ब्रिक्स देशों में कृषि का बढ़ता महत्व वैश्विक खाद्य प्रणाली के लिए एक महत्वपूर्ण समय में सामने आया है। जनसंख्या वृद्धि, जलवायु परिवर्तन, चरम मौसम, आर्थिक अस्थिरता और भू-राजनीतिक संघर्ष कृषि उत्पादन और खाद्य वितरण पर दबाव बढ़ा रहे हैं। निर्यात प्रतिबंध, व्यापार बाधाएं तथा शिपिंग और उर्वरक आपूर्ति में व्यवधानों ने वैश्विक खाद्य आपूर्ति श्रृंखलाओं की कमजोरियों को और उजागर किया है।

ब्रिक्स के लिए अगली चुनौती उसकी उत्पादन क्षमता को अधिक मजबूत और लचीली खाद्य प्रणालियों में बदलने की है। इस मकसद से जून 2026 में 16वीं ब्रिक्स कृषि मंत्रियों की बैठक में अपनाई गई इंदौर घोषणा में खाद्य सुरक्षा, किसान कल्याण, कृषि व्यापार, जलवायु-लचीली कृषि और डिजिटल तकनीकों को सहयोग के केंद्र में रखा गया।

ब्रिक्स के लिए अब केंद्रीय सवाल केवल यह नहीं है कि उसके सदस्य देश कितना खाद्य उत्पादन करते हैं। महत्वपूर्ण यह है कि इस उत्पादन को कितनी प्रभावी ढंग से लचीली आपूर्ति श्रृंखलाओं, बेहतर लॉजिस्टिक्स और ऐसे तंत्रों से जोड़ा जा सकता है, जो वैश्विक झटकों से किसानों और उपभोक्ताओं दोनों की रक्षा कर सकें।

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