नए कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन क्यों कर रहे हैं किसान, क्या हो आगे का रास्ता

किसान आंदोलन का लंबा चलना सबके लिए नुकसानदायक है। इसलिए सरकार को इसे खत्म करने का रास्ता तलाशना चाहिए। अगर इसके लिए कानूनों में बदलाव की जरूरत पड़े तो सरकार को वह भी करना चाहिए

नए कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन क्यों कर रहे हैं किसान, क्या हो आगे का रास्ता
तीन केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन करते किसान

ऐसा लगता है, यह बात किसी की भी कल्पना से परे थी कि केंद्र सरकार के तीन कृषि कानून भारत के हाल के इतिहास में किसानों का अभूतपूर्व आंदोलन खड़ा कर देंगे। हजारों की तादाद में किसान 4 महीने से दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर आंदोलन कर रहे हैं। उनकी मांग तीनों कृषि कानूनों को खत्म करने की है। ये कानून हैं,  1) फार्मर्स प्रोड्यूस ट्रेड एंड कॉमर्स (प्रमोशन एंड फैसिलिटेशन) एक्ट 2020, 2) फार्मर्स (एंपावरमेंट एंड प्रोटेक्शन) एग्रीमेंट ऑन प्राइस एश्योरेंस एंड फार्म सर्विसेज एक्ट 2020 और 3) एसेंशियल कमोडिटीज अमेंडमेंट एक्ट 2020. इन कृषि कानूनों के खिलाफ देश के अन्य हिस्सों में भी छोटे पैमाने पर आंदोलन हुए।

सरकार का दावा है कि नए कृषि कानून किसानों को एपीएमसी मंडी में व्यापारियों और कमीशन एजेंट के शोषण से बचाने के मकसद से लाए गए हैं। लेकिन किसानों को आशंका है कि इन कानूनों से अंततः एपीएमसी मंडी और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की व्यवस्था खत्म हो जाएगी और कृषि के कॉरपोरेटाइजेशन का रास्ता खुल जाएगा। इससे किसानों की जमीन, उनकी आजीविका और आमदनी की सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी। हालांकि इन तीनों कृषि कानूनों से होने वाले फायदे और उनसे खतरों को लेकर संभावनाएं या आशंकाएं काफी बढ़ा चढ़ाकर व्यक्त की जा रही हैं।

राज्यों के सुधारों के अनुभव

बीते डेढ़ दशक में देश के अनेक राज्यों ने मॉडल कृषि उपज विपणन समिति (एपीएमसी) कानून 2003 को कुछ बदलाव के साथ अपनाया और अपने कृषि मार्केटिंग व्यवस्था में आंशिक या पूरी तरह से सुधार किया। आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, असम, गोवा, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, महाराष्ट्र, राजस्थान, सिक्किम, तमिलनाडु, पंजाब और त्रिपुरा जैसे राज्यों ने निजी कंपनियों के बाजार स्थापित  करने अथवा किसान बाजार खोलने की कानूनी अड़चनों को समाप्त किया और ऐसी व्यवस्था की ताकि प्रोसेसर, निर्यातक और अन्य बड़े खरीदार सीधे किसानों से उनकी उपज खरीद सकें। राज्यों ने कांट्रैक्ट फार्मिंग यानी ठेके पर खेती की व्यवस्था भी लागू की। आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, सिक्किम, तमिलनाडु ने प्रदेश के भीतर ई-ट्रेडिंग की कानूनी अनुमति दी है। इसके अलावा ई-नाम के तहत 585 थोक मंडियों को इलेक्ट्रॉनिक तरीके से जोड़ा गया है। कुछ राज्यों ने या तो फल और सब्जियों की खरीद-बिक्री को विनियमित कर दिया है या फिर उन पर मार्केट फीस खत्म कर दी है।

यह सच है कि उपरोक्त सुधारों में कई जगहों पर खामियां हैं जिन्हें दूर करने की जरूरत है। लेकिन अभी तक सुधार के जो कदम लागू किए गए हैं उनसे किसान हितों पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ा है। यह बात भी गौर करने लायक है कि इन सुधारों के विरोध में देश में कहीं भी किसानों ने आंदोलन नहीं किया। दूसरी तरफ यह बात भी सच है कि इन तथाकथित सुधारों से ना तो किसान बिचौलियों के चंगुल से निकल सके और ना ही किसानों की आशंका के मुताबिक कृषि पर कॉर्पोरेट का कब्जा हुआ।

नए कानूनों के संभावित असर

नए कृषि कानून यदि लागू किए जाते हैं तो इनसे कई फायदे हो सकते हैं- एपीएमसी मंडियों के बाहर, प्रदेश के भीतर और दो राज्यों के बीच व्यापारिक बाधाएं खत्म हो सकती हैं, फूड प्रोसेसर, निर्यातक और अन्य बड़े खरीदारों के लिए आवश्यक वस्तुओं की स्टॉक होल्डिंग की सीमा खत्म हो जाएगी, देश में कहीं भी कांट्रैक्ट फार्मिंग के लिए एक कानूनी ढांचा उपलब्ध होगा। इनसे एक तरफ तो प्रोसेसर, निर्यातक और थोक कारोबारियों के लिए बिजनेस में आसानी होगी तो दूसरी तरफ बाजार तक किसानों की पहुंच बढ़ेगी।

लेकिन इसके साथ हमें यह भी नहीं मान लेना चाहिए कि एपीएमसी मंडियों के बाहर निजी कारोबारी किसानों का शोषण कम करेंगे और उन्हें उनकी उपज की उचित कीमत देंगे। एक ऐसे गैर नियमन वाले (अनरेगुलेटेड) बाजार में जहां कुछ चुने हुए लोगों का नियंत्रण होगा, वहीं व्यापारियों के बीच कार्टेलाइजेशन अधिक और प्रतिस्पर्धा कम हो सकती है। इससे किसानों को उनकी उपज की कम कीमत मिलेगी। ई-ट्रेडिंग में अभी तक बिचौलियों की भूमिका को खत्म नहीं किया जा सका है। दूर बैठे बड़े खरीदार कृषि उपज की गुणवत्ता देखने के लिए स्थानीय व्यापारियों पर ही निर्भर करते हैं। देश के जो इलाके अल्पविकसित हैं वहां कोई संगठित निजी व्यापार नहीं होता है। इन अल्पविकसित इलाकों में किसानों को पर्याप्त संख्या में बाजार, जो उचित दूरी पर हों, पक्की सड़कें, ट्रांसपोर्टेशन की सुविधाएं, बैंक, वेयरहाउस और कोल्ड स्टोरेज की सुविधाएं चाहिए। इसके अलावा मौजूदा 22000 ग्रामीण हाटों को अपग्रेड करने और उन्हें नियमित थोक बाजारों से जोड़ने की भी जरूरत है। जब तक ये कदम नहीं उठाए जाते तब तक उपभोक्ता द्वारा चुकाई गई कीमत में किसानों को मिलने वाला हिस्सा बढ़ाना मुमकिन नहीं है। उदाहरण के लिए, बिहार में 2006 में एपीएमसी कानून खत्म किए जाने के बावजूद अभी तक फसल कटाई के बाद इंफ्रास्ट्रक्चर और मार्केटिंग की उचित व्यवस्था नहीं हो पाई है। नतीजा यह कि किसान अपनी उपज की कम कीमत लेने के लिए मजबूर हैं।

कृषि में अगर निजी कॉरपोरेट का निवेश बढ़ता है तो यह वेयरहाउस, कोल्ड स्टोरेज, बाजार और ट्रांसपोर्टेशन सुविधा जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास के लिए महत्वपूर्ण होगा। एग्रो प्रोसेसिंग और निर्यात में भी निवेश बढ़ेगा। इससे बाजार तक किसानों की पहुंच बढ़ेगी। उन्हें अपनी उपज की बेहतर कीमत मिलेगी और ग्रामीण इलाकों में रोजगार का सृजन होगा। महत्वपूर्ण यह है कि बिजनेस के साथ किसानों, किसान कोऑपरेटिव और उत्पादक संगठनों की साझेदारी हो। अभी कृषि में जो पूरा निवेश होता है उसमें निजी कॉरपोरेट का हिस्सा सिर्फ 2.3% है। इसकी मुख्य वजह उचित नीतिगत वातावरण और बेहतर गवर्नेंस की कमी है।

जहां तक कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की बात है तो अक्सर इससे गलती से कॉरपोरेट फार्मिंग मान लिया जाता है। कांट्रैक्ट फार्मिंग में जमीन पर किसान का मालिकाना हक और खेती का अधिकार पूरी तरह सुरक्षित रहता है, जैसा कि नए कानून में भी कहा गया है। जब उपज को खरीदने में प्रतिस्पर्धा होगी तो कांट्रैक्ट फार्मिंग में किसानों को अधिक कीमत भी मिलेगी। खासकर तब जब किसान कोऑपरेटिव, स्वयं सहायता समूह अथवा एफपीओ (फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशन) के माध्यम से संगठित हों और उनके पास बाजार से जुड़ी भरोसेमंद सूचनाएं हों। हालांकि यहां कॉन्ट्रैक्ट पर अमल के लिए उचित कानूनी और संस्थागत फ्रेमवर्क भी महत्वपूर्ण है। यह फ्रेमवर्क पंजाब में बासमती चावल और टमाटर तथा उत्तर प्रदेश में गन्ना के कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग जैसा ना हो।

कुछ अर्थशास्त्री गलत तर्क देते हैं कि एपीएमसी ने किसानों को नुकसान पहुंचाया और उन्हें अपनी उपज को कम कीमत पर एपीएमसी मंडियों में बेचने के लिए मजबूर किया है। एनएसएसओ के आंकड़े बताते हैं कि खरीफ की धान जैसी प्रमुख फसल के मामले में भी कुल उपज का सिर्फ 29% मंडियों के जरिए बेचा गया। स्थानीय व्यापारियों और इनपुट डीलर्स के जरिए 49% धान कम कीमत पर बेचा गया। कुल धान खरीदी में कोआपरेटिव और सरकारी एजेंसियों का हिस्सा 17% रहा।

आंदोलन की मुख्य वजह

यहां इस बात को समझा जाना चाहिए कि जरूरी नहीं कि किसानों का मौजूदा आंदोलन कृषि के कॉरपोरेटाइजेशन की उनकी गलत धारणा की वजह से हो रहा है। राजनीति के अलावा इसकी एक और वजह है कृषि में निरंतर गिरती लाभप्रदता और केंद्र सरकार की तरफ से जगाई गई यह उम्मीद है कि 2015-16 आधार वर्ष की तुलना में किसानों की आमदनी 2022-23 तक दोगुनी हो जाएगी। यह भी सच है कि ए2+एफएल लागत के ऊपर 50% मार्जिन के आधार पर नए एमएसपी का लाभ हर इलाके के किसानों को सभी फसलों के लिए नहीं मिल पाता है। केंद्र सरकार ने 2018-19 के बजट में एमएसपी से कीमत में अंतर के भुगतान का वादा किया था लेकिन उसे अभी तक पूरी तरह लागू नहीं किया गया है। आंदोलन कर रहे किसानों की एक प्रमुख मांग सभी फसलों के लिए एमएसपी की कानूनी गारंटी देना है। हालांकि बिक्री योग्य सभी फसलों को समर्थन मूल्य पर खरीदने के लिए ना तो सरकार के पास पैसे हैं ना ही भौतिक और प्रशासनिक इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध है। इसके अलावा इतने बड़े पैमाने पर फसल खरीदने की नीति को विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में चुनौती भी मिल सकती है। इसीलिए कृषि विपणन में निजी क्षेत्र की साझेदारी बढ़ाने की आवश्यकता है।

इसी से जुड़ा मुद्दा है गन्ना मिलों की तरफ से किसानों को गन्ने की वैधानिक कीमत का भुगतान ना करना। बार-बार बाजार के विफल होने के कारण अनेक जगहों पर बागवानी फसलों में विविधीकरण से भी किसानों को कोई खास लाभ नहीं हुआ है। जब तक ये चिंताएं दूर नहीं की जाती हैं तब तक किसानों का आंदोलन जारी रह सकता है।

आगे क्या

कहा जा सकता है कि तीनों कृषि कानून किसान हितों पर विपरीत प्रभाव नहीं डालेंगे। इसलिए किसानों को एक ऐसे शत्रु के खिलाफ लड़ाई नहीं करनी चाहिए जिसका अस्तित्व ही नहीं है। लेकिन इसके साथ यह भी महत्वपूर्ण है कि सुधार के अन्य कदमों को उठाए बगैर हमें नए कानूनों से किसी चमत्कार या क्रांतिकारी नतीजे की उम्मीद भी नहीं करनी चाहिए। अन्य सुधारों के रूप में लीज पर जमीन देने को कानूनी मान्यता, ग्रामीण हाट को अपग्रेड करना और थोक बाजारों से उन्हें जोड़ना, संस्थागत कर्ज बढ़ाना, साहूकारी कर्ज को नियंत्रित करना शामिल हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य का एक नया फ्रेमवर्क भी तैयार किया जाना चाहिए जिसमें कीमत में अंतर के भुगतान या  कृषि आय बीमा की व्यवस्था हो। इससे बाजार कम विकृत होगा और किसान को भी फायदा मिलेगा। किसानों का आंदोलन लंबा चलना सबके लिए नुकसानदायक है। इसलिए सरकार को इसे खत्म करने का रास्ता तलाशना चाहिए। अगर इसके लिए कानूनों में संशोधन की जरूरत पड़े तो सरकार को वह भी करना चाहिए।

प्रमुख संशोधन इस प्रकार होने चाहिए- 1) एपीएमसी मंडी के भीतर और बाहर व्यापार के नियम एक हो, 2) उपज की औसत क्वालिटी का एमएसपी ही आधार या संदर्भ मूल्य हो जो एपीएमसी के बाहर और भीतर दोनों जगहों पर लागू हो, यह कीमत कांट्रैक्ट फार्मिंग पर भी लागू हो, अगर कहीं किसान को कीमत कम मिलती है तो अंतर का भुगतान सरकार करे, 3) ऐसे कदम उठाए जाएं जिनसे व्यापारियों और कॉरपोरेट के कार्टलाइजेशन ना हो, 4) कानून लागू करने और विवाद निपटाने की बेहतर व्यवस्था हो और 5) कीमत और बाजार से जुड़ी सूचनाओं की भरोसेमंद व्यवस्था हो। दुर्भाग्यवश इस मुद्दे का इतना राजनीतिकरण कर दिया गया है कि अब सरकार को कृषि में सुधार के अच्छे कदम उठाने में भी डर लगेगा।

(लेखक कृषि लागत एवं मूल्य आयोग के पूर्व चेयरमैन हैं। वे नीति आयोग में भू-नीति सेल के भी चेयरमैन रह चुके हैं। अभी वे नई दिल्ली स्थित काउंसिल फॉर सोशल डेवलपमेंट में विशिष्ट प्रोफ़ेसर और सेंटर फॉर एग्रीकल्चरल पॉलिसी डायलॉग के चेयरमैन हैं)