डब्ल्यूटीओ की 12वीं मंत्रिस्तरीय बैठक में सरकारी खाद्यान्न स्टॉक और सब्सिडी का मुद्दा सुलझाना भारत की चुनौती, पुराने सहयोगी भी बने विरोधी

कृषि समझौते में गरीबों को सब्सिडी पर खाद्य पदार्थ मुहैया कराने को बाजार विकृत करने वाला माना गया है। इसलिए जो देश सार्वजनिक स्टॉक से खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम चलाते हैं उनके लिए कुल कृषि उत्पादन के 10 फ़ीसदी मूल्य तक सब्सिडी की सीमा निर्धारित की गई है। कृषि समझौते में भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यही सीमा तय है

डब्ल्यूटीओ की 12वीं मंत्रिस्तरीय बैठक में सरकारी खाद्यान्न स्टॉक और सब्सिडी का मुद्दा सुलझाना भारत की चुनौती,  पुराने सहयोगी भी बने विरोधी

बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था के अब तक के इतिहास में ऐसा होता रहा है और इस बार भी वही हो रहा है। जिनेवा में 12 से 15 जून तक होने वाले डब्ल्यूटीओ के 12वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन से पहले कृषि को लेकर काफी विवाद हो रहे हैं। यह सम्मेलन दो बार स्थगित हो चुका है। उम्मीद थी कि इसमें कुछ महत्वपूर्ण फैसले लिए जाएंगे और कृषि पर समझौते में सुधार के लिए बातचीत वापस पटरी पर आ जाएगी। लेकिन पिछले कुछ हफ्तों से सदस्य देशों के बीच वार्ता दो मुद्दों पर आकर सिमट गई है जो भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।

पहला मुद्दा खाद्य सुरक्षा के लिए अनाज की सार्वजनिक स्टॉकहोल्डिंग से जुड़ा है जो भारत की सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) का आधार है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून 2013 में लागू किया गया था। इसके जरिए सरकार देश की लगभग दो-तिहाई आबादी को सब्सिडी पर अनाज उपलब्ध कराती है। हाल में निर्यात पर अंकुश लगाने का मुद्दा भी भारत के लिए महत्वपूर्ण रहा है, खासकर गेहूं निर्यात पर प्रतिबंध का मुद्दा मौजूदा। मौजूदा फसल वर्ष (जुलाई 2021 से जून 2022) के दौरान घरेलू उत्पादन कम होने और बफर स्टॉक का स्तर घटने के बाद सरकार ने यह कदम उठाया है।

खाद्य सुरक्षा के लिए अनाज की सार्वजनिक स्टॉकहोल्डिंग

कृषि में भारत के लिए सबसे अहम मुद्दा सार्वजनिक स्टॉकहोल्डिंग का है। यह मुद्दा इसलिए उठा क्योंकि कृषि समझौते में घरेलू खाद्य सुरक्षा की समस्या से निपटने के मकसद से सार्वजनिक स्टॉक में डब्ल्यूटीओ के सदस्य देशों के लिए दो शर्तें हैं। पहली शर्त यह है कि प्रत्येक सदस्य देश खाद्य पदार्थ खरीदेगा और उन्हें प्रशासित मूल्य पर बेचेगा। दूसरी शर्त है कि अगर खाद्य पदार्थ प्रशासित मूल्य से कम कीमत पर बेचे जाते हैं, अर्थात उन पर सब्सिडी दी जाती है, तो प्रशासित मूल्य और बिक्री मूल्य के अंतर को उस सदस्य देश की तरफ से दी जाने वाली सब्सिडी में जोड़ा जाएगा।

कृषि समझौते में गरीबों को सब्सिडी पर खाद्य पदार्थ मुहैया कराने को बाजार विकृत करने वाला माना गया है। इसलिए जो देश सार्वजनिक स्टॉक से खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम चलाते हैं उनके लिए कुल कृषि उत्पादन के 10 फ़ीसदी मूल्य तक सब्सिडी की सीमा निर्धारित की गई है। कृषि समझौते में भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यही सीमा तय है। समझौते के अनुसार प्रशासित मूल्य (या भारत में न्यूनतम समर्थन मूल्य- एमएसपी) जिस पर अनाज खरीदा जाता है और उनके बाहरी संदर्भ मूल्य (अर्थात 1986-88 के दौरान अंतरराष्ट्रीय मूल्य) के बीच अंतर को सब्सिडी माना गया है। अनाज के मौजूदा प्रशासित मूल्य की तुलना 35 साल पुराने अंतरराष्ट्रीय मूल्य से करके सब्सिडी का निर्धारण करना बेमतलब है। लेकिन विकसित अर्थव्यवस्थाओं ने कृषि समझौते को वास्तविकता के करीब लाने के लिए उसमें संशोधन से इनकार कर दिया है।

जैसा कि पहले बताया गया है, 2013 में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून लागू होने के बाद सार्वजनिक स्टॉकहोल्डिंग से जुड़े प्रावधान भारत के लिए महत्वपूर्ण हो गए हैं। इस कानून के तहत देश की दो तिहाई आबादी को सब्सिडी वाला अनाज उपलब्ध कराने की प्रतिबद्धता के बाद भारत के लिए 10 फ़ीसदी सब्सिडी की सीमा को पार करने का जोखिम हो गया है। अगर सब्सिडी की सीमा पार करने के बाद भारत इस कानून के तहत कम कीमतों पर अपनी आबादी को खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराना जारी रखता है, तो डब्ल्यूटीओ का कोई दूसरा सदस्य देश भारत के खिलाफ शिकायत दर्ज करा सकता है। अगर उस विवाद में भारत की हार हो जाती है तो सब्सिडी दरों पर अनाज का वितरण करना तत्काल रोकना पड़ जाएगा।

2013 में भारत एक पीस क्लॉज लागू करवाने में सफल रहा था। यह एक अस्थाई व्यवस्था थी जिसके तहत अगर कोई देश राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून जैसी योजना लागू करने में 10 फ़ीसदी सब्सिडी की सीमा का उल्लंघन करता है तो उसके खिलाफ कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई जाएगी। भारत की इस समस्या पर डब्ल्यूटीओ के सदस्यों को स्थाई समाधान तलाशना पड़ेगा। पीस क्लॉज में एक महत्वपूर्ण एंटी सरकम्वेंशन प्रावधान है, जिसमें कहा गया है कि सार्वजनिक स्टॉक से खाद्य पदार्थ का इस्तेमाल व्यापार विकृत करने अथवा अन्य देशों की खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करने में नहीं किया जा सकता है। इसका मतलब यह है कि भारत इस स्टॉक से खाद्य पदार्थों का निर्यात नहीं कर सकता। इसके अलावा भारत को हर साल सार्वजनिक स्टॉकहोल्डिंग की सूचना डब्ल्यूटीओ को देनी पड़ेगी। इसमें बताना पड़ेगा कि सार्वजनिक स्टॉक की स्थिति क्या है, उसके लाभार्थियों की संख्या कितनी है, पूरे देश में लाभार्थियों के लिए कितना अनाज जारी किया गया है, संभव हो तो राज्यों के स्तर पर भी और उस स्टॉक से अगर निर्यात हुआ है तो उसकी जानकारी भी देनी पड़ेगी। अर्थात भारत की सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर डब्ल्यूटीओ के सदस्य देश बारीक निगरानी करते हैं।

इसलिए आश्चर्य नहीं कि जब हाल के वर्षों में भारत से कृषि निर्यात, खासकर अनाज का निर्यात बढ़ा तो भारत की निगरानी और तेज हो गई। कृषि पर समिति की बैठक में जापान, रूस, अमेरिका समेत कई देशों ने भारत से यह स्पष्टीकरण मांगा है कि क्या वह जो निर्यात कर रहा है उसका भारतीय खाद्य निगम की तरफ से खुले बाजार में की जाने वाली बिक्री योजना से कोई संबंध है या नहीं।

12वी मंत्रिस्तरीय कॉन्फ्रेंस से पहले ऐसा कभी नहीं लगा कि सदस्य देश सार्वजनिक स्टॉकहोल्डिंग के मुद्दे के स्थाई समाधान की दिशा में बढ़ रहे हैं, क्योंकि उनके बीच मतभेद काफी हैं। ब्राजील और अफ्रीकी समूह एसीपी (अफ्रीका, कैरीबियन और प्रशांत) ने दो विरोधाभासी प्रस्ताव दिए हैं। एक प्रस्ताव जी33 (जिसमें भारत भी है) ने भी दिया है।

ब्राजील के प्रस्ताव में तर्क दिया गया है कि सिर्फ तीन तरह के देशों को सार्वजनिक स्टॉकहोल्डिंग का अधिकार होना चाहिए। ये हैं- सबसे कम विकसित देश, ऐसे विकासशील देश जो खाद्य पदार्थों का आयात करते हैं और तीसरा वे देश जिन्हें बीते 2 वर्षों के दौरान कम से कम एक बार खाद्य पदार्थों के लिए बाहरी मदद की जरूरत पड़ी हो। दूसरे अर्थों में कहा जाए तो ब्राजील चाहता है कि भारत को सार्वजनिक वितरण प्रणाली लागू करने का अधिकार ना मिले।

एसीपी ग्रुप और जी33 के प्रस्तावों में सब्सिडी गणना के तरीके को बदलने का सुझाव है। इसमें कहा गया है कि बाहरी संदर्भ मूल्य इनमें से एक तरीके से निकाला जाना चाहिए- पहला, बीते 5 वर्षों के दौरान किसी भी उत्पाद की उच्चतम और न्यूनतम कीमत को छोड़कर बाकी 3 वर्षों का औसत मूल्य निकाला जाए। दूसरा, कीमत में महंगाई दर को समायोजित किया जाए। इस प्रस्ताव में एंटी सरकम्वेंशन प्रावधान और पीडीएस की रिपोर्टिंग की जरूरतों को भी शामिल किया गया है। ये दोनों प्रावधान पीस क्लॉज में पहले से हैं। डब्ल्यूटीओ के सदस्य देशों के बीच मतभेद को देखते हुए सार्वजनिक स्टॉकहोल्डिंग पर किसी स्थाई समाधान पर पहुंचना मुश्किल लग रहा है।

निर्यात पर अंकुश

कृषि कमोडिटी के निर्यात पर अंकुश का मुद्दा कोविड-19 के दौरान तब अधिक चर्चा में आया जब कुछ देशों ने अपने नागरिकों की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ऐसे कदम उठाए। जनवरी 2021 में डब्ल्यूटीओ के 80 सदस्य देशों ने एक बयान जारी किया जिसमें कहा गया कि वर्ल्ड फूड प्रोग्राम द्वारा गैर-वाणिज्यिक मानवीय आधार पर खरीदे गए खाद्य पदार्थों के निर्यात पर वे किसी तरह का प्रतिबंध या अंकुश नहीं लगाएंगे। परोक्ष रूप से यह भारत पर दबाव बनाने की रणनीति थी, ताकि भारत भी खाद्य पदार्थों के निर्यात पर किसी तरह का अंकुश ना लगाने की घोषणा करे।

भारत ने ऐसी किसी घोषणा करने से इनकार कर दिया क्योंकि यहां खाद्य सुरक्षा बड़ी चुनौती है। खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार दुनिया में खाद्य के लिहाज से सबसे अधिक असुरक्षित लोग भारत में ही हैं। ऐसे में अगर घरेलू स्तर पर खाद्य पदार्थों की कमी के बावजूद भारत निर्यात पर अंकुश लगाने से बचता है तो यहां जो माननीय समस्या उत्पन्न होगी उसे नियंत्रित करना सरकार के लिए मुश्किल हो जाएगा। यहां इस बात को समझना महत्वपूर्ण है कि खाद्य की कमी के समय जब अंतरराष्ट्रीय मूल्य बढ़ जाते हैं तब भारत से अनाज का खुले बाजार में लीकेज हो सकता है। क्योंकि व्यापारी घरेलू बाजार में कम मार्जिन पर बेचने के बजाय अधिक मार्जिन पर दूसरे बाजार में बेचना चाहेंगे। इसलिए डब्ल्यूटीओ के सदस्य देश भले ही निर्यात पर अंकुश खत्म करने के लिए यह तर्क देते हों कि बाजार खुला रखने से पूरे विश्व में खाद्य सुरक्षा बढ़ेगी, लेकिन ऐसा करते वक्त वे इस तथ्य को भूल जाते हैं कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार भारत की घरेलू खाद्य सुरक्षा के संकट को और बढ़ा सकता है।

निर्यात पर प्रतिबंध के विरोधी खाद्य सुरक्षा से जुड़े तीन महत्वपूर्ण प्रावधानों की अनदेखी करते हैं। पहला, कृषि समझौते का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उसमें खाद्य सुरक्षा को एक नॉन-ट्रेड समस्या के तौर पर स्वीकार किया गया है। समझौते की प्रस्तावना में कहा गया है, “सुधार कार्यक्रम (कृषि समझौते में सुधार) ऐसा हो जो सभी सदस्य देशों के लिए समानता की बात करे, इसमें खाद्य सुरक्षा समेत नॉन-ट्रेड समस्याओं पर विचार किया जाए...”

दूसरा, दोहा घोषणापत्र जिसमें कृषि समझौते में विकासशील देशों के साथ अलग बर्ताव करने की बात है, वह वार्ता के सभी तत्वों का अभिन्न हिस्सा होना चाहिए। उसका प्रभावी कार्यान्वयन भी होना चाहिए ताकि विकासशील देश खाद्य सुरक्षा समेत आपने विकास की जरूरतों को प्रभावी तरीके से पूरा कर सकें।

तीसरा, जनरल एग्रीमेंट ऑन टैरिफ एंड ट्रेड (गैट, जो डब्ल्यूटीओ से पहले था) का अनुच्छेद 11 निर्यात पर प्रतिबंध लगाने से मना करता है। लेकिन यह खाद्य संकट से जूझने वाले देशों को अस्थाई तौर पर निर्यात पर अंकुश लगाने की अनुमति देता है। इस लिहाज से देखा जाए तो भारत के पास गेहूं निर्यात पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार है, खासकर घरेलू उत्पादन और स्टॉक में गिरावट को देखते हुए।

भारत निर्यात पर अंकुश पर पूरी तरह रोक लगाने का हमेशा विरोध करता रहा है। इसका उसे फायदा भी मिला है। वर्ल्ड फूड प्रोग्राम के लिए खरीद में निर्यात पर प्रतिबंध या रोक लगाने से छूट के विषय पर मंत्रिस्तरीय फैसले के ड्राफ्ट में इसका जिक्र किया गया है। कृषि पर विशेष सत्र के लिए बनी समिति में एंबेसडर ग्लोरिया अब्राहम पेरालटा ने प्रस्ताव रखा है कि डब्ल्यूटीओ के प्रासंगिक प्रावधानों के अनुरूप घरेलू स्तर पर खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सदस्य देशों को कोई भी कदम उठाने से नहीं रोका जाएगा। यह एक महत्वपूर्ण नीतिगत पहल है। भारत गरीबों की खाद्य सुरक्षा जारी रखना सुनिश्चित करने में सफल रहा है।

(लेखक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज एंड प्लानिंग में प्रोफेसर हैं)