कृषि को केंद्र में रखकर नीति बनाने से टिकाऊ और समावेशी विकास संभव

अर्थशास्त्रियों ने कृषि के विकास के गैर-कृषि क्षेत्र पर असर और दोनों के बीच संबंधों को भी पहचाना। कृषि क्षेत्र आर्थिक विकास में कई तरह से योगदान करता है- कृषि में इस्तेमाल होने वाले इनपुट की मांग के तौर पर, इंडस्ट्री को कच्चे माल की सप्लाई देकर और उद्योगों द्वारा तैयार सामान की ग्रामीण इलाकों में मांग पैदा करके

कृषि को केंद्र में रखकर नीति बनाने से टिकाऊ और समावेशी विकास संभव

अर्थशास्त्री जॉनसन और मेलर ने 1961 में कहा था कि विकास के अगुआ के तौर पर कृषि केंद्रीय भूमिका निभाती है, खासकर औद्योगीकरण के शुरुआती चरण में। बाद में दूसरे अर्थशास्त्रियों ने भी आधुनिक सेक्टर के रूप में उभरने और विकास में महत्वपूर्ण योगदान देने में कृषि की भूमिका को स्वीकार किया। उसके बाद अर्थशास्त्रियों ने कृषि के विकास के गैर-कृषि क्षेत्र पर असर और दोनों के बीच संबंधों को भी पहचाना। कृषि क्षेत्र आर्थिक विकास में कई तरह से योगदान करता है- कृषि में इस्तेमाल होने वाले इनपुट की मांग के तौर पर, इंडस्ट्री को कच्चे माल की सप्लाई देकर और उद्योगों द्वारा तैयार सामान की ग्रामीण इलाकों में मांग पैदा करके।

यह जानना बड़ा रोचक है कि आर्थिक विकास के पारंपरिक और आधुनिक, दोनों सिद्धांतों में आर्थिक बदलाव की प्रकृति पर जो निष्कर्ष निकाला गया है, उनमें काफी समानताएं हैं। सभी डेवलपमेंट अर्थशास्त्री इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि प्रति व्यक्ति आय बढ़ने पर जीडीपी और रोजगार में कृषि का हिस्सा घटता है। औद्योगिक देशों तथा विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में इस बात के उदाहरण मिलते हैं। लेकिन हाल के वर्षों में यह पैटर्न बदला है।

टिमर (2009) के अनुसार कुल श्रम बल में कृषि श्रमिकों के हिस्से की तुलना में जीडीपी में कृषि का हिस्सा ज्यादा तेजी से घटता है। ब्रूस गार्डनर (2002) ने लिखा कि कृषि और गैर-कृषि क्षेत्र की आमदनी के बीच समानता के लिए जरूरी है कि कृषि श्रमिकों को गैर-कृषि क्षेत्र में तेजी से जोड़ा जाए। लेकिन इसमें काफी वक्त लगेगा। हाल के वर्षों में जीडीपी और रोजगार में कृषि के हिस्से के बीच समानता की गति और धीमी पड़ गई है, क्योंकि औद्योगिक क्षेत्र में रोजगार के अवसर गैर-कृषि क्षेत्र की जीडीपी वृद्धि दर की तुलना में कम हैं। भारत, चीन, वियतनाम जैसे देशों में कृषि और गैर-कृषि क्षेत्र के श्रमिकों के बीच की आमदनी में अंतर लगातार बना हुआ है।

आज सभी देशों में रोजगार सबसे गंभीर चुनौती है। रोबोटिक, मशीन लर्निंग, ऑटोमेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे तकनीकी विकास श्रम सघन के बजाय पूंजी सघन उत्पादन को बढ़ावा देते हैं। इसलिए आधुनिक ग्रोथ को कुछ अर्थशास्त्री ‘जॉबलेस ग्रोथ’ भी कहते हैं।

मैंने 2004-05 से 2011-12 के दौरान ग्रामीण जीडीपी और ग्रामीण रोजगार के बीच बदलाव की तुलना करने के लिए एक अध्ययन किया। इस अवधि में ग्रामीण भारत में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की जीडीपी सालाना 15.87 फ़ीसदी की दर से बढ़ी। इसके विपरीत उद्योगों में रोजगार की वृद्धि सिर्फ 0.67 फ़ीसदी हुई। यहां यह सवाल उठता है कि पूंजी सघन की जगह श्रम सघन उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए इंसेंटिव क्यों नहीं दिया जाता है। इसमें एक समस्या प्रतिस्पर्धी क्षमता की है। आज विश्व अर्थव्यवस्था में इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती है।

फूड प्रोसेसिंग इसका अच्छा उदाहरण है। इस सेक्टर को दो भागों में बांटा जा सकता है- संगठित और असंगठित। संगठित का मतलब पूंजी सघन वाली आधुनिक फैक्ट्रियां हैं और असंगठित में छोटे और लघु उद्यम आते हैं। संगठित क्षेत्र में इस सेक्टर के 20 फ़ीसदी लोग काम करते हैं लेकिन उत्पादन 80 फ़ीसदी होता है। इसके विपरीत असंगठित क्षेत्र में इस सेक्टर के 80 फ़ीसदी लोग काम करते हैं लेकिन उत्पादन में उनका हिस्सा सिर्फ 20 फ़ीसदी है। यही कारण है कि असंगठित क्षेत्र तेजी से सिकुड़ रहा है। रोजगार पर इसका असर आसानी से समझा जा सकता है।

क्या हमें कम आय वाली अर्थव्यवस्था के विकास के शुरुआती चरण में कृषि को केंद्र में रखकर विकास का मॉडल बनाना चाहिए और उसके बाद औद्योगीकरण में तेजी लानी चाहिए? क्या यह मॉडल भारत जैसे विकासशील देशों के लिए बेहतर होगा?

सिद्धांत स्तर पर देखा जाए तो कृषि की अगुवाई में आर्थिक बदलाव हो, इसके लिए बायोटेक्नोलॉजी जैसे कृषि विज्ञान में इनोवेशन जरूरी है। मैं यह भी मानता हूं कि डिजिटल टेक्नोलॉजी का नौकरियों पर जो विपरीत प्रभाव पड़ा है उसका मुकाबला प्लांट बायोटेक्नोलॉजी से किया जा सकता है। हरित क्रांति की टेक्नोलॉजी, जो विकासशील देशों को 1960 के दशक के मध्य में मिली, उसे लुइस मॉडल का पहला विभेद कहा जा सकता है। इसका कारण कृषि क्षेत्र में तेज विकास के कारण होने वाला बैकवर्ड और फॉरवर्ड लिंकेज है।

भारत में विकास का पहला चरण हरित क्रांति लेकर आया। 1991-92 में शुरू हुए आर्थिक सुधारों से विकास का दूसरा चरण आया और 2003-04 के आसपास आईटी और आईटी इनेबल्ड सर्विसेज में क्रांति से तीसरा चरण आया है। इन तीनों चरणों में कृषि, गैर-कृषि और पूरी अर्थव्यवस्था में विकास की दर एक रोचक तथ्य बताती है। 1950-51 से 1966-67 (हरित क्रांति से पहले) तक कृषि क्षेत्र की सालाना वृद्धि दर 1.77 फ़ीसदी और गैर-कृषि क्षेत्र की 5.5 फ़ीसदी थी। तब पूरी अर्थव्यवस्था की औसत विकास दर 3.41 फ़ीसदी थी। हरित क्रांति के बाद कृषि क्षेत्र की विकास दर 1991-92 तक औसत 3.02 फ़ीसदी रही। 1991 में आर्थिक सुधारों के बाद कृषि की विकास दर में थोड़ी गिरावट आई, लेकिन गैर-कृषि क्षेत्र की विकास दर 7.01 फ़ीसदी हो गई। कृषि में गिरावट के बावजूद अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 5.73 फ़ीसदी थी। यह मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को समर्थन देने वाली नीतियों के चलते संभव हुआ।

2003-04 से 2019-20 तक कृषि और गैर-कृषि दोनों क्षेत्रों में वृद्धि दर तेज रही। इससे पूरी अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर भी बढ़कर 6.71 फ़ीसदी जा पहुंची। यह ट्रेंड बताता है कि अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर तेज करने और प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने में कृषि क्षेत्र ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और साथ ही इसने गरीबी कम करने में भी मदद की।

(प्रोफेसर रमेश चंद, नीति आयोग के सदस्य हैं। यह लेख उनके द्वारा भोपाल स्थित अटल बिहारी वाजपेयी इंस्टीट्यूट ऑफ गुड गवर्नेंस एंड पॉलिसी एनालिसिस में इंडियन इकोनॉमिक एसोसिएशन के 104वें सालाना कांफ्रेंस में दिए गए अध्यक्षीय भाषण ‘आर्थिक वृद्धि और समावेशी विकास: क्या एक नए ग्रोथ मॉडल की जरूरत है’ का अंश है)