गरीब देशों में जलवायु परिवर्तन से मौतें अमीर देशों की तुलना में 10 गुना अधिक होने का अनुमान: रिपोर्ट

क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब की नई रिपोर्ट के अनुसार, 2050 तक जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान से होने वाली मौतें गरीब देशों में अमीर देशों की तुलना में 10 गुना अधिक हो सकती हैं। रिपोर्ट बताती है कि अनुकूलन उपायों में लक्षित निवेश से लाखों जानें बचाई जा सकती हैं!

गरीब देशों में जलवायु परिवर्तन से मौतें अमीर देशों की तुलना में 10 गुना अधिक होने का अनुमान: रिपोर्ट

एक नई रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि बढ़ते तापमान के कारण होने वाली मौतों का बोझ दुनिया के गरीब देशों पर असमान रूप से पड़ेगा। क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब की इस रिपोर्ट के अनुसार, 2050 तक गर्मी से होने वाली मौतें अमीर देशों की तुलना में गरीब देशों में लगभग 10 गुना अधिक हो सकती हैं।

रिपोर्ट बताती है कि हर साल रिकॉर्ड तोड़ गर्मी हजारों लोगों की जान लेती हैं और भविष्य में यह संकट और गहराने वाला है। अनुमान है कि तापमान से जुड़ी 90 प्रतिशत से अधिक मौतें निम्न और मध्यम आय वाले देशों में होंगी। इन देशों में कूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, स्वास्थ्य सेवाओं और जलवायु-संवेदनशील शहरी नियोजन की कमी उनकी अनुकूलन क्षमता को सीमित करती है।

क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के को-फाउंडर और रिपोर्ट के सह-लेखक माइकल ग्रीनस्टोन के अनुसार, "यह जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक है कि जिन देशों ने इस संकट में सबसे कम योगदान दिया, वही इसके सबसे बड़े शिकार बनेंगे। सीमित संसाधनों के कारण ये देश नई जलवायु चुनौतियों से निपटने में भी पीछे हैं।" 

रिपोर्ट बताती है कि समस्या केवल यह नहीं है कि गर्म क्षेत्रों में ठंडे क्षेत्रों की तुलना में अधिक मौतें होंगी, बल्कि सबसे अधिक प्रभाव उन क्षेत्रों पर पड़ेगा जो एक साथ अधिक गर्म और गरीब हैं, क्योंकि उनके पास अनुकूलन के लिए संसाधन सीमित हैं।

अधिक तापमान से होने वाली मौतों को कम करना काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकारें और समाज किस तरह के अनुकूलन उपाय अपनाते हैं। एयर कंडीशनिंग, कूलिंग सेंटर, और स्वास्थ्य सुरक्षा ढांचे में निवेश जैसे कदम लाखों जानें बचा सकते हैं।

रिपोर्ट वैश्विक स्तर पर असमानता को उजागर करती है। उदाहरण के लिए, पश्चिम अफ्रीका का बुर्किना फासो, जहां जलवायु परिस्थितियां कुवैत जैसी हैं, वहां गर्मी से होने वाली मौतें कुवैत से दोगुनी हो सकती हैं, क्योंकि वहां अनुकूलन के संसाधन सीमित हैं।

भारत: क्षेत्रीय असमानताएं स्पष्ट

भारत में तापमान से जुड़ी मृत्यु दर में औसतन 2.4 मौत प्रति 1 लाख लोगों की वृद्धि का अनुमान है, जिससे देश 241 क्षेत्रों में 76वें स्थान पर है। हालांकि, यह औसत आंकड़ा देश के भीतर गहरी क्षेत्रीय असमानताओं को छुपाता है।  

  • दक्षिण-पश्चिम, पूर्वी और अत्यधिक उत्तरी क्षेत्रों में मृत्यु दर में कमी का अनुमान है।
  • कश्मीर के पदम में लगभग 25 प्रति लाख की कमी देखी जा सकती है।
  • उत्तर-पश्चिम और उत्तर-मध्य भारत में मृत्यु दर में सबसे अधिक वृद्धि का अनुमान है।
  • राजस्थान के करणपुर में यह वृद्धि 26 प्रति लाख तक हो सकती है।

सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में गर्मी से होने वाली अतिरिक्त मौतें (लगभग 23-25 प्रति लाख) वर्तमान में तपेदिक और मधुमेह जैसी बीमारियों से होने वाली मृत्यु दर के बराबर हो सकती हैं।

जलवायु परिवर्तन और असमानता 

रिपोर्ट रेखांकित करती है कि जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं है, बल्कि यह गहरी सामाजिक और आर्थिक असमानताओं से जुड़ा संकट भी है। गरीब क्षेत्रों में पहले से ही अधिक तापमान का सामना करना पड़ता है जहां अनुकूलन के लिए कई बाधाएं मौजूद हैं।

रिपोर्ट की शोध प्रमुख तम्मा कार्लेटन का कहना है कि जिन क्षेत्रों में मृत्यु दर में सबसे अधिक वृद्धि होगी, वहीं संसाधनों और सरकारी क्षमता की सबसे अधिक कमी है और वहां अंतरराष्ट्रीय निवेश भी सीमित रहा है। ऐसे में सीमित संसाधनों का सही दिशा में निवेश करना तय करेगा कि भविष्य में कौन जीवित रहेगा और कौन नहीं।

यह रिपोर्ट “एडाप्टेशन रोडमैप” श्रृंखला की पहली कड़ी है, जिसका उद्देश्य यह बताना है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए किन क्षेत्रों में और किस प्रकार के निवेश सबसे प्रभावी होंगे। रिपोर्ट में दुनिया भर के उन इलाकों की पहचान की गई है जहां क्लाइमेट अडैप्टेशन इन्वेस्टमेंट से सबसे ज्यादा जानें बचाई जा सकती हैं।

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