भीषण गर्मी से कृषि पर गहरा असर, एफएओ-डब्ल्यूएमओ रिपोर्ट में खाद्य प्रणालियों पर बढ़ते खतरे की चेतावनी
भारत की कृषि अत्यधिक गर्मी के कारण भारी नुकसान झेल रही है। वर्ष 2022 की हीटवेव के दौरान गेहूं की पैदावार में 34% तक गिरावट दर्ज की गई थी। वैश्विक एजेंसियों की चेतावनी है कि बढ़ता तापमान दुनिया भर की खाद्य प्रणालियों के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है। एफएओ-डब्ल्यूएमओ की संयुक्त रिपोर्ट में बताया गया है कि गर्मी का असर फसलों, पशुधन और कृषि श्रमिकों के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है, जिसमें भारत भी शामिल है।
अत्यधिक गर्मी वैश्विक स्तर पर और भारत में कृषि के लिए सबसे गंभीर खतरों के रूप में तेजी से उभर रही है। इससे उत्पादन, आजीविका और खाद्य सुरक्षा प्रभावित हो रही है। खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) और विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की रिपोर्ट के अनुसार, बढ़ता तापमान अब केवल कभी-कभार आने वाली समस्या नहीं रहा, बल्कि यह एक संरचनात्मक जोखिम बन गया है जो विश्वभर की कृषि प्रणालियों को प्रभावित कर रहा है।
भारत में इस प्रवृत्ति का स्पष्ट उदाहरण देखने को मिला है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और केंद्रीय शुष्क कृषि अनुसंधान संस्थान (CRIDA) के विश्लेषण के अनुसार वर्ष 2022 में मार्च और अप्रैल सबसे गर्म महीने रहे, जब तापमान सामान्य से 8 से 10.8 डिग्री सेल्सियस अधिक था। कई क्षेत्रों में वर्षा में 99 प्रतिशत तक की कमी दर्ज की गई। गर्मी और सूखे के संयुक्त प्रभाव ने उत्तर और मध्य भारत में फसलों, पशुधन और किसानों की आय को गंभीर रूप से प्रभावित किया।
गर्मी का फसलों पर प्रभाव
एफएओ-डब्ल्यूएमओ की रिपोर्ट के अनुसार, जब तापमान 30°C से ऊपर चला जाता है तो अधिकांश फसलें प्रभावित होने लगती हैं। अत्यधिक गर्मी प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया को कम करती है, फसलों के विकास चक्र को छोटा कर देती है और प्रजनन चरण को नुकसान पहुंचाती है। इससे उत्पादन घटता है और गुणवत्ता भी प्रभावित होती है।
भारत में ये प्रभाव 2022 की हीटवेव के दौरान स्पष्ट रूप से देखने को मिले। गेहूं की पैदावार में 9 से 34 प्रतिशत तक गिरावट आई, जिससे देश को निर्यात रोकना पड़ा। मक्का की फसल में वृद्धि रुक गई और कीटों के हमले बढ़े, जिससे उत्पादन में 18 प्रतिशत तक कमी आई। चना जैसी दलहनी फसलों में कमजोर वृद्धि और सिकुड़े हुए दाने देखने को मिले।
बागवानी फसलें इससे भी अधिक प्रभावित रहीं। पत्तागोभी, फूलगोभी और टमाटर जैसी सब्जियों में उत्पादन 50 प्रतिशत तक घट गया, जबकि सेब, आलूबुखारा और नींबू जैसी फलों की फसलों में फूल झड़ना, सनबर्न और कीट प्रकोप जैसी समस्याएं सामने आईं। ये नुकसान दर्शाते हैं कि अत्यधिक गर्मी केवल खाद्यान्न ही नहीं, बल्कि उच्च मूल्य वाली फसलों को भी गंभीर रूप से प्रभावित करती है।
भारत की लगभग 70 प्रतिशत कैलोरी आवश्यकता पूरी करने वाला चावल भी इस बढ़ते खतरे का सामना कर रहा है। वैश्विक स्तर पर भी चावल लगभग 20 प्रतिशत आहार ऊर्जा प्रदान करता है, जिससे यह खाद्य सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बन जाता है। भारत में बढ़ते तापमान और अनियमित मानसून के कारण चावल की खेती, विशेष रूप से इंडो-गंगा के घनी आबादी वाले मैदानों में, अधिक जोखिम में आने की आशंका है।
पशुधन उत्पादकता में गिरावट
विश्वभर में हीट स्ट्रेस (अत्यधिक गर्मी) का प्रभाव पशुधन प्रणालियों पर भी पड़ रहा है। एफएओ-डब्ल्यूएमओ की रिपोर्ट के अनुसार बढ़ते तापमान से पशुओं में चारे का सेवन कम होता है, दूध उत्पादन घटता है और प्रजनन क्षमता प्रभावित होती है।
भारत में वर्ष 2022 की हीटवेव के दौरान दूध उत्पादन में लगभग 15% तक की गिरावट दर्ज की गई। डेयरी पशुओं के शरीर का तापमान बढ़ा, भूख कम हुई और बीमारियों की घटनाएं बढ़ीं। पोल्ट्री क्षेत्र भी प्रभावित हुआ, जहां शुरुआती दिनों में अंडा उत्पादन में लगभग 10% तक कमी आई और मृत्यु दर में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
रिपोर्ट के अनुसार, यदि उत्सर्जन उच्च स्तर पर बना रहता है तो सदी के अंत तक दुनिया के लगभग आधे मवेशी खतरनाक हीट स्ट्रेस की स्थिति का सामना कर सकते हैं। इससे डेयरी और मांस उत्पादन प्रणालियों के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है।
मत्स्य पालन और एक्वाकल्चर पर खतरा
अत्यधिक गर्मी का प्रभाव केवल भूमि आधारित कृषि तक सीमित नहीं है। समुद्री हीटवेव वैश्विक स्तर पर बढ़ रही है, जिससे मछलियों की संख्या और जलीय पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो रहे हैं। बढ़ते तापमान से पानी में ऑक्सीजन का स्तर घटता है, खाद्य श्रृंखला बाधित होती है और मछलियां ठंडे क्षेत्रों की ओर पलायन करने लगती हैं।
भारत का मत्स्य क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है, विशेष रूप से अंतर्देशीय जलीय कृषि प्रणाली अधिक संवेदनशील है, जहां बढ़ता तापमान पानी की गुणवत्ता को प्रभावित करता है और रोगों के प्रकोप को बढ़ाता है। जहां लाखों लोग आजीविका और पोषण के लिए मत्स्य पालन पर निर्भर हैं, यह बदलाव दूरगामी प्रभाव डाल सकते हैं।
वन और बागान फसलों पर प्रभाव
वन और बागान फसलें लगातार बढ़ते तापमान के कारण हीट स्ट्रेस (गर्मी के दबाव) की चपेट में आ रही हैं। वैश्विक स्तर पर उच्च तापमान का संबंध जंगलों में आग की बढ़ती घटनाओं, कीट प्रकोप में वृद्धि और वनों में गिरावट से जोड़ा जा रहा है।
भारत में भी अत्यधिक गर्मी के दौरान बागान फसलें और बाग-बगीचे स्ट्रेस के संकेत दिखा चुके हैं। वर्ष 2022 में फलदार पेड़ों की उत्पादकता घटी और कीटों का प्रकोप बढ़ा। ऐसे प्रभाव न केवल किसानों की आय को कम करते हैं, बल्कि पारिस्थितिक संतुलन और जैव विविधता पर भी नकारात्मक असर डालते हैं।
कृषि श्रमिकों पर बढ़ता खतरा
अत्यधिक गर्मी का सबसे गंभीर लेकिन अक्सर नजरअंदाज किया जाने वाला प्रभाव कृषि श्रमिकों पर पड़ता है। रिपोर्ट के अनुसार, 20°C से ऊपर हर 1 डिग्री तापमान बढ़ने पर श्रम उत्पादकता में 2-3% की गिरावट आती है।
भारत, जहां बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर है, इस खतरे के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील है। केवल धान की खेती में लाखों श्रमिक खुले खेतों में काम करते हैं। जलवायु अनुमानों के अनुसार, दक्षिण एशिया में इस सदी के अंत तक वेट-बल्ब तापमान मानव जीवन के लिए खतरनाक स्तर तक पहुंच सकता है।
हीटवेव के दौरान श्रमिकों को डिहाइड्रेशन, लू (हीटस्ट्रोक) और काम के घंटों में कमी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जिससे खेती-किसानी और ग्रामीण आय पर सीधा असर पड़ता है। चरम परिस्थितियों में कुछ क्षेत्रों में साल में 250 दिनों तक काम करना असुरक्षित हो सकता है।
अनुकूलन रणनीतियों से उम्मीद
बढ़ते जोखिमों के बावजूद, वैश्विक और भारतीय अध्ययनों में अत्यधिक गर्मी के प्रभाव को कम करने के लिए कई अनुकूलन रणनीतियों पर जोर दिया गया है। एफएओ-डब्ल्यूएमओ की रिपोर्ट में गर्मी के प्रति सहनशील फसल किस्मों के विकास, बेहतर सिंचाई व्यवस्था, उन्नत मृदा प्रबंधन और जलवायु-स्मार्ट खेती को अपनाने की आवश्यकता बताई गई है। बुवाई की तारीखों में बदलाव और जल्दी पकने वाली किस्मों का उपयोग कर किसान तेज गर्मी के दौर से बच सकते हैं।
भारत में भी इसी तरह की रणनीतियों पर काम किया जा रहा है। धान की खेती में जल्दी फूल आने वाली किस्मों का उपयोग, रोपाई के समय में बदलाव और सिंचाई के माध्यम से सतह के तापमान को कम करना प्रमुख उपायों में शामिल हैं। इसके साथ ही, गर्मी सहन करने वाली फसलों के विकास पर भी जोर बढ़ रहा है।
संस्थागत स्तर पर अर्ली वार्निंग सिस्टम, फसल बीमा योजनाएं और जलवायु परामर्श सेवाएं बेहद महत्वपूर्ण मानी गई हैं। हालांकि विशेषज्ञों के अनुसार जागरूकता की कमी, सीमित वित्तीय संसाधन और कमजोर विस्तार सेवाएं, विशेषकर छोटे और सीमांत किसानों के लिए, अब भी बड़ी बाधाएं बनी हुई हैं।
कृषि पर अत्यधिक गर्मी का बढ़ता प्रभाव यह दर्शाता है कि जलवायु जोखिम आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं। भारत जैसे देश में, जहां कृषि आजीविका और खाद्य सुरक्षा का मुख्य आधार है, यह चुनौती और भी गंभीर है। किसानों की सुरक्षा और स्थिर खाद्य आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए अनुकूलन उपायों, निवेश और मजबूत नीतिगत समर्थन के माध्यम से लचीलापन बढ़ाना बेहद जरूरी होगा। रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि केवल अनुकूलन ही पर्याप्त नहीं है। दीर्घकालिक नुकसान से बचने के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी लाना और तापमान वृद्धि को सीमित करना अनिवार्य है।

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