संविधान का 97वां संशोधन और सुप्रीम कोर्ट का हाल का निर्णय: नए सहकारिता मंत्रालय के लिए इसका क्या है मतलब और असर

नया सहकारिता मंत्रालय अगर रणनीतिक विजन और बड़े विकास की भूमिका अपनाए, तो वह भारत के करोड़ों गरीबों का जीवन बदल सकता है

संविधान का 97वां संशोधन और सुप्रीम कोर्ट का हाल का निर्णय:  नए सहकारिता मंत्रालय के लिए इसका क्या है मतलब और असर

पहले संक्षिप्त पृष्ठभूमि

6 जुलाई 2021 को इन उद्देश्यों के साथ नए सहकारिता मंत्रालय का गठन  किया गया... 1. सहकारिता के सभी क्षेत्रों में सहयोग और हर तरह की गतिविधियों में समन्वय की  नीति बनाना (अपने संबंधित क्षेत्रों में सहकारिता के लिए मंत्रालय ही जिम्मेदार है)। 2. "सहयोग से समृद्धि" उद्देश्य की प्राप्ति। 3. देश में सहकारिता आंदोलन को मजबूत बनाना और उसे जमीनी स्तर तक  पहुंचाना। 4. सहकारिता आधारित आर्थिक विकास मॉडल को बढ़ावा। 5. सहकारी समितियों को लक्ष्य हासिल करने में मदद के लिए उचित नीति और संस्थागत ढांचा बनाना । 6. राष्ट्रीय सहकारी संगठनों और राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम से संबंधित मामलों पर विचार । 7. सहकारी समितियों का गठन, उनका विनियमन और उन्हें बंद करना- जिनका कामकाज एक राज्य तक सीमित न हो। 8. सहकारी विभागों और सहकारी संस्थानों के कर्मियों का प्रशिक्षण ।

अनेक लोगों को लगा कि जब पहले से ही कृषि विभाग में सहकारिता विभाग को एक संयुक्त सचिव संभाल रहा था तो नया मंत्रालय  बनाने की जरूरत क्यों पड़ी? कुछ लोगों ने इसे संविधान के 97वें संशोधन से भी जोड़कर देखा। परंतु सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के भाग IX बी को अधिकारातीत ठहराने के गुजरात उच्च न्यायालय के निर्णय को आंशिक रूप से बरकरार रखा था। यह निर्णय एक व्यक्ति की जनहित याचिका पर उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार की अपील पर सुनाया गया था। कोई राज्य सरकार इसमें पक्षकार नहीं थी।

लोकसभा ने 27 दिसंबर 2011 को 97वां संविधान संशोधन पारित किया था। राज्यसभा ने उसे 28 दिसंबर 2011 को पारित किया । राष्ट्रपति ने 12 जनवरी 2012 को मंजूरी दी और संशोधन 15 फरवरी 2012 से प्रभावी हो गया। गुजरात उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने 22 अप्रैल 2013 को एक फैसले में IXबी को सम्मिलित करने को अधिकारातीत करार दिया क्योंकि उसके लिए अनुच्छेद 368(2) में बदलाव की जरूरत थी। हालांकि उससे अनुच्छेद 19(1) (सी) में संशोधन और अनुच्छेद 43बी शामिल किया जाना प्रभावित नहीं हुए।

क्या हैं प्रावधान

अनुच्छेद 19- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े कुछ अधिकारों का संरक्षण आदि।

(1) सभी नागरिकों को.. (सी) एसोसिएशन, यूनियन या सहकारी समितियां बनाने का अधिकार है ;

अनुच्छेद 43बी- सहकारी समितियों को बढ़ावा

सरकार सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन, स्वायत्त कामकाज, लोकतांत्रिक नियंत्रण और पेशेवर प्रबंधन को बढ़ावा देने का प्रयास करेगी ।

अनुसूची VII में प्रासंगिक प्रविष्टियां:

सूची I—संघ सूची

  1. बैंकिंग, बीमा और वित्तीय निगमों सहित व्यापारिक निगमों का गठन, विनियमन और उन्हें बंद करना, लेकिन सहकारी समितियां इसमें शामिल नहीं हैं।
  2. निगमों का गठन, विनियमन और उन्हें बंद करना, चाहे वे व्यापारिक निगम हों या नहीं, उनका कामकाज राज्य तक सीमित न हो, लेकिन विश्वविद्यालय इसमें शामिल नहीं हैं।

सूची II—राज्य सूची

  1. सूची 1 में निर्धारित निगमों को छोड़कर अन्य निगमों का गठन, विनियमन और उन्हें बंद करना, विश्वविद्यालय; अनिगमित व्यापार, साहित्यिक, वैज्ञानिक, धार्मिक और अन्य सहकारी समितियां।

राज्य सूची की प्रविष्टि 32 के अनुसार "सहकारी समितियां" राज्यों का विषय है और अधिकांश राज्य विधानमंडलों ने सहकारी समितियों पर कानून बनाए हैं।  राज्यों के कानून में बड़े पैमाने पर सहकारी समितियों के विकास को सामाजिक और आर्थिक न्याय हासिल करने विकास के समान वितरण के लिए जरूरी माना गया। लेकिन, सहकारी समितियों के काफी विस्तार के बावजूद, उनका प्रदर्शन उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा है। राज्यों के सहकारी समिति कानूनों में सुधार की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए, 2004 और 2008 के बीच राज्यों के सहकारी मंत्रियों के साथ केंद्र की कई बैठकें हुईं। इन बैठकों में राज्यों ने सहकारी समितियों को स्वतंत्र रखने के लिए संविधान में संशोधन करने की जरूरत बताई थी ताकि अनावश्यक बाहरी हस्तक्षेप न हो और उनके स्वायत्त संगठनात्मक ढांचे और लोकतांत्रिक कामकाज को सुनिश्चित किया जा सके ।

सुधार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि सहकारी समितियां लोकतांत्रिक, पेशेवर, स्वायत्त और आर्थिक रूप से मजबूत तरीके से काम करें । इसलिए राज्य के नीति निर्देशक तत्व में एक नया अनुच्छेद जोड़ा गया, ताकि राज्य सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन, स्वायत्त कामकाज, लोकतांत्रिक नियंत्रण और पेशेवर प्रबंधन को बढ़ावा दें।

भाग IX बी में अन्य बातों के साथ, निम्नलिखित बातें भी शामिल हैं-

  1. लोकतांत्रिक सदस्यों के नियंत्रण, उनकी आर्थिक भागीदारी और स्वायत्त कामकाज के सिद्धांतों पर आधारित सहकारी समितियों के गठन, विनियमन और बंद करने के प्रावधान बनाना।
  2. सहकारी समिति में निदेशकों की अधिकतम संख्या तय करना, जो 21 से ज्यादा न हो।
  3. निर्वाचित बोर्ड के सदस्यों और उसके पदाधिकारियों को चुनाव की तारीख से पांच साल की निश्चित अवधि प्रदान करना।
  4. सहकारी समिति के निदेशक मंडल के प्रतिबंध या निलंबन के लिए छह महीने की अधिकतम समय सीमा तय करना ।
  5. स्वतंत्र पेशेवर ऑडिटिंग का प्रावधान करना।
  6. सहकारी समितियों के सदस्यों को सूचना का अधिकार प्रदान करना।
  7. राज्य सरकारों को सहकारी समितियों की गतिविधियों और खातों की समय -समय पर रिपोर्ट प्राप्त करने का अधिकार देना।
  8. प्रत्येक सहकारी समिति के बोर्ड में अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के लिए एक सीट और महिलाओं के लिए दो सीटें आरक्षित करना।
  9. सहकारी समितियों में किसी तरह का अपराध होने पर जुर्माने का प्रावधान करना।

कोर्ट का फैसला

गुजरात उच्च न्यायालय ने 2013 में फैसला सुनाया कि भाग IX बी अधिकारातीत है। भारत सरकार ने इसके खिलाफ सर्वोच्च न्यालय में अपील की, जिसकी सुनवाई हाल ही में समाप्त हुई और निर्णय 20 जुलाई 2021 को सुनाया गया।

यहां सात सहकारी सिद्धांतों' को दिशा-निर्देशों के रूप में देखना विवेकपूर्ण होगा। सहकारी समितियां इन सिद्धांतों पर चलकर अपने मूल्यों को व्यवहार में ला सकती हैं।

सिद्धांत निम्नलिखित हैं:-

"पहला  सिद्धांत: स्वैच्छिक और खुली सदस्यता वाले कोऑपरेटिव स्वैच्छिक संगठन हैं।  ये सभी व्यक्तियों के लिए खुले हैं। इसकी सदस्यता लैंगिक, सामाजिक, नस्लीय, राजनीतिक या धार्मिक भेदभाव के बिना होनी चाहिए।

दूसरा सिद्धांत: लोकतांत्रिक सदस्य नियंत्रित कोऑपरेटिव, एक तरह के लोकतांत्रिक संगठन हैं जिनका नियंत्रण उसके सदस्य करते हैं, जो संगठन की नीतियां बनाने और  निर्णय लेने में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं।

तीसरा  सिद्धांत: सदस्य की आर्थिक भागीदारी। सभी सदस्य पूंजी में समान रूप से योगदान करते हैं, और कोऑपरेटिव की पूंजी को लोकतांत्रिक रूप से नियंत्रित करते हैं। निजी कंपनी के विपरीत यहां पूंजी का एक बड़ा हिस्सा आमतौर पर कॉपरेटिव की साझा संपत्ति होती है।

चौथा सिद्धांत: स्वायत्तता और स्वतंत्रता।  कोऑपरेटिव स्वायत्त और स्वयं सहायता संगठन होते हैं जिनका नियंत्रण उनके सदस्य करते हैं।

पांचवां सिद्धांत: शिक्षा, प्रशिक्षण और सूचना। कोऑपरेटिव अपने सदस्यों, निर्वाचित प्रतिनिधियों, प्रबंधकों और कर्मचारियों को शिक्षा एवं प्रशिक्षण मुहैया करवाते हैं, ताकि वे कोऑपरेटिव के विकास में प्रभावी रूप से योगदान कर सकें ।

छठा सिद्धांत: सहकारी समितियों के बीच सहयोग। सहकारी समितियां अपने सदस्यों को सबसे सक्षम तरीके से सेवा प्रदान करती हैं। वे स्थानीय, राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय  समुदायों के साथ काम करके सहकारिता आंदोलन को मजबूत बनाती हैं।

सातवां सिद्धांत: समुदाय की चिंता। सहकारी समितियां सदस्यों द्वारा अनुमोदित  नीतियों के माध्यम से अपने समुदाय के स्थायी विकास के लिए काम करती हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने भाग IXबी के कुछ प्रावधानों को संवैधानिक रूप से कमजोर माना। उसने हाइकोर्ट के फैसले को बरकार तो रखा लेकिन उस हिस्से को नहीं माना जिसमें संविधान के भाग IXबी को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि संविधान का भाग IXबी विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कार्यशील बहु-राज्यीय सहकारी समितियों के मामले तक सही है।

यहां ध्यान देने वाली एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इस मामले का फैसला “कानून बनाने का अधिकार किसे है?” इस संवैधानिक सिद्धान्त के आधार पर किया गया।  ऐसा प्रतीत होता है कि अनुच्छेद 368(2) के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन न करना प्रमुख मुद्दा है, जिस पर यह मामला टिका है। इसके मेरिट पर कोई बहस नहीं हुई।

यहां एक और ध्यान देने वाली बात है कि 17 राज्य IXबी के प्रावधानों को ध्यान में रखकर अपने सहकारी कानूनों में संशोधन कर चुके हैं।

सहकारी बैकिंग प्राणली में एक बड़ा बदलाव बैंकिग विनियमन अधिनियम में 2020 में किए गए संशोधनों से आया, जिसमें सहकारी बैकों का प्रभावी नियंत्रण भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को दे दिया गया। हालांकि प्राथमिक कृषि ऋण (पीएसी ) समितियों को इसके दायरे से बाहर रखा गया है, इसके बावजूद राज्य सहकारी बैंक, जिला सहकारी बैंक और पीएसी की त्रि-स्तरीय संरचना इससे प्रभावित हुई है। केरल ने इनमें से कुछ मुद्दों से निपटने के लिए राज्य सहकारी बैंक की जगह एक नया केरल बैंक बनाया है । यह और बात है कि सहकारी  ऋण प्रणाली देश की अल्प अवधि वाली ऋण प्रणाली में 10 प्रतिशत से भी कम हिस्सा रखती है । लेकिन मजबूत सहकारी ढांचे वाले राज्य चिंतित हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि सहकारी समितियां बनाना एक मौलिक अधिकार है और ये समितियां निदेशक सिद्धांतों का हिस्सा हैं। भाग IXबी में अनुच्छेद 243 ZH से ZT तक शामिल हैं, ये अब केवल बहु-राज्यीय सहकारी समितियों पर लागू होंगे । खास तौर से अनुच्छेद 243 ZL और ZT को राज्य विधानसभाओं के अधिकारों का अतिक्रमण पाया गया, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय दिया।

नए सहकारिता मंत्रालय के सामने अब तीन उपाय हैं।

  1. सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के अनुरूप चलते हुए राज्य सरकार के सभी संदर्भों को हटाने लिए एक संवैधानिक संशोधन करे, या
  2. मौजूदा IXबी को मान्य करने के लिए अनुच्छेद 368(2) के तहत आगे बढ़े, या
  • अनुच्छेद 368(2) के तहत आगे बढ़ते हुए सहकारिता को सूची III के तहत समवर्ती सूची में डाले।

तीसरा विकल्प अपनाने पर कुछ राज्यों के विरोध का सामना करना पड़ सकता है। पहला विकल्प आसान है। दूसरा विकल्प भी शायद मुश्किल ना हो क्योंकि कोई भी राज्य  इस संविधान संशोधन के खिलाफ नहीं गया। राज्य जो कर रहे हैं, अगर उन्हें वैसा करने की अनुमति दी जाती है तो निदेशकों की सख्या पर अंकुश, सूचना के अधिकार , लोकतांत्रिक गवर्नेंस और पेशेवर प्रंबधन जैसी बातों का लागू होना मुश्किल होगा।

नया मंत्रालय क्या करे ?

एक विकल्प तो यह है कि वह नियंत्रणकारी रवैया अपनाए। वह संविधान में संशोधन करके और सहकारी समितियों को समवर्ती सूची में डाल कर उन्हें अपने नियंत्रण में ले सकता है।  दूसरा विकल्प यह है कि वह विकासात्मक नजरिया अपनाए। वह अनुच्छेद 43बी में लिखित चार मूल सिद्धांतों के आधार पर सहकारी समितियों को कार्य करने दे। ऐसा करके ग्रामीण भारत में समाजिक –आर्थिक क्रांति लाई जा सकती है। स्वयं सहायता समूहों और आजीविका मिशन  की सफलता से मंत्रालय  को प्रोत्साहन मिलना चाहिए। ग्रामीण स्तर की सहकारी समितियों को बड़े स्तर की मल्टीटास्किंग स्वयं सहायता समूह बनने के लिए प्रोत्साहित करना और अपने सदस्यों के लिए संघ बनाना (अमूल की तरह) उसकी प्राथमिकता होनी चाहिए।

इसके लिए ये प्रयास जरूरी हैं-

  1. नई सहकारी समितियों (श्रमिक, किसान, महिला, कारीगर आदि) को संगठित करना और बिजनेस मॉडल विकसित करना ताकि उसकी मार्केट वैल्यू बन सके । स्थायी सब्सिडी का पुराना तर्क काम नहीं करेगा।
  2. शुरू में पूंजी, संगठनात्मक और प्रबंधकीय स्तर पर इनकी सहायता करें।
  • उनके प्रबंधन को पेशेवर बनाना, मौजूदा प्रबंधन को नौकरशाही से मुक्त करना।
  1. सभी अनुदानों और रियायती वित्त को सशर्त बनाना और उन्हें स्वैच्छिक गठन, लोकतांत्रिक गवर्नेंस, स्वायत्त कामकाज और पेशेवर प्रबंधन के चार बुनियादी सिद्धांतों से जोड़ना।

नया सहकारिता मंत्रालय अगर रणनीतिक विजन और बड़े विकास की भूमिका अपनाए, तो वह भारत के करोड़ों गरीबों का जीवन बदल सकता है।

(टी.  नंद कुमार,  केंद्रीय कृषि  एवं सहकारिता मंत्रालय के पूर्व सचिव और नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (एनडीडीबी) के पूर्व चेयरमैन हैं। लेख में व्यक्त विचार उनके निजी विचार हैं।)