अग्रसरी नीति समीक्षा में पंचायतों की भूमिका पर चर्चा, विशेषज्ञों ने कहा जनभागीदारी से ही मजबूत होंगे पंचायत सुधार
अग्रसरी की नीति समीक्षा में कहा गया कि पंचायत राज संस्थाओं को मजबूत करने के लिए जनभागीदारी, विकेंद्रीकरण और शक्तियों का समय पर हस्तांतरण जरूरी है। विशेषज्ञों ने क्षमता निर्माण, वित्तीय स्वायत्तता और सुशासन सुधारों को “विकसित भारत 2047” के लक्ष्य के लिए अहम बताया।
जमीनी स्तर पर प्रभावी शासन सुनिश्चित करने के लिए पंचायत राज सुधार केवल सक्रिय जनभागीदारी और संस्थाओं के सुदृढ़ीकरण के माध्यम से ही संभव हैं। हालांकि पंचायती राज संस्थाओं को अधिकार देने वाला 73वां संविधान संशोधन अधिनियम लागू हुए 30 वर्ष से अधिक का समय बीत चुका है, फिर भी कई राज्यों में पंचायतों को निधियों, कार्यों और शक्तियों का पूर्ण हस्तांतरण अभी तक नहीं हो पाया है। तिरुपति स्थित अकादमी ऑफ ग्रासरूट्स स्टडीज एंड रिसर्च ऑफ इंडिया (AGRASRI) की तरफ से आयोजित एक नीति समीक्षा में ये बातें कही गईं।
ऑनलाइन आयोजित इस नीति समीक्षा बैठक को संबोधित करते हुए चित्तूर जिला प्रजा परिषद के उप मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. जी. वेंकट नारायण ने कहा कि ग्रामीण भारत में पंचायतों की भूमिका बहुआयामी है और वे कल्याणकारी तथा विकास योजनाओं को लोगों तक पहुंचाने का प्रमुख माध्यम हैं। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद से पंचायत राज व्यवस्था को मजबूत करने के लिए कई सुधार किए गए हैं, जिनमें 73वां संवैधानिक संशोधन अधिनियम देश की छह लाख से अधिक पंचायतों के लिए एक मील का पत्थर साबित हुआ है।
आंध्र प्रदेश में हालिया प्रशासनिक सुधारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि सचिवालय (Sachivalayam) प्रणाली ने ग्रामीण क्षेत्रों में कल्याणकारी योजनाओं की समयबद्ध डिलीवरी को बेहतर बनाया है। पंचायत राज ढांचे में कर्तव्यों का स्पष्ट बंटवारा और लंबे समय से लंबित पदोन्नतियों जैसे कदमों ने भी जमीनी स्तर पर बेहतर प्रशासन का मार्ग प्रशस्त किया है।
पंचायत को अभी तक पूर्ण अधिकार हस्तांतरित नहीं
अग्रसरी (AGRASRI) के संस्थापक और निदेशक डॉ. डी. सुंदर राम ने कहा कि 73वें संवैधानिक संशोधन को लागू हुए तीन दशक से अधिक समय बीत जाने के बावजूद कई राज्यों में पंचायतों को निधियों, कार्यों और शक्तियों का पूर्ण हस्तांतरण अभी तक नहीं हो पाया है। उन्होंने कहा कि यह स्थिति समग्र ग्रामीण विकास में बाधा बनी हुई है। उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा भारतीय ग्रामीण विकास सेवा (IRDS) शुरू करने के फैसले का स्वागत किया और इसे ग्रामीण शासन को सशक्त बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।
उन्होंने आगे तत्काल सुधारों की आवश्यकता पर जोर देते हुए निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिए क्षमता निर्माण कार्यक्रम, ग्राम स्तर पर प्लानिंग, भ्रष्टाचार और जन-शिकायतों के समाधान के लिए लोकपाल जैसी व्यवस्था और पंचायतों को निधि, कार्य एवं शक्तियों का शीघ्र हस्तांतरण सुनिश्चित करने की वकालत की। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि पंचायत स्तर पर अनुभव रखने वाले प्रतिनिधियों के लिए संसद और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण दिया जाना चाहिए, ताकि जमीनी लोकतंत्र को और मजबूती मिल सके।
बैठक में विशेषज्ञों ने कहा कि बेहतर सेवा वितरण, बुनियादी ढांचे के विकास और प्रशासनिक समन्वय के लिए विकेंद्रीकरण और वित्तीय स्वायत्तता अत्यंत आवश्यक हैं। उन्होंने वित्त आयोगों की सिफारिशों के प्रभावी क्रियान्वयन और पंचायतों को सीधे धन हस्तांतरण पर भी जोर दिया।
विकेंद्रीकरण और वित्तीय स्वायत्तता अहम
बैठक में शिक्षाविदों और विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि 73वें संशोधन के प्रावधानों के क्रियान्वयन में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्य दक्षिण भारत के अन्य राज्यों से पीछे हैं। उन्होंने ग्राम स्तर पर संस्थागत ढांचे को मजबूत करने और जन प्रतिनिधियों के लिए नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने की आवश्यकता बताई।
चर्चा के दौरान ग्राम सभाओं की बढ़ती भूमिका पर भी विशेष जोर दिया गया। वक्ताओं ने कहा कि ग्राम सभाएं पारदर्शिता, जवाबदेही और नागरिकों की भागीदारी सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इन संस्थाओं को मजबूत करना “ग्राम स्वराज” के लक्ष्य और 2047 तक विकसित भारत के विजन को साकार करने के लिए अत्यंत आवश्यक है।

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