WTO MC14: गहराते मतभेदों के कारण प्रमुख व्यापारिक मुद्दों पर गतिरोध बने रहने के आसार
विश्व व्यापार संगठन (WTO) का 14वां मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (MC14) कैमरून के याउंदे में होने जा रहा है। इसमें विकसित और विकासशील देशों के बीच कृषि, फिशरीज, डिजिटल ट्रेड और संस्थागत सुधारों पर गहरे मतभेद उजागर होने के आसार हैं। सार्वजनिक भंडारण, ई-कॉमर्स मोरेटोरियम और विवाद निपटान जैसे मुद्दों पर सहमति न बनने से ठोस फैसलों के बजाय विभिन्न प्रावधानों को केवल आगे बढ़ाए जाने की उम्मीद है।
विश्व व्यापार संगठन (WTO) के 166 सदस्य देशों के व्यापार मंत्री 26 से 29 मार्च तक कैमरून के याउंदे (Yaoundé) में 14वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (MC14) में भाग लेंगे। यह बैठक ऐसे समय हो रही है जब वैश्विक व्यापार 35 ट्रिलियन डॉलर के पार पहुंच चुका है, लेकिन बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली गंभीर दबाव का सामना कर रही है। कृषि सब्सिडी, खाद्य सुरक्षा के लिए सार्वजनिक भंडारण, फिशरीज सब्सिडी, डिजिटल व्यापार नियम और विवाद निपटान सुधार जैसे अहम मुद्दों पर विकसित और विकासशील देशों के बीच गहरे मतभेद बने हुए हैं।
थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनीशिएटिव (GTRI) और रिसर्च एंड इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर डेवलपिंग कंट्रीज (RIS) ने अपनी रिपोर्टों में कहा है कि प्रमुख वार्ता मसौदों पर सहमति के अभाव और दोनों पक्षों के अड़े रहने के कारण बड़े नतीजों की उम्मीद कम है। इसके बजाय, MC14 को एक “होल्डिंग” मंत्रिस्तरीय सम्मेलन के रूप में देखा जा रहा है, जहां ई-कॉमर्स मोरेटोरियम और खाद्य भंडारण पर पीस क्लॉज जैसे मौजूदा प्रावधानों को आगे बढ़ाने पर ध्यान रहेगा, जबकि विवादित मुद्दों को भविष्य के लिए टाल दिया जाएगा।
कृषि वार्ता: प्रमुख मुद्दों पर लगातार गतिरोध
डब्ल्यूटीओ वार्ताओं में कृषि अब भी सबसे विवादास्पद क्षेत्र बना हुआ है, जो खाद्य सुरक्षा की जरूरतों और व्यापार उदारीकरण के लक्ष्यों के बीच गहरे टकराव को दर्शाता है। चर्चाएं मुख्य रूप से सार्वजनिक भंडारण (PSH), घरेलू समर्थन, बाजार पहुंच, निर्यात प्रतिबंध, कपास और विशेष सुरक्षा तंत्र (SSM) जैसे प्रमुख मुद्दों पर केंद्रित हैं।
विकसित देश सभी मुद्दों को एक साथ शामिल करते हुए व्यापक वार्ता के दृष्टिकोण का समर्थन करते हैं। इसके विपरीत, भारत सहित विकासशील देश सार्वजनिक भंडारण और विशेष सुरक्षा तंत्र जैसे अनिवार्य मुद्दों को प्राथमिकता देने की मांग कर रहे हैं, क्योंकि ये सीधे खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका से जुड़े हैं।
सब्सिडी नियमों में संरचनात्मक असंतुलन एक बड़ा विवाद का कारण है। पहले मिले अधिकारों के कारण विकसित देशों के पास अधिक नीतिगत लचीलापन है, जबकि विकासशील देशों पर कड़े प्रतिबंध लागू हैं। इस असमानता को लंबे समय से अन्यायपूर्ण माना जाता रहा है। विभिन्न पक्षों के बीच मतभेदों के कारण, एमसी14 में कृषि वार्ताओं से ठोस समझौतों के बजाय केवल प्रक्रियात्मक परिणाम (जैसे प्रतिबद्धताओं की पुनः पुष्टि करना) ही निकलने की संभावना है।
सार्वजनिक भंडारण: भारत के लिए प्रमुख मुद्दा
भारत का सार्वजनिक भंडारण कार्यक्रम WTO की चर्चाओं के केंद्र में रहने की संभावना है। इस प्रणाली के तहत सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खाद्यान्न की खरीद करती है, बफर स्टॉक बनाती है और करोड़ों लोगों को सब्सिडी वाले खाद्यान्न का वितरण करती है।
हालांकि, WTO के नियम इस तरह के समर्थन को व्यापार को विकृत करने वाला मानते हैं और इसकी गणना 1986-88 की पुरानी संदर्भ कीमतों के आधार पर करते हैं। इससे सब्सिडी का आकलन बढ़ा-चढ़ाकर होता है और भारत जैसे देशों को, वास्तविक समर्थन कम होने के बावजूद, सीमा उल्लंघन के जोखिम का सामना करना पड़ता है।
भारत लगातार एक स्थायी समाधान की मांग कर रहा है, जिसमें संदर्भ मूल्य प्रणाली को अपडेट करना और खाद्य सुरक्षा कार्यक्रमों के लिए नीति में लचीलापन सुनिश्चित करना शामिल है। भारत का यह भी कहना है कि विकसित देशों के पास लगभग 95 प्रतिशत सब्सिडी का अधिकार है।
दूसरी ओर अमेरिका, यूरोपीय संघ और केर्न्स जैसे उद्योग समूह व्यापक छूट का विरोध करते हैं और तर्क देते हैं कि इससे व्यापार में विकृति आ सकती है। सहमति के अभाव में 2013 का अंतरिम “शांति प्रावधान” (पीस क्लॉज) अस्थायी सुरक्षा के रूप में जारी रहने की संभावना है।
मूल विवाद WTO के कृषि समझौते (Agreement on Agriculture) के तहत सब्सिडी नियमों में निहित है, जहां प्रशासनिक कीमतों पर खरीद को एंबर बॉक्स के अंतर्गत रखा जाता है। पुराने बाह्य संदर्भ मूल्य (ERP) इस समस्या को और जटिल बना देते हैं।
जी-33 और अफ्रीकी समूह के नेतृत्व में विकासशील देश मूल्य बेंचमार्क को अपडेट करने, कवरेज बढ़ाने और कानूनी स्पष्टता सुनिश्चित करने जैसे सुधारों की मांग कर रहे हैं। वहीं, विकसित देश पारदर्शिता और व्यापार विकृति के मुद्दों का हवाला देते हुए सतर्क रुख अपनाए हुए हैं। कोविड-19 महामारी और जलवायु संकट जैसी वैश्विक परिस्थितियों ने पीएसएच की महत्ता को और मजबूत किया है, लेकिन गहरे मतभेदों के कारण बातचीत अभी ठप पड़ी हुई है।
फिशरीज सब्सिडी: सस्टेनेबिलिटी और आजीविका के बीच संतुलन
फिशरीज क्षेत्र से जुड़ी वार्ताएं वर्ष 2022 में अवैध, अनियमित और गैर-रिपोर्टेड (IUU) मछली पकड़ने पर हुए समझौते के बाद एक महत्वपूर्ण चरण में प्रवेश कर चुकी हैं। वर्तमान में ध्यान उन सब्सिडी पर है जो अत्यधिक क्षमता और अधिक मछली पकड़ने (ओवरफिशिंग) को बढ़ावा देती हैं।
वैश्विक स्तर पर मत्स्य क्षेत्र 10 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार प्रदान करता है, जिनमें अधिकांश विकासशील देशों के छोटे पैमाने के मछुआरे शामिल हैं। हालांकि, सब्सिडी का वितरण अत्यंत असमान है और इसका बहुत कम हिस्सा इन मछुआरों तक पहुंच पाता है।
भारत का तर्क है कि उसकी सब्सिडी छोटे और पारंपरिक मछुआरों के समर्थन के लिए हैं और इन्हें औद्योगिक स्तर की सब्सिडी के बराबर नहीं माना जाना चाहिए। विकसित देश पर्यावरणीय क्षति को रोकने के लिए कड़े नियमों की वकालत कर रहे हैं। दोनों पक्षों के बीच गहरे मतभेदों को देखते हुए, MC14 में व्यापक फिशरीज सब्सिडी पर अंतिम समझौता होने की संभावना कम है।
ई-कॉमर्स मोरेटोरियम: डिजिटल विभाजन को लेकर चिंता बढ़ी
डब्ल्यूटीओ का लंबे समय से लागू इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर सीमा शुल्क न लगाने का मोरेटोरियम अब एक बड़ा विवादास्पद मुद्दा बन गया है। विकसित देश डिजिटल व्यापार को बढ़ावा देने के लिए इसे स्थायी बनाना चाहते हैं, जबकि विकासशील देश इसका विरोध कर रहे हैं।
भारत ने राजस्व में नुकसान, नीतिगत सीमाओं और घरेलू डिजिटल उद्योगों पर इसके प्रभाव को लेकर चिंता जताई है। जैसे-जैसे वैश्विक व्यापार तेजी से डिजिटल प्लेटफॉर्म की ओर बढ़ रहा है, शुल्क लगाने में असमर्थता डिजिटल विभाजन को और बढ़ा सकती है। एमसी14 में इस मुद्दे पर स्थायी समाधान की संभावना कम है और सबसे संभावित परिणाम मोरेटोरियम का अस्थायी विस्तार ही माना जा रहा है।
विवाद निपटान प्रणाली में व्यवधान जारी
डब्ल्यूटीओ की विवाद निपटान प्रणाली, जो कभी इसकी सबसे मजबूत आधारशिला मानी जाती थी, अब गहरे संकट में है। 2019 से अपीलीय निकाय (Appellate Body) नियुक्तियां न होने के कारण निष्क्रिय बना हुआ है। इसमें अवरोध मुख्य रूप से अमेरिका की आपत्तियों के कारण है। इससे व्यापार नियमों के प्रवर्तन पर असर पड़ा है औरअंतिम तथा बाध्यकारी फैसले नहीं हो पाते। हालांकि MPIA जैसे अंतरिम उपाय मौजूद हैं, लेकिन उन्हें सभी देशों की स्वीकृति प्राप्त नहीं है।
भारत एक पूर्णतः कार्यशील दो-स्तरीय विवाद निपटान प्रणाली की बहाली का समर्थन करता है। वहीं अमेरिका न्यायिक हस्तक्षेप को सीमित करने के लिए सुधारों पर जोर दे रहा है। सहमति के अभाव में MC14 से किसी बड़े समाधान की उम्मीद नहीं है, जिससे यह प्रणाली फिलहाल कमजोर बनी हुई है।
डब्ल्यूटीओ सुधार: लचीलापन बनाए रखने पर टकराव
संस्थागत सुधार भी डब्ल्यूटीओ में असहमति का एक प्रमुख क्षेत्र बना हुआ है। विकसित देश निर्णय लेने की अधिक लचीली व्यवस्था की वकालत करते हैं, जिसमें बहुपक्षीय (plurilateral) समझौतों को शामिल किया जा सकता है, ताकि वार्ताओं में गतिरोध को दूर किया जा सके।
भारत और कई विकासशील देश सहमति-आधारित प्रणाली का मजबूती से समर्थन करते हैं। उनका तर्क है कि यह व्यवस्था निष्पक्षता और सभी सदस्यों की समान भागीदारी सुनिश्चित करती है। वे यह भी चेतावनी देते हैं कि सहमति से हटने पर छोटे देशों के हित प्रभावित हो सकते हैं और विकास संबंधी प्राथमिकताएं कमजोर पड़ सकती हैं।
सुधार संबंधी चर्चाओं में पारदर्शिता बढ़ाने, भागीदारी को मजबूत करने और डिजिटल व्यापार व सतत विकास जैसे उभरते मुद्दों को शामिल करने पर भी जोर दिया जा रहा है। हालांकि, गहरे मतभेदों के कारण इस दिशा में ठोस प्रगति की संभावना कम दिख रही है।
निष्कर्ष: ठोस फैसले नहीं, मतभेद सामने आने के आसार
कृषि, मत्स्य, डिजिटल व्यापार, विवाद निपटान और संस्थागत सुधार जैसे सभी प्रमुख मुद्दों पर एमसी14 से ठोस निर्णयों की बजाय गहरे मतभेद ही सामने आने की संभावना है। भारत के लिए प्राथमिकता नीति-निर्माण की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने, खाद्य सुरक्षा कार्यक्रमों का बचाव करने और विकासशील देशों के साथ गठजोड़ मजबूत करने पर रहेगी। व्यापक स्तर पर यह सम्मेलन एक बड़ी चुनौती को रेखांकित करता है- तेजी से बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था के अनुरूप बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली को ढालना।
वैश्विक व्यापार 35 ट्रिलियन डॉलर के पार पहुंचने के बावजूद WTO की प्रासंगिकता और विश्वसनीयता की यह एक महत्वपूर्ण परीक्षा है, जहां एमसी14 में वर्षों से लंबित विवादों के समाधान के बजाय मौजूदा व्यवस्था को आगे बढ़ाने की संभावना ही अधिक है।

Join the RuralVoice whatsapp group















