भारतीय कृषि के लिए अहम उर्वरक उत्पादन में आत्मनिर्भरता

बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए आपूर्ति में बाधाओं ने भारत की उर्वरक आयात पर निर्भरता को उजागर किया है। इस निर्भरता से कृषि और खाद्य सुरक्षा पर खतरा मंडरा रहा है। यह लेख घरेलू उर्वरक उत्पादन बढ़ाने और दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता के लिए इस क्षेत्र को PLI योजना में शामिल करने की आवश्यकता पर जोर देता है।

भारतीय कृषि के लिए अहम उर्वरक उत्पादन में आत्मनिर्भरता

पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी ने भारत की पेट्रोलियम अर्थव्यवस्था को काफी दबाव में डाल दिया है। लेकिन घरेलू उर्वरक क्षेत्र के लिए भी जोखिम कम नहीं है। उर्वरकों के उत्पादन और आयात पर पड़ने वाला असर देश के लिए एक बड़ी समस्या बनकर उभर सकता है और यह कृषि क्षेत्र को जोखिम में डाल सकता है। यह स्थिति कृषि क्षेत्र के लिए अनुकूल नहीं है। वर्ष 2024-25 में 4.2% की औसत से अधिक वृद्धि के बाद कृषि क्षेत्र के विकास की गति धीमी पड़ गई है। जीडीपी के दूसरे संशोधित अनुमानों के अनुसार, 2025-26 में कृषि वृद्धि दर केवल 2.4% रहने की उम्मीद है। इसके अलावा, हालिया आकलन बताते हैं कि पिछले दो महीनों के असामान्य मौसम पैटर्न के कारण रबी फसलों का उत्पादन पिछले वर्ष के स्तर तक नहीं पहुंच पाएगा। ऐसे समय में उर्वरकों की आपूर्ति में बाधा आना स्थिति को और गंभीर बना देता है, क्योंकि इससे किसानों के बीच अनिश्चितता और बढ़ गई है।

वैश्विक उर्वरक व्यापार का लगभग 33%, जिसमें यूरिया, अमोनिया और सल्फर शामिल हैं, होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। खाड़ी देश अपने निर्यात गंतव्यों तक पहुंचने के लिए इस मार्ग पर काफी हद तक निर्भर हैं। युद्ध के चलते यहां से उर्वरकों की आपूर्ति में देरी हो रही है, लागत में तेज बढ़ोतरी हुई है और यहां तक कि उर्वरकों कमी की समस्या भी आ रही है।

भारत लंबे समय से उर्वरकों के आयात पर निर्भर रहा है, और इस दशक के अधिकांश वर्षों में यह निर्भरता बढ़ी है। वर्ष 2023 में भारत यूरिया का तीसरा सबसे बड़ा आयातक था। इसके वैश्विक आयात में भारत की हिस्सेदारी 2024 को छोड़कर पूरे दशक में लगभग 15% के आसपास रही है। पिछले पांच वर्षों में देश की कुल खपत में आयात का हिस्सा 31% से 37% के बीच रहा है। आयात में तेजी को देखते हुए 2025-26 में इसके 50% से अधिक हो जाने की संभावना है।

अप्रैल से जनवरी 2025-26 के आंकड़े बताते हैं कि पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में आयात में 42% की वृद्धि हुई है, जबकि यूरिया आयात में 57% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यदि पोटाश उर्वरकों के आयात में 16% की कमी न आई होती, तो आयात में वृद्धि का आंकड़ा और अधिक हो सकता था। सरकार को यह निगरानी करने की आवश्यकता होगी कि पोटाश उर्वरकों के आयात में आई कमी से पोषक तत्वों के संतुलन पर कोई प्रतिकूल प्रभाव तो नहीं पड़ रहा है।

भारत पारंपरिक रूप से नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों की आपूर्ति के लिए खाड़ी क्षेत्र पर निर्भर रहा है। वर्ष 2024-25 में यूरिया आयात का 75 प्रतिशत इसी क्षेत्र से हुआ, जिसमें से अधिकांश आपूर्ति होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आई। इसमें कोई संदेह नहीं है कि कृषि जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र की जरूरतों को पूरा करने के लिए एक ही क्षेत्र पर इतनी अधिक निर्भरता अपने आप में बड़ा जोखिम है। पश्चिम एशिया के युद्ध ने इस वास्तविकता को गंभीर रूप से उजागर कर दिया है।

भारत ने यूरिया आयात के स्रोतों में विविधता लाकर इस समस्या को आंशिक रूप से कम करने का प्रयास किया है, जिसके परिणामस्वरूप अप्रैल से जनवरी 2025-26 के दौरान खाड़ी देशों की हिस्सेदारी घटकर 44 प्रतिशत रह गई। यह चीन और रूस से आयात बढ़ने के कारण संभव हुआ है। भारत के कुल यूरिया आयात का 35 प्रतिशत हिस्सा इन दोनों देशों से आया।

हालांकि, इससे यह सवाल उठता है कि क्या आयात स्रोतों में विविधता वास्तव में जोखिम कम करने की प्रभावी रणनीति हो सकती है। संसद में सरकार के हालिया बयानों से संकेत मिलता है कि उर्वरकों के आयात पर बढ़ती निर्भरता से उत्पन्न जोखिमों को कम करने के लिए यही उसकी प्राथमिक रणनीति है।

भू-आर्थिक जोखिम भारत के उर्वरक आयात की कमजोरियों का एकमात्र कारण नहीं हैं। उर्वरकों की कीमतों में तेज बढ़ोतरी पहले ही एक बड़े खतरे के रूप में उभर चुकी है। ईरान पर अमेरिका के हमले की शुरुआत के बाद से यूरिया की कीमतें लगभग 700 डॉलर प्रति मीट्रिक टन तक पहुंच गई हैं, जो युद्ध से पहले 400 से 490 डॉलर के बीच थीं। इससे चालू खाते का संतुलन बिगड़ने का खतरा बढ़ गया है।

चूंकि पश्चिम एशिया में संघर्ष समाप्त होने के बाद भी कीमतों के ऊंचे स्तर पर बने रहने की आशंका है, इसलिए इस वजह से भारत के बाह्य भुगतान संतुलन पर मध्यम अवधि में असर पड़ सकता है। इसका मतलब यह है कि जब तक भारत उर्वरक आयात पर अत्यधिक निर्भर बना रहेगा, तब तक केवल आयात स्रोतों में विविधीकरण करने से उसके जोखिम कम नहीं होंगे।

इन परिस्थितियों में यह काफी आश्चर्यजनक है कि सरकार ने आयात पर निर्भरता कम करने के लिए उर्वरकों के घरेलू उत्पादन को मजबूत करने पर विचार नहीं किया है। कोविड संकट और उससे उत्पन्न आपूर्ति शृंखला में व्यवधानों के बाद, आत्मनिर्भर भारत को बढ़ावा देने के लिए 14 प्रमुख क्षेत्रों के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) योजना लागू की गई। इस योजना का उद्देश्य फार्मास्यूटिकल इंटरमीडिएट्स और प्रमुख कच्चे माल, मोबाइल फोन तथा विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक घटकों जैसे कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता हासिल करना और आयात पर निर्भरता कम करना है। साथ ही, इस योजना का लक्ष्य तकनीकी हस्तक्षेप के माध्यम से लक्षित क्षेत्रों को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना भी है।

इस योजना में लगभग सभी प्रमुख उद्योगों को शामिल किया गया है, लेकिन उर्वरक उद्योग इसका एकमात्र उल्लेखनीय अपवाद है। उर्वरक उद्योग की उत्पादन क्षमता को तत्काल बढ़ाने की आवश्यकता है, ताकि पौधों के लिए जरूरी पोषक तत्वों की आपूर्ति घरेलू उत्पादन इकाइयों से अधिक मात्रा में सुनिश्चित की जा सके।

भारत के उर्वरक उद्योग का विकास 1960 के दशक में हुए इसके विस्तार के समय से ही असंतुलित रहा है। घरेलू स्तर पर नाइट्रोजन युक्त उर्वरकों के उत्पादन को हमेशा अन्य दो प्रमुख पोषक तत्वों, फॉस्फोरस और पोटाश, की तुलना में प्राथमिकता दी गई। 1970 के दशक में बॉम्बे हाई गैस की खोज ने इस फीडस्टॉक का उपयोग करते हुए देश में यूरिया उत्पादन को उल्लेखनीय बढ़ावा दिया। हालांकि, गैस आधारित संयंत्र धीरे-धीरे आयातित प्राकृतिक गैस पर अधिक निर्भर होते गए, फिर भी यूरिया उत्पादन में वृद्धि हुई। लेकिन यह बढ़ती घरेलू मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं थी।

दूसरी ओर, फॉस्फेटिक और पोटाश उर्वरकों का उत्पादन उपेक्षित रहा, जिससे पोषक तत्वों का गंभीर असंतुलन पैदा हुआ। इसके परिणामस्वरूप फसलों की पैदावार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा और यूरिया के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता भी खराब हुई। इस पोषण असंतुलन को देश में सभी प्रमुख पोषक तत्वों का घरेलू उत्पादन बढ़ाकर दूर किया जा सकता है।

भारत के उर्वरक उद्योग को प्रोडक्शन-लिंक्ड इन्सेंटिव (पीएलआई) योजना में शामिल करके इस लक्ष्य को हासिल करना संभव है। इससे इसका व्यवस्थित विकास सुनिश्चित हो सकेगा, जैसा कि वर्तमान में इस योजना के तहत शामिल 14 क्षेत्रों में किया जा रहा है। अनिश्चितताओं से भरे इस दौर में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए यही सबसे ठोस गारंटी साबित हो सकती है। 

(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर हैं)

Subscribe here to get interesting stuff and updates!