गन्ना किसान फेडरेशन ने ड्राफ्ट शुगरकेन कंट्रोल ऑर्डर में 10.25% रिकवरी मानक का विरोध किया, इसे 9.5% रखने की मांग
अखिल भारतीय गन्ना किसान फेडरेशन (AISFF) ने केंद्र सरकार से ड्राफ्ट शुगरकेन कंट्रोल ऑर्डर 2026 को किसान हितैषी बनाने की मांग की है। संगठन ने एफआरपी के लिए 9.5% रिकवरी दर, एथेनॉल व सह-उत्पादों के लाभ में हिस्सेदारी, सहकारी मिलों के आधुनिकीकरण और भुगतान की जवाबदेही को सख्ती से लागू करने की मांग उठाई।
अखिल भारतीय गन्ना किसान फेडरेशन (AISFF) ने प्रस्तावित ड्राफ्ट शुगरकेन कंट्रोल ऑर्डर 2026 में बड़े बदलावों की मांग करते हुए केंद्र सरकार से इसे गन्ना किसानों और कृषि मजदूरों के हित में बनाने की अपील की है। अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS) से संबद्ध इस संगठन ने केंद्रीय खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री प्रह्लाद जोशी को भेजे ज्ञापन में 10.25 प्रतिशत चीनी रिकवरी दर के आधार पर उचित एवं पारिश्रमिक मूल्य (FRP) तय करने के प्रस्ताव का विरोध किया। AISFF ने इसे मनमाना और किसान विरोधी बताते हुए मांग की कि FRP को 9.5 प्रतिशत रिकवरी दर के आधार पर तय किया जाए, क्योंकि कई गन्ना उत्पादक राज्यों में औसत रिकवरी इससे कम रहती है।
संगठन ने कहा कि गन्ने का मूल्य स्वामीनाथन फॉर्मूला (C2+50%) के आधार पर तय किया जाना चाहिए, जिसके तहत किसानों को उनकी कुल लागत पर कम से कम 50 प्रतिशत लाभ मिलना चाहिए। AISFF का कहना है कि ड्राफ्ट ऑर्डर में एथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है, लेकिन करोड़ों गन्ना किसानों और कृषि मजदूरों की वास्तविक समस्याओं को नजरअंदाज किया गया है। संगठन के अनुसार, एथेनॉल ब्लेंडिंग नीति के कारण चीनी मिलों की एथेनॉल, बिजली उत्पादन और उर्वरक जैसे सह-उत्पादों से आय काफी बढ़ी है।
फेडरेशन ने मांग की कि इन सह-उत्पादों की बिक्री से होने वाले अतिरिक्त लाभ का 50 प्रतिशत हिस्सा गन्ना किसानों और मजदूरों को दिया जाए। संगठन ने कहा कि गन्ना उत्पादन करने वाले किसानों को एथेनॉल अर्थव्यवस्था के बढ़ते लाभ से पूरी तरह बाहर रखा गया है।
ज्ञापन में कहा गया कि 2025-26 सीजन में देश में 57.35 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में गन्ने की खेती का अनुमान है। इसके साथ ही लगभग 67.7 लाख कृषि मजदूर गन्ने की खेती, कटाई और परिवहन कार्यों में लगे हुए हैं। AISFF ने कहा कि 55.7 लाख पंजीकृत गन्ना किसानों में अधिकांश गरीब और छोटे किसान हैं। इनमें से 56 प्रतिशत किसानों के पास एक हेक्टेयर से कम भूमि है और वे चीनी मिलों द्वारा भुगतान में देरी से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।
संगठन ने बकाया गन्ना भुगतान पर चिंता जताते हुए कहा कि 14 दिन में भुगतान का नियम केवल कागजों तक सीमित है। डिजिटल व्यवस्था और तकनीकी प्रगति के बावजूद हजारों करोड़ रुपये का बकाया बना हुआ है। इसने देरी से भुगतान पर ब्याज देने और जवाबदेही तय करने की मांग की।
फेडरेशन ने दो चीनी मिलों के बीच न्यूनतम दूरी 15 किलोमीटर से बढ़ाकर 25 किलोमीटर करने के प्रस्ताव का भी विरोध किया। संगठन का कहना है कि इससे चीनी मिलों का एकाधिकार बढ़ेगा और किसानों की सौदेबाजी क्षमता कमजोर होगी।
सहकारी क्षेत्र को लेकर AISFF ने सहकारी और सार्वजनिक क्षेत्र की चीनी मिलों के आधुनिकीकरण और उन्नयन की आवश्यकता पर जोर दिया। संगठन ने सहकारी चीनी मिलों के बोर्ड में नियमित चुनाव कराने और किसान सहकारी समितियों को वित्तीय व प्रशासनिक स्वायत्तता देने की मांग की।

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