Iran War: गैस की कमी से सिर्फ 60% क्षमता पर चल रहे अधिकांश यूरिया प्लांट, कीमत भी 600 डॉलर प्रति टन हुई

ईरान युद्ध (Iran war) का असर उर्वरकों की कीमतों के साथ इनके उत्पादन पर भी दिखने लगा है। खाड़ी देशों से गैस की आपूर्ति बाधित होने के कारण देश के अधिकतर यूरिया प्लांट क्षमता का 60 फीसदी ही उत्पादन कर रहे हैं। ग्लोबल मार्केट में यूरिया की कीमत (urea price) भी 600 डॉलर तक पहुंच गई है। युद्ध लंबा चला तो उर्वरकों की उपलब्धता का संकट खड़ा हो सकता है

Iran War: गैस की कमी से सिर्फ 60% क्षमता पर चल रहे अधिकांश यूरिया प्लांट, कीमत भी 600 डॉलर प्रति टन हुई

ईरान के साथ अमेरिका और इजरायल के युद्ध (Iran-US war) ने भारत में यूरिया उत्पादन (urea production) को धीमा कर दिया है। गैस की आपूर्ति घटने के चलते देश के अधिकांश यूरिया संयंत्र क्षमता का 60 फीसदी ही उत्पादन कर पा रहे हैं। केवल दक्षिण के प्लांट पूरी क्षमता से उत्पादन कर रहे हैं। इस स्थिति के चलते आने वाले समय में यूरिया की उपलब्धता प्रभावित होने की आशंका तो है ही, इसकी उत्पादन लागत भी बढ़ रही है। पिछले एक महीने में अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमत 25 प्रतिशत से अधिक बढ़कर 600 डॉलर प्रति टन पर पहुंच गई है। हालांकि अभी देश में यूरिया समेत अधिकांश उर्वरकों का स्टॉक पिछले साल से बेहतर है।

उद्योग सूत्रों के मुताबिक जिस स्तर पर गैस की आपूर्ति हो रही है, अधिकांश संयंत्र उसी अनुपात में उत्पादन कर पा रहे हैं। इसके साथ ही कुछ संयंत्र अप्रैल में होने वाले सालाना शटडाउन को कुछ पहले करने की तैयारी कर रहे हैं ताकि गैस की कमी से पैदा हो रही स्थिति से निपटने में आसानी हो सके। लेकिन शटडाउन शेड्यूल को एक सप्ताह या अधिकतम दस दिन पहले ही लाया जा सकता है। अभी दो या तीन संयंत्र ही शटडाउन में हैं जो मार्च के तय शटडाउन शेड्यूल के मुताबिक ही बंद हैं।

ईरान के हमलों को देखते हुए कतर, यूएई, कुवैत, बहरीन और सऊदी अरब ने तेल और गैस संयंत्रों में उत्पादित होने वाली गैस का आयात बंद हो गया है। इन देशों ने अपने कई संयंत्रों को बंद भी कर दिया है। साथ ही, होर्मुज स्ट्रेट में आवाजाही बंद होने के चलते इन देशों से तेल और गैस की आपूर्ति भी बंद हो गयी है। इस कारण वैश्विक बाजार में गैस की कीमतें 20 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू को पार कर गई हैं, जबकि गेल के जरिये भारतीय उर्वरक संयंत्रों के लिए गैस की पूल्ड कीमत 13.63 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू है। यह कीमत प्लांट पर डिलीवरी की कीमत है। भारत अपनी गैस की जरूरत का लगभग 50 प्रतिशत आयात से पूरा करता है।

यूरिया की कीमतों में भी तेज बढ़ोतरी
वैश्विक बाजार में यूरिया की कीमतों (urea price) में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। उद्योग सूत्रों के मुताबिक दाम 600 डॉलर प्रति टन पर पहुंच गये हैं। फरवरी की शुरुआत में इसकी कीमत 475 डॉलर प्रति टन के आसपास थी। इस तरह एक महीने में ही दाम 25 प्रतिशत से अधिक बढ़ गए हैं। 

भारत सालाना करीब 100 लाख टन यूरिया का आयात करता है। उक्त सूत्र का कहना है कि अगर युद्ध मार्च के अंत तक खिंचता है तो उर्वरक उद्योग और देश के किसानों के सामने बड़ा संकट खड़ा हो सकता है। वैसे भी सऊदी अरब, यूएई, कुवैत व बहरीन समेत अन्य खाड़ी देशों में बंद गैस संयंत्रों को दोबारा उत्पादन की स्थिति में लाने में कम से एक माह का समय लगेगा। भारत में अधिकांश गैस की आपूर्ति खाड़ी देशों से ही होती है, इसलिए स्थिति काफी गंभीर हो सकती है।

हालांकि भारत के लिए ओमान से यूरिया आयात करने का विकल्प है। वहां भारतीय सहकारी संस्थाओँ इफको और कृभको का ओमान के साथ यूरिया उत्पादन का एक संयुक्त उद्यम है। इसके अलावा वहां एक और यूरिया संयंत्र है। हालांकि केवल वहां से आयात की जरूरत पूरी नहीं होगी।

दूसरे सबसे अधिक आयात होने वाले उर्वरक डाई अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) के तैयार उर्वरक और कच्चे माल में आयात पर भारत की निर्भरता लगभग शतप्रतिशत है। इसकी देश में सालाना करीब 100 लाख टन की खपत होती है। फिलहाल रूस को छोड़कर कहीं से भी डीएपी आयात की संभावना नहीं बन रही है। डीएपी की कीमत युद्ध के पहले ही करीब 65 डॉलर प्रति टन बढ़कर 740 डॉलर प्रति टन पर चली गई थी।

असल में इस युद्ध के लंबा खिंचने से भारत के सामने एलएनजी, अमोनिया, सल्फर और फॉस्फेटिक उर्वरकों की आपूर्ति का संकट पैदा होने की आशंका है। अमोनिया की जरूरत यूरिया उत्पादन में होती है। देश में सालाना करीब 400 लाख टन यूरिया की खपत होती है। अगर अधिक अवधि तक संयंत्र उत्पादन क्षमता से कम स्तर पर चलेंगे तो आयात पर निर्भरता और बढ़ जाएगी।

फिलहाल स्टॉक पिछले साल से अधिक
हालांकि अभी देश में उर्वरकों का स्टॉक पिछले साल से बेहतर है, लेकिन संकट लंबा खिंचा तो उपलब्धता की समस्या पैदा हो सकती है। उद्योग सूत्रों के मुताबिक फरवरी, 2026 के अंत में देश में यूरिया का स्टॉक 55 लाख टन रहा है। जबकि पिछले साल इसी समय इसका स्टॉक 49 लाख टन था। वहीं डीएपी केऔ मामले में स्थिति र बेहतर है। चालू साल में फरवरी के अंत में डीएपी का स्टॉक 25 लाख टन रहा जो इसके पहले साल इसी समय 13 लाख टन रहा था। म्यूरेट ऑफ पोटाश (एमओपी) का स्टॉक फरवरी, 2026 में पिछले साल से कम रहा है। यह 12.92 लाख टन रहा जो पिछले साल इसी समय 15 लाख टन था। 

कॉम्प्लेक्स उर्वरकों में एनपीके के मामले में स्थिति बेहतर है। फरवरी, 2026 के अंत में एनपीके का स्टॉक 54 लाख टन रहा जो पिछले साल इसी समय 32 लाख टन पर था। फरवरी के अंत में सिंगल सुपर फॉस्फेट (एसएसपी) का स्टॉक 32 लाख टन रहा जो पिछले साल इसी समय 22 लाख टन था।

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