यूरिया का दाम 800 डॉलर प्रति टन पहुंचा, युद्धविराम के बावजूद आयात सामान्य होने में लगेंगे दो माह

ईरान-इजरायल-अमेरिका तनाव के चलते वैश्विक उर्वरक आपूर्ति प्रभावित हुई है, जिससे यूरिया की कीमत 800 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई है। होर्मुज स्ट्रेट खुलने के बावजूद आयात सामान्य होने में करीब दो महीने लग सकते हैं। भारत में फिलहाल स्टॉक पर्याप्त है, लेकिन महंगे आयात के चलते सरकार को उर्वरक सब्सिडी बढ़ानी पड़ेगी

यूरिया का दाम 800 डॉलर प्रति टन पहुंचा, युद्धविराम के बावजूद आयात सामान्य होने में लगेंगे दो माह

ईरान के साथ अमेरिका और इजरायल के पांच सप्ताह से अधिक चले युद्ध ने दुनिया भर में उर्वरकों की किल्लत और कीमतों में बढ़ोतरी का काम किया है। हालांकि 7 अप्रैल से दो सप्ताह के लिए युद्ध विराम घोषित होने और होर्मुज स्ट्रेट को जहाजों के लिए खोलने से स्थिति सुधरने की उम्मीद बन गई है। लेकिन युद्ध ने वैश्विक बाजार में यूरिया की कीमतों को 800 डॉलर प्रति टन तक पहुंचा दिया है और यह कीमत फ्री ऑन बोर्ड (एफओबी) है, यानी इसमें शिपिंग और इंश्योरेंस का खर्च शामिल नहीं है, जो पहले के मुकाबले दोगुना से अधिक हो चुका है। वहीं दूसरे सबसे अधिक खपत वाले उर्वरक डाई अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) की नई आपूर्ति का संकट है। इसलिए उसकी कीमत किस स्तर पर रहेगी, यह अगले कुछ दिनों में साफ होगा। भारत के मामले में लागत बढ़ने का मतलब है कि किसान के लिए मौजूदा कीमतें बरकरार रखने के लिए सब्सिडी में भारी बढ़ोतरी करनी होगी। बुधवार को कैबिनेट ने न्यूट्रिएंट आधारित सब्सिडी (एनबीएस) योजना के लिए खऱीफ फसलों की सब्सिडी में बढ़ोतरी कर उसे 41,534 करोड़ रुपये किया है लेकिन परिस्थिति को देखते हुए इसे और बढ़ाना पड़ सकता है क्योंकि पहले ही 800 डॉलर प्रति टन पर पहुंच चुके डीएपी की कीमत इससे कहीं अधिक रहने का अनुमान है।

उद्योग सूत्रों का कहना है कि भारत के लिए उर्वरक लाने वाले जो शिप फंसे हुए थे, होर्मुज स्ट्रेट खुलने पर उनके आने से उपलब्धता बेहतर होगी। लेकिन नये सौदों के तहत उर्वरक आयात की स्थिति सामान्य होने में कम से कम दो माह और लग सकते हैं। ताजा समय में देश में बेहतर स्टॉक चलते आगामी खरीफ सीजन में शुरू में उपलब्धता सामान्य रह सकती है लेकिन अतिरिक्त आयात में देरी होने से आपूर्ति के मोर्चे पर चुनौती खड़ी हो सकती है। होर्मुज स्ट्रेट में दुनिया भर के करीब दो हजार शिप फंसे हुए हैं। देश की बड़ी उर्वरक आयातक कंपनी इंडियन पोटाश लिमिटेड (आईपीएल) के तीन शिप में फंसे हैं जिनमें डेढ़ लाख टन यूरिया है। आईपीएल के अलावा दूसरी कंपनियों का भी उर्वरक फंसा हुआ है। यह आयात सउदी अरब और कतर से हो रहा है।

फिलहाल उर्वरकों की उपलब्धता बेहतर 

हालांकि अभी देश में उर्वरकों की उपलब्धता बेहतर है। उद्योग सूत्रों से रूरल वॉयस को मिली जानकारी के मुताबिक 31 मार्च, 2026 को यूरिया का स्टॉक 62 लाख टन था। वहीं डीएपी का स्टॉक 23 लाख टन और कांप्लेक्स उर्वरकों (एनपीके) का स्टॉक 57 लाख टन था। म्यूरेट ऑफ पोटाश (एमओपी) का स्टॉक 13 लाख टन और सिंगल सुपर फॉस्फेट (एसएसपी) का स्टॉक 25 लाख टन था। अप्रैल की शुरूआत लगभग सभी उर्वरकों के मामले में बेहतर स्टॉक से हो रही है। महीने के आरंभ में कुल करीब 180 लाख टन उर्वरक मौजूद था।

खरीफ में करीब 390 लाख टन उर्वरकों की खपत होती है। जिसमें सबसे अधिक खपत यूरिया की है। उर्वरक उद्योग के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने रूरल वॉयस को बताया कि रबी और खरीफ के बीच उर्वरकों के उपयोग का समय अधिक होने का हमें फायदा मिला है। यूरिया की अधिक खपत जून से शुरू होगी। ऐसे  में अगर आयात की स्थिति सुधरती है तो किसानों को उपलब्धता का संकट नहीं होगा। 

हालांकि उद्योग के मुताबिक युद्ध के चलते गैस आयात बाधित होने से घरेलू यूरिया उत्पादन में भी गिरावट आई है। कुछ संयंत्र 70 फीसदी क्षमता और कुछ शतप्रतिशत पर चल रहे हैं। साथ ही गैस की कीमतें भी 50 फीसदी से अधिक बढ़ चुकी हैं। आयात के विकल्प भी कम हुए हैं क्योंकि खाड़ी के देशों में ईरान के हमलों के चलते गैस आयात की स्थिति सुधरने में समय लगेगा। 

खाड़ी देशों में ओमान से यूरिया आयात संभव है और वहां सबसे अधिक 20 लाख टन सालाना की क्षमता ओमइफको संयंत्र की है, जिसमें भारतीय सहकारी कंपनियां इफको और कृभको वहां की सरकार के साथ साझीदार हैं। लेकिन यह उर्वरक अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमतों पर ही मिलेगा। दूसरा बड़ा स्रोत रूस अभी निर्यात नहीं कर रहा है और इसमें देरी होगी। वहां से आयात में करीब 50 दिन का समय लगता है। 

वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे देशों में अतिरिक्त उत्पादन को देखते हुए भारत वहां से आयात की कोशिश में हैं। एक बड़ी उर्वरक कंपनी के वरिष्ठ पदाधिकारी ने रूरल वॉयस को बताया कि सरकार ने कंपनियों से कहा है कि अभी जिस कीमत पर भी उर्वरक मिले, हमें आयात करना है। ऐसे में गैस और उर्वरकों के लिए हाई सी पर उपलब्ध सौदों की संभावना को भी देखा जा रहा है।

बढ़ानी पड़ सकती है सब्सिडी की रकम

कीमतों के मामले में सरकार के लिए चुनौती है कि अगर वह किसानों के लिए डीएपी और यूरिया का बिक्री मूल्य स्थिर रखती है तो यूरिया और कांप्लेक्स, दोनों उर्वरकों के लिए सब्सिडी में बजटीय प्रावधान के मुकाबले भारी बढ़ोतरी करनी होगी। 

डीएपी का अभी करीब 23 लाख टन का स्टॉक है लेकिन सालाना खपत करीब 100 लाख टन की है। उसमें से खरीफ की खपत को अगर 50 लाख टन मान लें तो खरीफ की जरूरत को पूरा करना काफी चुनौतीपूर्ण काम होगा। उद्योग सूत्रों के मुताबिक . दुनिया के एक बड़े उर्वरक निर्यातक चीन ने यूरिया और डीएपी का निर्यात बंद कर रखा है। भारत ने जनवरी में जो टेंडर जारी किये थे उनके लिए बोली ही नहीं आई। इसी सप्ताह फिर से आईपीएल ने 25 लाख टन यूरिया आयात के लिए टेंडर जारी किया है। 

युद्ध से पहले कंपनियों ने 450 डॉलर प्रति टन के आसपास की कीमत पर यूरिया का आयात किया था, लेकिन अब कीमत 750 से 800 डॉलर प्रति टन है और वह भी एफओबी। यानी आयात लागत 900 डॉलर प्रति टन तक जा सकती है। दूसरी ओर डीएपी को लेकर अभी वैश्विक स्तर पर उपलब्धता सीमित दिख रही है और उसकी कीमत यूरिया से अधिक ही होगी। असल में भारत के अलावा दुनिया के दूसरे देश भी उर्वरकों के आयातक हैं। हालांकि अधिकांश देशों में उर्वरकों पर भारत की तरह भारी सब्सिडी नहीं मिलती है। वहीं एफएओ ने भी उर्वरक संकट की बात कही है। ऐसे में वैश्विक स्तर पर इस संकट का खाद्य उत्पादन और कीमतों पर असर पड़ना तय है।

Subscribe here to get interesting stuff and updates!