आलू की सरकारी खरीद का ऐलान होते ही गिरे दाम, 6.5 रुपये किलो में किसानों की लागत निकलनी भी मुश्किल
आलू की गिरती कीमतों के बीच केंद्र सरकार ने 6.5 रुपये प्रति किलो की दर से खरीद को मंजूरी दी है, लेकिन इस फैसले से किसानों को राहत के बजाय नुकसान की आशंका बढ़ गई है। मंडियों में कीमतें गिरने लगी हैं, जबकि सरकारी खरीद से लागत निकलनी भी मुश्किल है।
इस साल उत्तर प्रदेश के आलू उत्पादक किसान उपज की गिरती कीमतों से परेशान हैं। फरवरी में आलू की खुदाई शुरू होने के समय से ही किसान राहत की मांग कर रहे हैं। अब केंद्र सरकार ने बाजार हस्तक्षेप योजना (MIS) के तहत उत्तर प्रदेश सरकार के आलू खरीद प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इसके तहत राज्य में 20 लाख टन आलू की खरीद 6,500 रुपये प्रति टन यानी 6.5 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव पर की जाएगी।
हालांकि, केंद्र सरकार द्वारा 6,500 रुपये प्रति टन की दर से आलू खरीद की घोषणा किसानों के लिए फायदे के बजाय नुकसान का कारण बनती दिख रही है। सरकारी खरीद में 650 रुपये प्रति क्विंटल का रेट घोषित होते ही उत्तर प्रदेश की मंडियों में आलू के भाव 50-100 रुपये प्रति क्विंटल तक गिरकर 600-700 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास आ गए हैं।
आलू की खेती और भंडारण से जुड़े उत्तर प्रदेश के आगरा जिले के डूंगर सिंह खंडौली ने रूरल वॉयस को बताया कि इस साल देश में आलू के बंपर उत्पादन के चलते कई वर्षों बाद कीमतों में इतनी गिरावट आई है। फरवरी में खुदाई के समय मंडियों में आलू के खरीदार ही नहीं थे और भाव गिरकर 200-500 रुपये प्रति क्विंटल तक गिर गए थे। उनका कहना है कि यदि सरकार उस समय सरकारी खरीद का ऐलान करती तो स्थिति बेहतर हो सकती थी।
डूंगर सिंह के अनुसार, मंडियों में पहले ही आलू के भाव 600-800 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास चल रहे थे। ऐसे में सरकार द्वारा 650 रुपये प्रति क्विंटल के भाव पर खरीद की घोषणा से दाम और नीचे आ गए। उनका कहना है कि सरकारी घोषणा ने किसानों को फायदे की बजाय नुकसान पहुंचा दिया। उनका कहना है कि पिछले चार साल में इस साल आलू किसान की हालत सबसे अधिक खराब है और वह बड़े नुकसान में है।
अब तक अधिकांश आलू कोल्ड स्टोरेज में पहुंच चुका है। इसके लिए किसानों को लगभग 250 रुपये प्रति क्विंटल स्टोरेज, 65-70 रुपये प्रति क्विंटल बारदाना और 25-30 रुपये प्रति क्विंटल ढुलाई खर्च देना पड़ता है। ऐसे में 650 रुपये प्रति क्विंटल के रेट पर सरकारी खरीद में किसानों के लिए लागत निकालना भी मुश्किल है, जो कम से कम 1000-1200 रुपये प्रति क्विंटल बैठती है। अधिकांश आलू कोल्ड स्टोरेज में पहुंचने के बाद अब सरकारी खरीद कैसे होगी, इस पर भी सवाल उठ रहे हैं।
जमीनी स्तर पर आलू खरीद की कोई खास तैयारियां दिखाई नहीं देती हैं। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि कहीं आलू खरीद महज घोषणा तक सीमित न रह जाए।
किसान संगठनों ने उठाए सवाल
केंद्र सरकार द्वारा घोषित आलू खरीद दर का किसान संगठनों ने तीखा विरोध किया है। उनकी मांग है कि आलू की खरीद दर कम से कम 10-12 रुपये प्रति किलोग्राम होनी चाहिए। भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत का कहना है कि सरकार आलू किसानों की मदद का दावा कर रही है, जबकि हकीकत यह है कि 6.5 रुपये प्रति किलो के भाव पर किसानों की लागत भी नहीं निकलेगी। बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी और अन्य बढ़ती लागत को देखते हुए इस रेट पर खरीद नाकाफी है। टिकैत ने आलू खरीद के मुद्दे पर मार्च के पहले सप्ताह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र भी लिखा था।
क्यों गिरे आलू के दाम
इस साल उत्तर प्रदेश के अलावा पश्चिम बंगाल, गुजरात और कर्नाटक में अधिक उत्पादन के कारण आलू की कीमतों में गिरावट देखी जा रही है। उत्तर प्रदेश के बाद आलू उत्पादन में पश्चिम बंगाल दूसरे स्थान पर है। वहां भी किसानों को 500 रुपये प्रति क्विंटल के ही दाम मिल पा रहे हैं। पिछले साल इन दिलों किसानों को आलू का भाव 1000-1500 रुपये प्रति क्विंटल के बीच मिला था, जबकि इस साल सीजन की शुरुआत में ही कीमतें 200-500 रुपये प्रति क्विंटल तक गिर गईं। फिलहाल देश में एक करोड़ टन से अधिक आलू कोल्ड स्टोरेज में रखा हुआ है, जबकि बाजार में भी पर्याप्त आपूर्ति होने से कीमतों पर दबाव बना हुआ है।
आलू की कुफरी ख्याति, कुफरी मोहन और कुफरी गौरव जैसी अधिक उत्पादन देने वाली लेकिन कम शेल्फ लाइफ वाली किस्मों के दाम 500-700 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास हैं, जबकि कुफरी बहार, चिप्सोना और लालिमा जैसी किस्मों के दाम 700-800 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास चल रहे हैं। यूपी से इन दिनों आलू की आपूर्ति दक्षिण भारत के राज्यों में होती थी, लेकिन कर्नाटक में आलू उत्पादन बढ़ने से इसमें गिरावट आई है। फिलहाल यूपी का आलू मुख्यतः महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जा रहा है।

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