आईआईटी मद्रास ने की कृषि अपशिष्ट को एंजाइम में बदलने वाले बैक्टीरिया की पहचान, उद्योगों को मिलेगा फायदा

कृषि अपशिष्ट का सदुपयोग हो सके इसके लिए पिछले कई वर्षों से काम किया जा रहा है। इसी दिशा में एक नया कदम बढ़ाते हुए आईआईटी मद्रास ने एक बैक्टीरिया की पहचान की है। इस बैक्टीरिया को बैसिलस एसपी पीएम06 कहा जाता है। जो कृषि अपशिष्ट को ऐसे एंजाइम मे परिवर्तित कर सकता है। जिनका उद्योग जगत के महत्वपूर्ण कार्यों में उपयोग हो सकता है

आईआईटी मद्रास ने की  कृषि अपशिष्ट को एंजाइम में बदलने वाले बैक्टीरिया की पहचान, उद्योगों को मिलेगा फायदा
आईआईटी मद्रास की टीम, जिसने नई तकनीक पर काम किया

कृषि अपशिष्ट की समस्या भारत जैसे कृषि प्रधान देश में एक आम बात है । कृषि अपशिष्ट का सदुपयोग हो सके इसके लिए पिछले कई वर्षों से काम किया जा रहा है। इसी दिशा में एक नया कदम बढ़ाते हुए आईआईटी मद्रास ने एक ऐसे बैक्टीरिया की पहचान की है। इस बैक्टीरिया को बैसिलस एसपी पीएम06 कहा जाता है। जो कृषि अपशिष्ट को ऐसे एंजाइम मे परिवर्तित कर सकता है। जिनका उद्योग जगत के महत्वपूर्ण कार्यों में उपयोग हो सकता है। इसके लिए जो प्रोसेस प्रक्रिया पूरी तरह से पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ  कम खर्च वाली है।

आईआईटी के  शोधकर्तोओं ने बताया कि उन्होंने अपने प्रयोगों के दौरान दिखाया कि  कैसे यह बैक्टीरिया कृषि अपशिष्ट से  एंजाइम और बायो इथनॉल जैसे उपयोगी उत्पाद बना सकता है। आज के वक्त में बायो इथनॉल की उद्योगों मे ज्यादा मांग है। इंडस्ट्रियल एंजाइम जैसे आल्फा एमाइलेस और सेल्युलोस की  कपडा, पेपर, डिटर्जेंट और दवाई उद्योगों में काफी मांग है।

यह रिसर्च आईआईटी मद्रास  के जैव प्रौद्योगिकी विभाग के प्रोफेसर सत्यनारायण एन. गुम्माडी और उनकी टीम में रिसर्च स्कॉलर रेखा. राजेश ने मिलकर की है। रिसर्च के निष्कर्ष पीयर-रिव्यू जर्नल बायोमास कन्वर्जन एंड बायोरिफाइनरी मे प्रकाशित किए गए है।

एक अनुमान के अनुसार ,हर साल लगभग 10 से 15 करोड टन तक बायोमास का उत्पादन होता है  और पिछले कुछ वर्षों मे तो दुनिया भर में बैक्टीरिया से उद्योगों के लिए उपयोगी एंजाइम और सेकंड जेनरेशन इथनॉल जो ईंधन का एक अच्छा विकल्प है इसका  उत्पादन  काफी बढ़ा है ।

तीन मुख्य कृषि अपशिष्ट जिनसे एंजाइम का उत्पादन किया जा सकता  है  वह हैं, गेहूं का चोकर, साबूदाना का कचरा और चावल की भूसी है। ये अवशेष सस्ते होते हैं और इनमें इंडस्ट्रियल एंजाइम पैदा करने की  क्षमता भी होती है। हालांकि चुनौती यह है कि इन अवशेषों की जटिल संरचना के कारण एंजाइमों को हाइड्रोलाइज करना मुश्किल हो जाता है। वहीं इसकी आवश्यक प्री ट्रीटमेंट प्रक्रिया भी महंगी है। इन समस्याओं को देखते हुए शोधकर्ताओं ने नए विकल्पों की तलाश करनी शुरू कर दी की और बैसिलस एसपी पीएम06 बैक्टिरिया पर गहन अध्ययन किया जिससे गन्ना के अपशिष्ट प्रेसमड को मिट्टी से अलग किया जाय। इन जीवाणुओं ने कृषि अपशिष्ट से इंडस्ट्रियल एंजाइम और मूल्य वर्धित उत्पादों के उत्पादन में मदद की। इसके लिए गेहूँ का चोकर सबसे प्रभावी पाया गया इसके बाद साबूदाना का अपशिष्ट और चावल की भूसी का स्थान आता है । 

प्रो. सत्यनारायण एन. गुम्माडी, बॉयोटेक्नोलॉजी विभाग , आईआईटी मद्रास

प्रोफेसर गुम्माडी के अनुसार, "जिस जीव को हमने अलग किया है, उसमें प्रीट्रीमेंट के बिना बहुत कम लागत वाले लिग्नोसेल्यूलोसिक कचरे को हाइड्रोलाइज करने की फार्मेंटेशन क्षमता होती है, जिससे एंजाइम और मेटाबोलाइट्स के उत्पादन के लिए बायो प्रोसेस की लागत कम  हो जाती है।  मौजूदा प्रौद्योगिकियों की तुलना में ब़ॉयो ट्रासफार्मेशन का सबसे चुनौतीपूर्ण पहलू है। इसके वन स्टेप प्रोसेस का विकास  जिसमें प्रीट्रीमेंट, एंजाइम हाइड्रोलिसिस और माइक्रोबियल फार्माटेशन तीनों शामिल है, जिससे इस प्रक्रिया के कारण  पर्यावरण पर पडने वाला प्रभाव भी कम हो जाता है।"

उन्होंने बताया कि मुद्दों को हल करने के लिए कई एंजाइमों का उत्पादन करने वाले सिंगल माइक्रोआर्गेनिज्म को अलग करने पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। लेकिन,आईआईटी मद्रास के शोधकर्ता गन्ने के प्रेसमड से एक नॉवेल स्ट्रेन को अलग करने में सफल रहे हैं 

आईआईटी मद्रास की टीम का कहना है कि शोध के दिलचस्प पहलुओं में से एक पहलु यह भी है कि एक सिंगल नावेल क्रिएटर द्वारा विभिन्न कृषि अवशेषों के एक साथ प्यूरीफिकेशन और फार्मेंटेशन संभव है। दूसरे यह पर्यावरण अनुकूल होने के साथ ही बॉयोफ्यूल उत्पादन के लिए यह एक टिकाऊ प्रक्रिया है। इसका एक महत्व यह भी है कि यह बॉयोमास आधारित बॉयोरिफाइनरी के प्रिंसिपल पर काम करने वाली तकनीक है जो पर्यावरण के अनुकूल ऊर्जा उत्पादन की संभावना प्रदान करती है।