फिक्की-ग्रांट थॉर्नटन ने 2030 तक उच्च मूल्य वाली बागवानी के विकास के लिए तीन चरणों वाला रोडमैप दिया

उद्योग चैंबर FICCI और ग्रांट थॉर्नटन की संयुक्त रिपोर्ट में 2030 तक के लिए तीन चरणों वाला रोडमैप प्रस्तुत किया गया है। इसमें उत्पादकता बढ़ाने, प्रसंस्करण को मजबूत करने और निर्यात विस्तार पर जोर दिया गया है। इसका उद्देश्य किसानों की आय बढ़ाना, वैल्यू चेन को सशक्त बनाना और भारत को वैश्विक बागवानी क्षेत्र में अग्रणी बनाना है।

फिक्की-ग्रांट थॉर्नटन ने 2030 तक उच्च मूल्य वाली बागवानी के विकास के लिए तीन चरणों वाला रोडमैप दिया

उद्योग चैंबर फिक्की और सलाहकार फर्म ग्रांट थॉर्नटन भारत ने देश में वर्ष 2030 तक बागवानी क्षेत्र के विकास का एक रोडमैप प्रस्तुत किया है। “आत्मनिर्भर भारत के लिए उच्च मूल्य वाली बागवानी को गति देना: विजन 2030” शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में उत्पादकता बढ़ाने, वैल्यू एडिशन को मजबूत करने और वैश्विक स्तर पर भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के उपाय बताए गए हैं। यह रिपोर्ट नेशनल हॉर्टिकल्चर समिट में प्रस्तुत की गई।

सम्मेलन में इस बात पर जोर दिया गया कि बागवानी भारत के कृषि क्षेत्र का सबसे गतिशील हिस्सा बनकर उभरा है, जो कृषि के सकल मूल्य वर्धन (GVA) में लगभग एक-तिहाई योगदान दे रहा है। कुल उत्पादन में यह खाद्यान्नों को भी पीछे छोड़ चुका है। यह घरेलू मांग में वृद्धि, निर्यात के अवसरों और किसानों द्वारा फसल विविधीकरण के कारण लगातार बढ़ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, बेहतर आय और मजबूत बाजार संपर्क के चलते किसान तेजी से फल, सब्जियां, मसाले और दूसरी उच्च मूल्य वाली फसलों की ओर रुख कर रहे हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का बागवानी क्षेत्र कृषि का एक प्रमुख स्तंभ बन चुका है। वर्ष 2024-25 में कुल उत्पादन 36.77 करोड़ मीट्रिक टन तक पहुंच गया, जो खाद्यान्न उत्पादन से अधिक है। इसमें सब्जियों का सबसे बड़ा योगदान 21.96 करोड़ टन है। इसके बाद फलों का उत्पादन 11.45 करोड़ टन का है, जबकि अन्य बागवानी फसलें 3.3 करोड़ टन से अधिक योगदान देती हैं। भारत अब फल और सब्जियों का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक बन गया है, जहां उत्पादकता बढ़कर 12.56 टन प्रति हेक्टेयर तक पहुंच गई है।

यह क्षेत्र निर्यात और बुनियादी ढांचे के विकास के मामले में भी तेजी से मजबूत हो रहा है। वर्ष 2024-25 में ताजे फल और सब्जियों का निर्यात 1.81 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया, जिसमें हाल के वर्षों में मात्रा और मूल्य दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। साथ ही, प्रसंस्कृत उत्पादों के निर्यात में भी मजबूत प्रदर्शन देखा गया है।

रिपोर्ट के अनुसार, इस विस्तार को समर्थन देने के लिए सरकार ने 1,710 बागवानी क्लस्टरों की पहचान की है और 55,000 से अधिक पोस्ट-हार्वेस्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर सुविधाएं विकसित की हैं, जिनमें कोल्ड स्टोरेज और पैक हाउस शामिल हैं। इसके अलावा, 58 उत्कृष्टता केंद्र (Centres of Excellence) भी स्थापित किए गए हैं। हालांकि, कटाई के बाद 8 से 15 प्रतिशत तक होने वाला नुकसान अब भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है, जो भंडारण और आपूर्ति श्रृंखला की दक्षता में और निवेश की आवश्यकता को दर्शाता है।

मात्रा से मूल्य आधारित वृद्धि की ओर बदलाव

रिपोर्ट में कहा गया कि कृषि विकास को केवल उत्पादन (मात्रा) बढ़ाने के बजाय मूल्य-आधारित मॉडल की ओर ले जाने की आवश्यकता है। रिपोर्ट में जोर दिया गया है कि भविष्य की वृद्धि केवल उत्पादन बढ़ाने पर नहीं, बल्कि गुणवत्ता सुधार, ट्रेसेबिलिटी (उत्पाद की पहचान और निगरानी) और बाजार की मांग के अनुरूप उत्पादन पर निर्भर करेगी।

2030 तक के लिए तीन चरणों का रोडमैप

रिपोर्ट में बागवानी क्षेत्र को बदलने के लिए तीन चरणों वाली रणनीति पेश की गई है:
फाउंडेशन चरण (2026-27): इस चरण में गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री, बागों के पुनर्जीवन और क्लस्टर आधारित विकास के जरिए उत्पादकता बढ़ाने पर जोर दिया जाए।
स्केल चरण (2027-29): इस दौरान कटाई के बाद का इन्फ्रास्ट्रक्चर, प्रसंस्करण सुविधाओं और सप्लाई चेन को मजबूत किया जाए, ताकि नुकसान कम हो और किसानों को बेहतर मूल्य मिल सके।
प्रीमियमाइजेशन चरण (2029-30): इस चरण में ब्रांडिंग, निर्यात और वैश्विक साझेदारियों के माध्यम से भारत को प्रीमियम बागवानी उत्पादों के वैश्विक आपूर्तिकर्ता के रूप में स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है।

इस चरणबद्ध रणनीति का उद्देश्य वैश्विक बाजार में “ब्रांड इंडिया” को मजबूत बनाना और मूल्य श्रृंखलाओं से बेहतर जुड़ाव के जरिए किसानों की आय बढ़ाना है।

तकनीक और नवाचार बने प्रमुख आधार

सम्मेलन में उत्पादन से लेकर विपणन तक पूरी मूल्य श्रृंखला में तकनीक के उपयोग के महत्व पर जोर दिया गया। AI आधारित सलाह, ड्रोन, सटीक (प्रिसिजन) सिंचाई और डिजिटल ट्रेसेबिलिटी जैसे उन्नत उपकरणों के उपयोग से उत्पादकता, गुणवत्ता और पारदर्शिता में सुधार की उम्मीद है। तकनीक आधारित हस्तक्षेपों को वैश्विक गुणवत्ता मानकों को पूरा करने और निर्यात प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए भी महत्वपूर्ण माना गया है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इस क्षेत्र की पूरी क्षमता को साकार करने के लिए सरकार, उद्योग और किसानों के बीच समन्वित प्रयास बेहद जरूरी होंगे। इसमें मजबूत सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP), निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी और नीतियों व निवेश के बेहतर तालमेल पर जोर दिया गया है। क्लस्टर विकास, सेंटर ऑफ एक्सीलेंस और वित्त व बाजार तक बेहतर पहुंच जैसी पहलें उच्च मूल्य वाली बागवानी को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।

निर्यात संभावनाएं और वैश्विक स्थिति

भारत के बागवानी निर्यात में हाल के वर्षों में अच्छी वृद्धि देखी गई है, जिसे बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, ब्रांडिंग और ट्रेसेबिलिटी सिस्टम का समर्थन मिला है। वर्ष 2024-25 में देश ने 1.8 अरब डॉलर से अधिक के ताजे फल और सब्जियों का निर्यात किया, साथ ही प्रोसेस्ड उत्पादों का भी बड़ा निर्यात किया गया। विविध कृषि-जलवायु परिस्थितियों और बढ़ते उत्पादन आधार के चलते भारत उच्च गुणवत्ता वाले बागवानी उत्पादों का प्रमुख वैश्विक आपूर्तिकर्ता बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

तेजी से विकास के बावजूद इस क्षेत्र के सामने कई चुनौतियां बनी हुई हैं, जैसे कुछ उच्च मूल्य वाली फसलों में आयात पर निर्भरता, प्रसंस्करण क्षमता का कम उपयोग और बिखरी हुई वैल्यू चेन। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन बाधाओं को दूर करने के लिए व्यापक सुधार और मिशन मोड में क्रियान्वयन जरूरी होगा, तभी इस क्षेत्र की पूरी क्षमता का लाभ उठाया जा सकेगा।

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