पेट्रोल और डीजल तीन-तीन रुपये महंगे, आम जनता पर बढ़ेगी महंगाई की मार
पश्चिम एशिया संकट और अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के बीच देश में पेट्रोल और डीजल के दाम 3 रुपये प्रति लीटर बढ़ा दिए गए हैं। चुनाव खत्म होने के लगभग दो सप्ताह बाद हुई इस बढ़ोतरी से महंगाई की मार बढ़ने की आशंका है।
सरकारी तेल कंपनियों ने शुक्रवार से पेट्रोल और डीजल के दाम लगभग तीन-तीन रुपये प्रति लीटर बढ़ा दिए। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी तेजी और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच तेल कंपनियों पर बढ़ते नुकसान के दबाव को देखते हुए यह फैसला लिया गया है।
पेट्रोल का रेट 3.14 रुपये और डीजल का रेट 3.11 रुपये प्रति लीटर बढ़ाया गया है। नई दरों के अनुसार, राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 97.77 रुपये प्रति लीटर हो गई है, जबकि डीजल का दाम 90.67 रुपये प्रति लीटर पहुंच गया है।
असम, केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के दौरान तेल कंपनियों ने कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया, जबकि इसी अवधि में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया। चुनाव समाप्त होने के बाद पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी की उम्मीद की जा रही थी। इसी डर से 14 मई की रात पेट्रोल पंपों पर ग्राहकों की भीड़ उमड़ रही थी।
सरकारी तेल कंपनियों ने इनपुट कॉस्ट बढ़ने के बावजूद 11 हफ्ते तक फ्यूल की कीमत में कोई बदलाव नहीं किया था। लेकिन लागत से कम कीमत पर ईंधन बेचने की वजह से तेल कंपनियों को भारी नुकसान होने लगा। जब यह नुकसान सहना नामुमकिन हो गया, तो कंपनियों ने आखिरकार दाम बढ़ाने का फैसला किया।
मार्च के आखिर में सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर लगने वाली एक्साइज ड्यूटी कम कर दी थी। पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी 13 रुपये प्रति लीटर से घटाकर 3 रुपये प्रति लीटर कर दी गई थी जबकि डीजल पर एक्साइज ड्यूटी 10 रुपये प्रति लीटर से घटाकर 0 रुपये प्रति लीटर कर दी गई थी।
पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष और अमेरिका-इजरायल तथा ईरान के बीच तनाव के कारण वैश्विक तेल बाजार में भारी अस्थिरता बनी हुई है। युद्ध की स्थिति के बीच होरमुज जलडमरूमध्य में आपूर्ति बाधित होने की आशंकाओं से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई थीं। हालांकि बाद में कीमतों में कुछ नरमी आई और यह 100 से 105 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में आ गईं। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए वैश्विक कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर घरेलू ईंधन कीमतों पर पड़ता है।
भारत उन प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल था जहां लंबे समय तक खुदरा ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी नहीं की गई। तेल विपणन कंपनियां लगातार बढ़ती आयात लागत के बावजूद कीमतें स्थिर रखे हुए थीं, जिससे उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ रहा था। उद्योग सूत्रों के अनुसार, इस मूल्य वृद्धि का उद्देश्य उसी नुकसान की आंशिक भरपाई करना है।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि पेट्रोल-डीजल महंगा होने से महंगाई पर भी असर पड़ेगा। परिवहन लागत बढ़ने से खाद्य पदार्थों, कृषि उत्पादों और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर अप्रत्यक्ष प्रभाव अधिक देखने को मिल सकता है।
ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी ऐसे समय हुई है जब केंद्र सरकार पहले ही ऊर्जा बचत पर जोर दे रही है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऊर्जा संकट और बढ़ते आयात बिल के मद्देनजर ईंधन बचाने, वर्क फ्रॉम होम को बढ़ावा देने और अनावश्यक यात्रा सीमित करने जैसे कदमों पर जोर दिया था। लगातार ऊंचे कच्चे तेल के दाम देश के विदेशी मुद्रा भंडार और चालू खाते के घाटे पर दबाव बढ़ा सकते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबे समय तक बना रहता है और कच्चे तेल की कीमतें ऊंची रहती हैं, तो आने वाले महीनों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में और बढ़ोतरी से इनकार नहीं किया जा सकता।

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