MC14: डब्ल्यूटीओ की मंत्रिस्तरीय बैठक गतिरोध के साथ समाप्त; भारत के प्रयासों के बीच फिशरीज पर वार्ता आगे बढ़ी

WTO की MC14 बैठक गतिरोध के समाप्त हुई। ई-कॉमर्स, कृषि तथा सुधारों से जुड़े अहम फैसले जिनेवा के लिए टाल दिए गए। प्रमुख सेफगार्ड प्रावधानों का समाप्त होना झटके की तरह है, हालांकि फिशरीज सब्सिडी पर वार्ता आगे बढ़ी। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री ने समानता, नीतिगत स्वायत्तता और छोटे मछुआरों के संरक्षण पर जोर दिया।

MC14: डब्ल्यूटीओ की मंत्रिस्तरीय बैठक गतिरोध के साथ समाप्त; भारत के प्रयासों के बीच फिशरीज पर वार्ता आगे बढ़ी
डब्ल्यूटीओ के 14वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल।

डब्ल्यूटीओ की 14वीं मंत्रिस्तरीय बैठक (MC14) बिना किसी ठोस सहमति के समाप्त हो गई। कैमरून के याउंडे में 26-29 मार्च को आयोजित इस सम्मेलन में ई-कॉमर्स, ढांचागत सुधार और कृषि से जुड़े अहम फैसले जिनेवा के लिए टाल दिए गए। यहां बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली में गहरे मतभेद भी उजागर हुए। ई-कॉमर्स मोरेटोरियम जैसे मौजूदा सेफगार्ड प्रावधान समाप्त हो गए। फिशरीज सब्सिडी पर चर्चा, विशेष रूप से अत्यधिक क्षमता और अधिक मछली पकड़ने के मुद्दों पर केंद्र में रही। भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के नेतृत्व में भारत ने इस मुद्दे पर सक्रिय भूमिका निभाई और नीतिगत स्वतंत्रता तथा न्यायसंगत परिणामों पर जोर दिया। गोयल के हस्तक्षेप ने फिशरीज वार्ताओं के दूसरे चरण की रूपरेखा तय करने में अहम भूमिका निभाई, हालांकि इस पर भी व्यापक सहमति नहीं बन सकी।

डब्ल्यूटीओ की महानिदेशक नगोजी ओकोंजो-इवीला ( Ngozi Okonjo-Iweala) ने स्वीकार किया कि सदस्य देश समझौते के काफी करीब पहुंच गए थे, लेकिन सहमति बनाने में विफल रहे। उन्होंने कहा, “हम याउंडे पैकेज के बहुत करीब हैं, लेकिन अभी पूरी तरह वहां नहीं पहुंचे हैं।” उन्होंने यह भी बताया कि सदस्य देश डब्ल्यूटीओ सुधार, ई-कॉमर्स, ट्रिप्स के तहत नॉन-वायलेशन शिकायतें और एलडीसी पैकेज से जुड़े फैसले के मसौदे को भविष्य की जिनेवा वार्ताओं के आधार के रूप में रखेंगे। यह सम्मेलन हाल के वर्षों की सबसे अनिर्णायक मंत्रिस्तरीय बैठकों में से एक है। इससे बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था के भविष्य को लेकर गहरा विभाजन भी दिखता है।

ई-कॉमर्स मोरेटोरियम समाप्त, शुल्क लगाने का रास्ता खुला

गतिरोध के केंद्र में WTO का इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर कस्टम ड्यूटी न लगाने का मोरेटोरियम था, जो 1998 से लागू था। अमेरिका, यूरोपीय संघ और जापान इसे दीर्घकालिक या स्थायी रूप से बढ़ाने के पक्ष में थे। लेकिन भारत और अन्य विकासशील देशों ने यह तर्क देते हुए इसका विरोध किया कि इससे राजस्व हानि स्थायी हो जाएगी और तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था में नीतिगत लचीलापन सीमित हो जाएगा। कृषि वार्ताओं में प्रगति न होने का हवाला देते हुए ब्राजील ने चार साल के विस्तार सहित सभी प्रस्तावों पर असहमति जताई। सहमति न बनने के कारण 26 वर्षों में पहली बार यह मोरेटोरियम समाप्त हो गया, जिससे देशों के लिए डिजिटल ट्रांसमिशन पर शुल्क लगाने का रास्ता खुल गया है।

TRIPS सुरक्षा प्रावधान भी समाप्त

ई-कॉमर्स मोरेटोरियम का विस्तार नहीं होने के चलते TRIPS समझौते के तहत ‘नॉन-वायलेशन’ शिकायतों के खिलाफ सेफगार्ड प्रावधान भी समाप्त हो गया। विकासशील देश नीतिगत स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए इस प्रावधान पर निर्भर थे, खासकर सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में। इसके बिना WTO के अनुरूप उठाए गए कदम, जैसे अनिवार्य लाइसेंसिंग, को भी विकसित देश चुनौती दे सकते हैं। भारत के लिए इससे बौद्धिक संपदा नियमों, विशेषकर पेटेंट कानून की धारा 3(डी) से जुड़े विवादों का जोखिम बढ़ गया है।

डब्ल्यूटीओ में सुधार पर वार्ता ठप

डब्ल्यूटीओ में सुधार के रोडमैप पर सहमति बनाने के प्रयास भी विफल रहे। वर्ष 2028 तक सुधारों की दिशा में काम करने का प्रस्ताव आम सहमति हासिल नहीं कर सका। मतभेद साफ हैं- विकसित देश तेज निर्णय प्रक्रिया और कड़े नियम चाहते हैं, जबकि विकासशील देश नीतिगत लचीलापन और सर्वसम्मति आधारित प्रणाली को सुरक्षित रखना चाहते हैं। नतीजतन, अन्य मुद्दों की तरह सुधार वार्ता भी बिना किसी ठोस प्रगति के जिनेवा बैठक के लिए टाल दी गई है।

निवेश समझौता अटका, बहुपक्षीय समझौतों की राह आगे बढ़ी

निवेश सुविधा समझौता (IFDA), जिसे अधिकांश देशों का समर्थन प्राप्त है, पर भारत का विरोध है। भारत का तर्क है कि ऐसे बहुपक्षीय (प्लुरिलैटरल) समझौतों को WTO के दायरे में लाने से इसकी बहुपक्षीय प्रकृति कमजोर होगी और छोटे समूह नियम तय करने लगेंगे। भारत के इस रुख ने डब्ल्यूटीओ की सर्वसम्मति आधारित निर्णय प्रणाली के मूल सिद्धांत को सुरक्षित रखने में मदद की है। वहीं 66 देशों ने WTO के बाहर एक अलग ई-कॉमर्स समझौते को आगे बढ़ाया, जो सर्वसम्मति प्रणाली से बाहर नियम बनाने की बढ़ती प्रवृत्ति को दर्शाता है।

कृषि गतिरोध का असर और व्यापक विफलता

कृषि वार्ताओं में लंबे समय से जारी ठहराव से उपजी निराशा ने इस गतिरोध को और गहरा किया, जो विकासशील देशों की प्रमुख प्राथमिकता रही है। ब्राजील ने ई-कॉमर्स पर प्रगति को कृषि मुद्दों से जोड़ दिया, जिससे समझौते की संभावना लगभग समाप्त हो गई। इससे स्पष्ट होता है कि पुराने और अनसुलझे मुद्दे अब डिजिटल व्यापार जैसे नए क्षेत्रों में भी प्रगति में बाधा बन रहे हैं।

MC14 सिर्फ नए समझौते न कर पाने के कारण नहीं, बल्कि मौजूदा ढांचे के कमजोर पड़ने के कारण भी अलग पहचान रखता है। इससे पहले MC11 (ब्यूनस आयर्स, 2017) में नए नियमों पर मतभेद के चलते कोई घोषणा नहीं हो सकी थी, जबकि MC5 (कैनकुन, 2003) में निवेश और प्रतिस्पर्धा जैसे नए मुद्दों पर विवाद के कारण वार्ता टूट गई थी।

लेकिन MC14 पहली ऐसी बैठक है, जहां ई-कॉमर्स और TRIPS से महत्वपूर्ण प्रावधानों को समाप्त होने दिया गया। MC11 के विपरीत, जहां विवाद भविष्य के नियमों को लेकर था, MC14 मौजूदा व्यवस्था को भी बनाए रखने में असफल रहा। कृषि ने ई-कॉमर्स जैसे असंबंधित क्षेत्रों में भी प्रगति रोक दी।

छोटे मछुआरों से कोई खतरा नहीं: पीयूष गोयल

सतत विकास लक्ष्यों (SDG 14.6) के अनुरूप स्थिरता को प्राथमिकता देते हुए भारत ने जोर दिया कि फेज-II की वार्ताओं में समानता के मूल सिद्धांतों को शामिल किया जाए। इसमें विकासशील और अल्प-विकसित देशों के लिए विशेष एवं विभेदित उपचार (S&DT), साझा लेकिन विभेदित जिम्मेदारियां एवं संबंधित क्षमताएं (CBDR-RC) और ‘प्रदूषक भुगतान सिद्धांत’ को मान्यता देना शामिल है। इन सिद्धांतों के अनुरूप, वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने विकासशील देशों के लिए 25 वर्ष की संक्रमण अवधि, दूर समुद्री क्षेत्र में मछली पकड़ने वाले बेड़ों पर कड़े नियम, छोटे एवं पारंपरिक मछुआरों के लिए स्थायी छूट, तथा प्रति व्यक्ति सब्सिडी के आधार पर अनुशासन जैसे प्रमुख मुद्दों को रेखांकित किया, जिससे फेज-II वार्ता का दायरा और व्यापक हुआ।

मंत्रिस्तरीय चर्चा के दौरान गोयल ने कहा कि मत्स्य क्षेत्र भारत की खाद्य सुरक्षा और आजीविका सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभाता है। यह 90 लाख से अधिक मछुआरा परिवारों का सहारा है। इनमें अधिकांश छोटे और पारंपरिक मछुआरे हैं, जो टिकाऊ तरीकों का पालन करते हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारत में फिशरीज सब्सिडी विश्व में सबसे कम स्तर पर है। यह प्रति मछुआरा परिवार सालाना लगभग 15 डॉलर है, जबकि अन्य देशों में यह हजारों डॉलर तक पहुंचती है।

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