मालनपुर प्लांट की क्षमता बढ़ाने के लिए 30 करोड़ निवेश करेगी नोवा

नोवा ब्रांड के तहत डेयरी उत्पादन बेचने वाली कंपनी स्टर्लिंग एग्रो इंडस्ट्रीज लिमिटेड मध्य प्रदेश के मालनपुर स्थित अपने डेयरी संयंत्र की क्षमता में बढ़ोतरी के लिए करीब 25 करोड़ रुपये का निवेश करेगी। स्टर्लिंग एग्रो इंडस्ट्रीज लिमिटेड के डायरेक्टर रवीन सलूजा ने रूरल वॉयस के साथ एक बातचीत में यह जानकारी दी।

मालनपुर प्लांट की क्षमता बढ़ाने के लिए 30 करोड़ निवेश करेगी नोवा
स्टर्लिंग एग्रो इंडस्ट्रीज लिमिटेड (नोवा) के डायरेक्टर रवीन सलूजा।

डेयरी उद्योग की कंपनी और नोवा ब्रांड के तहत डेयरी उत्पादन बेचने वाली कंपनी स्टर्लिंग एग्रो इंडस्ट्रीज लिमिटेड मध्य प्रदेश के मालनपुर स्थित अपने डेयरी संयंत्र की क्षमता में बढ़ोतरी के लिए करीब 25 करोड़ रुपये का निवेश करेगी। स्टर्लिंग एग्रो इंडस्ट्रीज लिमिटेड के डायरेक्टर रवीन सलूजा ने रूरल वॉयस के साथ एक बातचीत में यह जानकारी दी। कंपनी अपने प्रसंस्करण संयंत्र को पुनर्व्यवस्थित करने की योजना के तहत उत्तर प्रदेश के कासगंज स्थित संयंत्र को बंद करेगी क्योंकि इसकी क्षमता का पूरा उपयोग नहीं हो रहा है। वह हरियाणा के कुंडली और मध्य प्रदेश के मालनपुर स्थित संयंत्र के जरिये ही डेयरी उत्पादों का उत्पादन करने की योजना पर काम कर रही है।

नोवा डेयरी उद्योग का एक पुराना ब्रांड है और उसका फोकस दूध की बजाय दूध उत्पादों पर अधिक है। सलूजा के मुताबिक हम घरेलू बाजार में 40 फीसदी वृद्धि दर के लक्ष्य को लेकर चल रहे हैं। वहीं उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और राजस्थान में दूध की खरीद के लिए नयी टीम तैयार कर रहे हैं। 

उन्होंने कहा, हम निर्यात बाजार में भी फोकस बढ़ा रहे हैं। कंपनी अपने उत्पाद का करीब 20 फीसदी निर्यात करती है। यह निर्यात थाईलैंड, इंडोनेशिया और दूसरे एशियाई देशों को होता है। इसमें घी, मिल्क पाउडर और बटर ऑयल का निर्यात प्रमुख है। बिजनेस टू बिजनेस मार्केट पर कंपनी का अधिक फोकस है। इस मार्केट में घी, पनीर, मिल्क पाउडर, टेबल बटर, फ्लेवर्ड मिल्क और दही शामिल हैं। 

रवीन कहते हैं कि हम अपने बिजनेस के कंसोलिडेशन पर फोकस कर रहे हैं और उसी के तहत उत्पादन क्षमता में बढ़ोतरी के साथ इसमें नया निवेश कर रहे हैं। दूध की खरीद के बारे में वह कहते है कि हम वेंडर्स के जरिये ही अधिक दूध खरीदते हैं। लेकिन दूध के दाम इस साल काफी बढ़े हैं और हमारी खरीद लागत भैंस के 6.5 फीसदी फैट वाले दूध के लिए 59 रुपये लीटर तक पहुंच गई है। 

रवीन का कहना है कि सरकार की नीतियों में सहकारी क्षेत्र को अधिक मदद की जाती है जबकि निजी क्षेत्र को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है। कई राज्यों में सरकारें सहकारी समितियों द्वारा खरीदे जाने वाले दूध पर सब्सिडी देती हैं जो एक समान प्रतिस्पर्धी बाजार के सिद्धांत के प्रतिकूल है।

डेयरी सेक्टर में आ रहे स्टार्टअप्स के बारे में उनका कहना है कि वह कुछ खास उत्पादों जैसे ए2 मिल्क, चीज और प्रोटीन वाले उत्पादों पर फोकस बढ़ा रहे हैं क्योंकि ये महंगे उत्पाद हैं और कंपनियां अपने संस्थागत निवेशकों को प्रभावित कर अधिक फंडिंग जुटाने के मकसद से इस रणनिति पर अमल करती हैं। इससे मार्केट डिसरप्शन तो आते हैं साथ ही यह बिजनेस टू कंज्यूमर (बीटूसी) प्रीमियम सेगमेंट में कंपटीशन खड़ा कर रहे हैं।

रवीन कहते हैं कि रेगूलेटरी अथारिटी की जिम्मेदारी है कि गलत और फेक उत्पाद बाजार में न बिक सकें। अगर रेगूलेटर सही तरीके से काम करेंगे तो यह किसानों और उपभोक्ताओं के साथ उद्योग के लिए भी बेहतर होगा। साथ ही बाजार भी स्थिर रहेगा और गैर-जरूरी उतार-चढ़ाव नहीं होंगे। हमारी कंपनी का फोकस ब्रांड लायल्टी को मजबूत करने के साथ ही अपने ब्रांड की साख को बेहरतर करना है। इसके लिए तय गुणवत्ता मानकों का पालन करते हुए बाजार की उम्मीदों पर खरा उतरने की हमारी कोशिश रहती है। 

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