प्याज और आलू की महंगाई एक साल से नकारात्मक क्षेत्र में, लागत निकालने के लिए जूझ रहे किसान
महीने-दर-महीने के आंकड़े बताते हैं कि प्याज की थोक कीमतों में लगभग 50 प्रतिशत तक गिरावट आई है, जबकि खुदरा कीमतें 55 प्रतिशत तक कम हुई हैं। आलू में भी इसी तरह की गिरावट देखी गई है। इसकी थोक कीमतों में 66 प्रतिशत और खुदरा कीमतों में 37 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई है।
- आभास आनंद | प्रिंसू
हाल के महीनों में आलू और प्याज की कीमतों में गिरावट से उपभोक्ताओं को भले ही राहत मिली हो, लेकिन इनकी खेती करने वाले किसानों के लिए यह गिरावट एक गहरे संकट में बदल गई है। उनका कहना है कि मंडियों में दाम इतने नीचे चले गए हैं कि खेती की लागत निकालना भी मुश्किल हो गया है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, आलू और प्याज दोनों की थोक और खुदरा महंगाई लगभग एक साल से नकारात्मक (निगेटिव) बनी हुई है। महीने-दर-महीने के आंकड़े बताते हैं कि इस अवधि में प्याज की थोक कीमतों में लगभग 50 प्रतिशत तक गिरावट आई है, जबकि खुदरा कीमतें 55 प्रतिशत तक कम हुई हैं। आलू में भी इसी तरह की गिरावट देखी गई है। इसकी थोक कीमतों में 66 प्रतिशत और खुदरा कीमतों में 37 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई है।
किसानों का कहना है कि इतने लंबे समय तक चली मंदी ने उनकी आमदनी को बुरी तरह प्रभावित किया है। उनका कहना है कि बाजार से मिलने वाली कीमतें बीज, खाद, मजदूरी, सिंचाई और परिवहन जैसे बढ़ते खर्चों को भी पूरा नहीं कर पा रही हैं।

किसानों की बढ़ती चिंता के बीच केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पिछले सप्ताह महाराष्ट्र में घोषणा की कि सरकार 12.35 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से प्याज खरीदेगी। हालांकि किसानों का कहना है कि बढ़ती लागत के मुकाबले यह खरीद मूल्य कोई खास राहत नहीं देता। राजनीतिक दलों के नेता मांग कर रहे हैं कि किसानों को वास्तविक राहत देने के लिए खरीद मूल्य कम से कम 25 रुपये प्रति किलो किया जाए।
मार्च 2025 से महंगाई निगेटिव जोन में
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, प्याज की थोक मूल्य सूचकांक (WPI) आधारित महंगाई मार्च 2025 से लगातार नकारात्मक बनी हुई है, जबकि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित महंगाई मई 2025 से नकारात्मक है। वहीं आलू की WPI मई 2025 से और CPI अप्रैल 2025 से नकारात्मक क्षेत्र में है।

नासिक के प्याज किसान निवृत्ति न्याहरकर के लिए ये सिर्फ आर्थिक आंकड़े नहीं बल्कि जीवन और आजीविका का सवाल हैं। उन्होंने रूरल वॉयस से कहा, “एक किलो प्याज उगाने में करीब 20 रुपये खर्च आता है, लेकिन हमें इसे 5 या 8 रुपये में बेचने को मजबूर होना पड़ता है। कई बार कीमतें 1 रुपये या 50 पैसे प्रति किलो तक गिर जाती हैं।”
न्याहरकर ने बताया कि एक एकड़ में प्याज की खेती करने में लगभग एक लाख रुपये खर्च हो जाते हैं क्योंकि बीज, खाद, मजदूरी और सिंचाई की लागत काफी बढ़ गई है। लेकिन महीनों की मेहनत के बाद भी कई किसान अपनी आधी लागत तक नहीं निकाल पा रहे हैं।
उन्होंने सरकार की अचानक लगाई जाने वाली निर्यात पाबंदियों को भी स्थिति खराब होने के लिए जिम्मेदार ठहराया। उनका कहना है कि जैसे ही प्याज की कीमतें बढ़ने लगती हैं, सरकार निर्यात पर नियंत्रण लगा देती है, जिससे मंडियों में दाम अचानक गिर जाते हैं।
महाराष्ट्र दौरे पर गए केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 15 मई को कहा, “पश्चिम एशिया संकट के कारण प्याज निर्यात प्रभावित हुआ है, जिससे कीमतें गिर गई हैं। किसानों को तुरंत राहत देने के लिए नाफेड (NAFED) आज से 12.35 रुपये प्रति किलो की दर से प्याज खरीदना शुरू करेगा। हम पूरा स्टॉक खरीदेंगे और किसानों की मदद करेंगे।”

नाफेड और नेशनल कोऑपरेटिव कंज्यूमर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (NCCF) ने चालू वित्त वर्ष में एक-एक लाख टन प्याज खरीदने का लक्ष्य तय किया है। इन एजेंसियों ने मिलकर 2025-26 और 2024-25 में क्रमशः 3 लाख टन और 4.7 लाख टन प्याज खरीदा था।
लासलगांव कृषि उपज मंडी समिति (APMC) के सचिव नरेंद्र वाडवाणे के अनुसार, ‘ए’ ग्रेड प्याज का भाव 16 रुपये प्रति किलो है, जबकि कुल मिलाकर प्याज का औसत भाव 11 रुपये प्रति किलो है। ऐसे में सरकार की घोषणा किसानों को कोई विशेष राहत नहीं देती।
इस बीच, एनसीपी (शरद पवार) के विधायक रोहित पवार ने मांग की है कि सरकार 25 रुपये प्रति किलो की दर से प्याज खरीदे और जिन किसानों ने मजबूरी में कम दाम पर फसल बेची है, उन्हें मुआवजा दिया जाए। रोहित पवार और अन्य नेताओं ने लासलगांव कृषि उपज मंडी समिति (APMC) में किसानों के साथ ट्रैक्टर रैली और धरना प्रदर्शन में हिस्सा भी लिया।
वाडवाणे ने यह भी कहा कि जब भी घरेलू बाजार में कीमतें बढ़ती हैं, सरकार अचानक निर्यात प्रतिबंध लगा देती है, जिससे किसान अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अवसर खो देते हैं। उनका कहना है कि इससे भले ही शहरी उपभोक्ताओं को अस्थायी राहत मिलती हो, लेकिन वैश्विक खरीदार पाकिस्तान, मिस्र और तुर्की जैसे देशों की ओर रुख कर लेते हैं। जब तक प्रतिबंध हटते हैं, तब तक भारतीय किसानों के पास अतिरिक्त स्टॉक बच जाता है और स्थानीय बाजार में कीमतें गिर जाती हैं।
आलू किसानों की भी स्थिति खराब
देश के सबसे बड़े आलू उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश में भी स्थिति गंभीर बनी हुई है। यह राज्य देश के कुल उत्पादन का 30 से 33 प्रतिशत हिस्सा पैदा करता है और यहां हर साल 190 लाख टन से अधिक आलू उत्पादन होता है। इस साल अधिक आपूर्ति के कारण थोक बाजार में आलू की कीमतें बुरी तरह गिर गईं। राज्य की कई मंडियों में आलू का भाव सिर्फ 350 से 400 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया है।
मलीहाबाद के किसान राम कुमार ने रूरल वॉयस से कहा, “आलू उगाने की लागत बिक्री मूल्य से ज्यादा हो गई है। बीज, पानी के पंप के लिए डीजल और खाद का खर्च जोड़ने के बाद लागत 500 से 1000 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच जाती है। इसके बाद मजदूरी का खर्च अलग है। आलू को हाथ से खोदना, बोरी में भरना और मंडी तक पहुंचाना पड़ता है।”
कन्नौज जैसे आलू उत्पादक इलाकों में किसानों का कहना है कि खेती की लागत 1000 रुपये प्रति क्विंटल से ऊपर पहुंच गई है, जबकि मंडी में भाव अब भी लगभग 800 रुपये प्रति क्विंटल है। परिवहन और भंडारण खर्च भी लागत बढ़ा रहे हैं। यही वजह है कि कुछ गांवों में किसानों ने बेहद कठोर कदम उठाए हैं। कहीं किसानों ने खड़ी फसल पर ट्रैक्टर चला दिया, तो कहीं आलू की बोरियां सड़कों किनारे फेंक दीं क्योंकि मंडी तक ले जाना भी घाटे का सौदा बन गया था।
गर्मी के मौसम में कोल्ड स्टोरेज के बिना आलू को सुरक्षित रखना संभव नहीं होता, जिससे संकट और बढ़ जाता है। रायबरेली के दलमऊ के आलू व्यापारी आनंद कुमार मिश्रा के अनुसार, कोल्ड स्टोरेज का खर्च लगभग 340 से 380 रुपये प्रति क्विंटल है। पश्चिम एशिया में आपूर्ति बाधित होने से औद्योगिक रेफ्रिजरेशन में इस्तेमाल होने वाली अमोनिया की आपूर्ति प्रभावित हुई है, जिससे कोल्ड स्टोरेज संचालकों की लागत बढ़ी है और इसका बोझ आखिरकार किसानों पर ही पड़ रहा है।
दरअसल, देशभर के किसानों के लिए खेती का गणित बिगड़ता जा रहा है। फसल उगाने और भंडारण की कुल लागत बाजार में मिलने वाले दाम से कहीं अधिक हो गई है। किसानों का कहना है कि जब तक खरीद व्यवस्था में सुधार नहीं होगा, निर्यात नीति स्थिर और भरोसेमंद नहीं बनेगी तथा भंडारण इन्फ्रास्ट्रक्चर में सुधार नहीं होगा, तब तक उन्हें बाजार की अस्थिरता का जोखिम उठाना पड़ेगा।

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