भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारत में सूरजमुखी तेल की खपत में 10% गिरावट की आशंका
पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण आपूर्ति बाधित होने और कीमतों में वृद्धि से भारत में सूरजमुखी तेल की खपत इस वर्ष 10% घट सकती है। आयात लागत और लॉजिस्टिक्स खर्च बढ़ने तथा रुपये की कमजोरी के कारण उपभोक्ता सस्ते तेलों की ओर बढ़ रहे हैं।
मौजूदा वित्त वर्ष में भारत में रिफाइंड सूरजमुखी तेल की खपत में करीब 10% की गिरावट आने की आशंका है। इसकी दो प्रमुख वजह हैं- पहला, पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण आपूर्ति श्रृंखला में बाधाएं, और दूसरा, बढ़ती लॉजिस्टिक लागत के चलते कीमतों में तेजी। इसके चलते उपभोक्ता सस्ते विकल्प जैसे राइस ब्रान और सोयाबीन तेल की ओर रुख कर सकते हैं। हालांकि, कीमतों में बढ़ोतरी से होने वाली बेहतर प्राप्तियों के कारण कुल राजस्व स्थिर रहने की उम्मीद है। यह संकेत रेटिंग एजेंसी CRISIL द्वारा रेट किए गए नौ सूरजमुखी तेल रिफाइनरों के विश्लेषण से मिलता है। ये रिफाइनरी कंपनियों की लगभग 36,000 करोड़ रुपये के उद्योग में 70% हिस्सेदारी है।
भारत में कुल 250-260 लाख टन वार्षिक खाद्य तेल खपत होती है। इसमें रिफाइंड सूरजमुखी तेल की हिस्सेदारी करीब 12-14% है। यह उद्योग कच्चे सूरजमुखी तेल के आयात पर काफी निर्भर है, जिससे यह वैश्विक व्यापार व्यवधानों और भू-राजनीतिक घटनाक्रमों के प्रति संवेदनशील बना रहता है।
सूरजमुखी तेल का बड़ा हिस्सा यूक्रेन और रूस से आयात किया जाता है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के चलते जहाज अब केप ऑफ गुड होप जैसे लंबे मार्गों से होकर आ रहे हैं, जिससे दूरी और ट्रांजिट समय बढ़ गया है। इसके अलावा, संवेदनशील क्षेत्रों से गुजरने वाले जहाजों के लिए युद्ध जोखिम बीमा प्रीमियम भी बढ़ गया है। परिणामस्वरूप, भारतीय रिफाइनरों के लिए कच्चे सूरजमुखी तेल की लैंडेड लागत बढ़ गई है।
क्रिसिल रेटिंग्स की निदेशक जयश्री नंदकुमार ने कहा, “पश्चिम एशिया संघर्ष शुरू होने के बाद से कच्चे सूरजमुखी तेल का औसत आयात मूल्य बढ़कर वर्तमान में 1,420-1,440 डॉलर प्रति टन हो गया है, जबकि पिछले 12 महीनों में यह औसतन 1,275 डॉलर प्रति टन था। रुपये की कमजोरी और बढ़ी हुई शिपिंग लागत भारत में इसकी लैंडेड लागत को और बढ़ा रही है।”

रिपोर्ट के मुताबिक, सूरजमुखी के कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर अंततः रिफाइंड सूरजमुखी तेल के खुदरा दामों पर पड़ेगा। वर्तमान में रिफाइंड सूरजमुखी तेल की कीमत 170-175 रुपये प्रति लीटर के आसपास है, जो जनवरी 2026 में करीब 150 रुपये प्रति लीटर थी। वहीं, राइस ब्रान और सोयाबीन तेल, सूरजमुखी तेल से 10-20 रुपये प्रति लीटर सस्ते मिल रहे हैं, जिससे उपभोक्ताओं का आंशिक रुझान इन विकल्पों की ओर बढ़ सकता है। इसके चलते वित्त वर्ष 2027 में सूरजमुखी तेल की मांग में करीब 10% की गिरावट का अनुमान है।
हालांकि, मांग में कमी के बावजूद रिफाइनरों की लाभप्रदता मजबूत बनी रहने की उम्मीद है, क्योंकि वे 10-15 दिनों की देरी के साथ कीमतों में बढ़ोतरी का बोझ उपभोक्ताओं पर डाल सकते हैं। साथ ही, कीमतों में गिरावट के जोखिम से बचने के लिए रिफाइनरों के पास मजबूत हेजिंग नीतियां हैं। कम कीमत पर खरीदे गए स्टॉक से होने वाला लाभ, मांग में गिरावट के कारण परिचालन पर पड़ने वाले नकारात्मक असर की भरपाई करेगा। इस कारण कंपनियों का ऑपरेटिंग मार्जिन 4.8-5% के आसपास स्थिर रहने का अनुमान है। हालांकि युद्ध शुरू होने के बाद से घरेलू सूरजमुखी तेल रिफाइनरों के पास इन्वेंटरी स्तर लगातार घट रहे हैं।
क्रिसिल रेटिंग्स के एसोसिएट डायरेक्टर ऋषि हरि ने कहा, “रिफाइनर आमतौर पर आपूर्ति में व्यवधान और कीमतों में उतार-चढ़ाव से निपटने के लिए 30-45 दिनों का कच्चे माल का भंडार रखते हैं। हालांकि, पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण कीमतों में बढ़ोतरी के बीच यह भंडार घटकर 20-30 दिन रह गया है।” यदि यह व्यवधान लंबा खिंचता है तो आपूर्ति और सख्त हो सकती है, जिससे कीमतों और खरीद रणनीति पर दबाव बढ़ेगा।

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