एमएसपी बढ़ाने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर, कोर्ट ने केंद्र और राज्यों से जवाब मांगा

तीन याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश होते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा, “भारत के किसान अपनी उपज को उत्पादन लागत के बराबर कीमत पर भी नहीं बेच पा रहे हैं, जिससे वे गंभीर वित्तीय संकट का सामना कर रहे हैं। इसके चलते बड़े पैमाने पर किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। पिछले पांच वर्षों में अकेले महाराष्ट्र में 17,000 से अधिक किसानों ने आत्महत्या की है।”

एमएसपी बढ़ाने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर, कोर्ट ने केंद्र और राज्यों से जवाब मांगा

अनाज की खरीद के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में पर्याप्त बढ़ोतरी की मांग करते हुए एक जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई है। इस पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों से जवाब मांगा है। याचिका में कहा गया है कि एमएसपी इतना बढ़ाया जाए कि कम से कम किसानों की लागत निकल सके और आर्थिक तंगी के कारण आत्महत्या जैसे कदम उठाने से रोका जा सके।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि इस मामले की जांच करना और कोई निर्देश जारी करना “सरकार की आर्थिक नीति को दोबारा लिखने जैसा होगा”, जिसमें देश की लगभग दो-तिहाई आबादी को मुफ्त राशन उपलब्ध कराने जैसी योजनाएं भी शामिल हैं।

तीन याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश होते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा, “भारत के किसान अपनी उपज को उत्पादन लागत के बराबर कीमत पर भी नहीं बेच पा रहे हैं, जिससे वे गंभीर वित्तीय संकट का सामना कर रहे हैं। इसके चलते बड़े पैमाने पर किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। पिछले पांच वर्षों में अकेले महाराष्ट्र में 17,000 से अधिक किसानों ने आत्महत्या की है।”

भूषण ने कहा कि एम. एस. स्वामीनाथन आयोग ने अपनी रिपोर्ट में खेती को लाभकारी बनाने के लिए लागत मूल्य के साथ 50 प्रतिशत मुनाफा जोड़कर भुगतान करने की सिफारिश की थी। लेकिन हर वर्ष तय किया जाने वाला न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) फसलों की औसत उत्पादन लागत से काफी कम रहता है।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर चावल और गेहूं की सबसे बड़ी खरीदार है, लेकिन अन्य फसलों की खरीद MSP पर लगभग नहीं के बराबर होती है। भूषण ने कहा कि भले ही दो-तिहाई आबादी के लिए मुफ्त राशन जारी रहना चाहिए, लेकिन “इससे इन फसलों के कृषि बाजार को नुकसान पहुंचा है।”

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, “खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत लगभग दो-तिहाई आबादी को मुफ्त गेहूं और चावल देने की व्यवस्था से अन्य प्रतिस्पर्धी खाद्य फसलों, खासकर मोटे अनाज (मिलेट्स) की मांग कृत्रिम रूप से दब गई है। लोग गेहूं और चावल लगभग मुफ्त मिलने के कारण इन फसलों को खरीद नहीं रहे हैं।”

उन्होंने कहा, “इससे मोटे अनाज की खपत में गिरावट आई है और देश में स्वास्थ्य संकट भी और गहरा हुआ है। यदि सरकार राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत मुफ्त गेहूं, चावल और तेल देने के बजाय उतनी ही राशि का प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण करे, तो इससे किसानों के लिए खुला बाजार बनेगा और मिलेट जैसे पौष्टिक अनाजों की खपत भी बढ़ेगी।” 

उन्होंने यह भी कहा कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के तहत कृषि उत्पादों के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति किसानों की परेशानियों को और बढ़ा सकती है। इस स्थिति से निपटने के लिए आकर्षक न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) तय करने के साथ-साथ सरकार को गेहूं और चावल के अलावा अन्य फसलों की भी खरीद करनी चाहिए।

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