अलनीनो नहीं, ‘सुपर अलनीनो’ आएगा इस साल! मौसम विज्ञानियों ने जताई आशंका
दुनियाभर के मौसम विज्ञानी अलनीनो की जगह ‘सुपर अलनीनो’ की आशंका जताने लगे हैं। फिलहाल अलनीनो की आशंका 62 प्रतिशत की और सुपर अलनीनो की आशंका 25 प्रतिशत है। अगर ऐसा हुआ तो आने वाले महीनों में न सिर्फ गर्मी नया रिकॉर्ड बनाएगी, बल्कि दुनिया में कहीं भीषण बारिश तो कहीं भयंकर सूखे का सामना करना पड़ सकता है।
भारतीय मौसम विभाग ने इस वर्ष सामान्य से कम (92 प्रतिशत) मानसून की आशंका जताई है। इसका प्रमुख कारण जून के बाद पैदा होने वाली अलनीनो की परिस्थितियां हैं। लेकिन अब दुनियाभर के मौसम विज्ञानी अलनीनो की जगह ‘सुपर अलनीनो’ की आशंका जताने लगे हैं। फिलहाल अलनीनो की आशंका 62 प्रतिशत की और सुपर अलनीनो की आशंका 25 प्रतिशत है। अगर ऐसा हुआ तो आने वाले महीनों में न सिर्फ गर्मी नया रिकॉर्ड बनाएगी, बल्कि दुनिया में कहीं भीषण बारिश तो कहीं भयंकर सूखे का सामना करना पड़ सकता है।
प्रशांत महासागर में होने वाली घटनाओं पर नजर रखने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि सुपर अलनीनो का जोखिम अधिक है। अमेरिका की स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयॉर्क में पर्यावरण विज्ञान के प्रोफेसर डॉ. पॉल राउंडी ने एक लेख में बताया है कि पिछले 140 वर्षों में सबसे शक्तिशाली अलनीनो की आशंका वास्तविक है। विश्व मौसम संगठन की सेक्रेटरी जनरल सेलेस्ते साउलो ने कहा है कि 2023-24 का अलनीनो अब तक दर्ज पांच सबसे शक्तिशाली अलनीनो घटनाओं में से एक था। इसने 2024 में रिकॉर्ड वैश्विक तापमान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अमेरिका के जलवायु पूर्वानुमान केंद्र की तरफ से 6 अप्रैल को जारी अनुमान के अनुसार, वर्तमान में मौसमीय परिस्थितियां ला नीना से तटस्थ स्थिति की ओर बढ़ रही हैं। हालांकि, मॉडलों के मुताबिक इस गर्मी में अलनीनो विकसित होने की 62 प्रतिशत संभावना है और इसके वर्ष के अंत तक बने रहने के आसार हैं।
अलनीनो और इसके प्रभाव
अलनीनो मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर की सतह के गर्म होने से होती है। वैज्ञानिक आम तौर पर तीन अवस्थाओं का अध्ययन करते हैं। अलनीनो के विपरीत ला नीना तब होता है जब समुद्र की सतह का तापमान औसत से कम होता है। जब न तो अलनीनो और न ही ला नीना हो और सतह का तापमान लगभग सामान्य स्तर पर हो तो तटस्थ स्थिति मानी जाती है।
उत्तरी गोलार्ध में वसंत ऋतु के दौरान विकसित होने वाली और हर तीन से सात वर्षों में बदलने वाली इन तीन अवस्थाओं को मिलाकर “अलनीनो-दक्षिणी दोलन” (ENSO) कहा जाता है। अलनीनो और ला नीना के दौरान समुद्र की सतह के तापमान में एक डिग्री से तीन डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि या गिरावट हो सकती है। इसका वर्षा, सूखा, गर्मी और विभिन्न क्षेत्रों में जलवायु आपदाओं पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
अलनीनो के वर्षों में वे हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं या दिशा बदल लेती हैं, जो सामान्यतः गर्म पानी को पश्चिम की ओर धकेलती हैं। इसके परिणामस्वरूप प्रशांत महासागर के उस हिस्से की सतह पर जलधाराएं गर्म होने लगती हैं। सामान्य से कम से कम 0.5 डिग्री सेल्सियस अधिक तापमान होने पर दुनिया के मौसम पर व्यापक असर होता है। यह अक्सर वैश्विक तापमान को बढ़ा देता है।
मौसम को प्रभावित करने वाले कई कारक होते हैं, लेकिन अलनीनो व्यापक बदलाव ला सकता है। यह जेट स्ट्रीम के प्रवाह को बदल देता है और वर्षा के पैटर्न को उलट देता है, जिससे दुनिया के कुछ हिस्सों में तेज तूफान आते हैं, जबकि अन्य क्षेत्रों में सूखा जैसी स्थिति बन जाती है। इसके अलावा, यह पहले से बढ़ते तापमान को और अधिक बढ़ाने की क्षमता भी रखता है, भले ही यह प्रभाव कुछ समय के लिए ही क्यों न हो।
2015 में भी आया था सुपर अलनीनो
इससे पहले 2015 में सुपर अलनीनो आया था जिसने वैश्विक स्तर पर गंभीर असर डाला था। इस घटना के कारण इथियोपिया में भीषण सूखा पड़ा, जबकि प्यूर्टो रिको में पानी का संकट उत्पन्न हो गया। इसके अलावा, मध्य उत्तरी प्रशांत क्षेत्र में अत्यधिक सक्रिय तूफानी मौसम ने कई रिकॉर्ड तोड़ दिए।
विशेषज्ञों के अनुसार, अलनीनो आमतौर पर ऑस्ट्रेलिया, दक्षिणी और मध्य अफ्रीका, भारत तथा दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों में सूखा और अत्यधिक गर्मी की स्थिति पैदा करता है। वहीं दूसरी ओर, भारी वर्षा की संभावना अमेरिका के दक्षिणी हिस्सों, मध्य पूर्व के कुछ क्षेत्रों और दक्षिण-मध्य एशिया में देखी जाती है, जिससे इन इलाकों में बाढ़ जैसी स्थितियां भी उत्पन्न हो सकती हैं।
सुपर अलनीनो की संभावना 25 प्रतिशत
सुपर अलनीनो की घटना बहुत कम होती है। ऐसा तब होता है जब समुद्र की सतह का तापमान कम से कम 2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाता है। वर्ष 1950 के बाद ऐसा बहुत कम बार हुआ है और केवल एक बार तापमान 2.5 डिग्री सेल्सियस से भी अधिक बढ़ा है।
तापमान जितना अधिक बढ़ता है, अलनीनो के प्रभाव उतने ही तीव्र और व्यापक होने की संभावना रहती है। अमेरिका के नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) के वैज्ञानिकों ने अनुमान जताया है कि इस साल शरद ऋतु या सर्दियों तक ऐसे “सुपर” अलनीनो की स्थिति बनने की संभावना 25 प्रतिशत है।
हालांकि उन्होंने यह चेतावनी भी दी है कि वसंत ऋतु के दौरान किए गए पूर्वानुमान अक्सर स्पष्ट नहीं होते हैं। उनका कहना है कि वसंत के दौरान जलवायु परिस्थितियों में होने वाले बदलावों के कारण सटीक पूर्वानुमान लगाना मुश्किल होता है। इसके बावजूद कई महत्वपूर्ण संकेत दर्शाते हैं कि एक मजबूत या सुपर अलनीनो विकसित हो सकता है।

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