यूपी की चीनी मिलों में 63 लाख टन कम गन्ना पेराई, किसानों को 2500 करोड़ का नुकसान, लेकिन आंकड़ों में बढ़ा गन्ना उत्पादन  

उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों में इस साल लगभग 63 लाख टन कम गन्ने की पेराई हुई। इसका असर चीनी उत्पादन पर तो पड़ा ही, किसानों को करीब 2500 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा है। जबकि सरकारी आंकड़ों में गन्ने का क्षेत्र और उत्पादन लगातार बढ़ रहा है।

यूपी की चीनी मिलों में 63 लाख टन कम गन्ना पेराई, किसानों को 2500 करोड़ का नुकसान, लेकिन आंकड़ों में बढ़ा गन्ना उत्पादन  

चालू चीनी सीजन 2026-27 के दौरान गन्ने की पेराई लगभग पूरी हो चुकी है। इसी के साथ देश में गन्ना और चीनी उत्पादन की तस्वीर साफ हो गई है। महाराष्ट्र 99.30 लाख टन चीनी उत्पादन के साथ देश में अग्रणी है, वहीं गन्ने की कमी से जूझती रहीं उत्तर प्रदेश की चीनी मिलें 89.26 लाख टन चीनी उत्पादन ही कर पायी हैं।

चीनी उद्योग के संगठन इस्मा के अनुसार, 15 अप्रैल तक देश की 539 चीनी मिलों में से 520 चीनी मिलों में पेराई बंद हो चुकी है। केवल 19 चीनी मिलों में फिलहाल पेराई जारी है। देश का चीनी उत्पादन (इथेनॉल के अलावा) 274.80 लाख टन तक पहुंच गया है, जो पिछले साल इस अवधि तक 254.96 लाख टन चीनी उत्पादन से लगभग 8 फीसदी अधिक है। हालांकि, पिछले साल गन्ने की फसल पर रोग व मौसम की मार के चलते देश के चीनी उत्पादन में करीब 18 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई थी। 

यूपी की मिलों को कम गन्ना आपूर्ति

इस साल उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों में लगभग 63 लाख टन कम गन्ना पेराई हुई। गन्ना आपूर्ति में कमी के कारण प्रदेश की अधिकांश चीनी मिलों को समय से पहले ही सीजन समाप्ति का ऐलान करना पड़ा। यह प्रदेश की गन्ना अर्थव्यवस्था के लिए बड़े संकट की शुरुआत है।

नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज लिमिटेड (NFCSF) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, 15 अप्रैल तक यूपी की चीनी मिलों में कुल 874.51 लाख टन गन्ने की पेराई हुई है जबकि पिछले साल समान अवधि तक 937.63 लाख टन गन्ना पेराई हुई थी। यानी यूपी में चीनी मिलों को करीब 6.7 फीसदी कम गन्ना मिला है। यह स्थिति तब है जबकि पिछले कई वर्षों से यूपी में गन्ने की बुवाई के क्षेत्र और गन्ना उत्पादन में बढ़ोतरी के दावे किए जा रहे हैं। 

पेराई कम लेकिन रिकवरी बढ़ी

गन्ना आपूर्ति में कमी के बावजूद उत्तर प्रदेश में चीनी उत्पादन 89.26 लाख टन तक पहुंच गया है जो पिछले साल 15 अप्रैल तक 91.10 लाख टन था। सकारात्मक पहलू यह है कि यूपी में शुगर रिकवरी 9.70 फीसदी से बढ़कर 10.20 फीसदी हो गई है। यानी कम गन्ने से अधिक चीनी बनी।

इस तरह चीनी मिलों को गन्ना आपूर्ति में जो कमी आई, उसकी कुछ हद तक भरपाई बढ़ी रिकवरी से हो गई। चीनी मिलों को उतना नुकसान नहीं हुआ, जितना घाटा गन्ना किसानों को उठाना पड़ा। यूपी में चीनी मिलों को लगभग 63 लाख टन कम गन्ना आपूर्ति के कारण किसानों को अनुमानित 2500 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है।

चीनी मिलों का नुकसान यह है कि उन्हें पर्याप्त गन्ना नहीं मिला और समय से पहले ही सीजन समाप्त करना पड़ा है। अधिकांश मिलें कम क्षमता पर चलानी पड़ीं, जिससे आर्थिक दिक्कतें बढ़ सकती हैं।

गन्ना अर्थव्यवस्था का संकट

पश्चिमी यूपी की एक प्रमुख चीनी मिल के अधिकारी ने रूरल वॉयस को बताया कि इस साल बेहतर भाव के बावजूद चीनी मिलें गन्ना जुटाने के लिए जूझती रहीं। गन्ने की कमी से चिंताजनक स्थिति पैदा हो गई। कई चीनी मिलों को पिछले साल के मुकाबले 2-3 लाख टन तक कम गन्ना मिला, जिसका असर चीनी उत्पादन और मिलों के संचालन पर पड़ा है।

भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत का कहना है कि उत्तर प्रदेश के गन्ना किसान इस समय गंभीर संकट में हैं। गन्ने की फसल रोग्रस्त होने के कारण पैदावार घटी है जबकि खेती की लागत लगातार बढ़ती जा रही है। सरकार और चीनी मिलें किसानों को गन्ने की रोग-प्रतिरोधक किस्में उपलब्ध कराने में नाकाम रही हैं। टिकैत का कहना है कि अगर प्रदेश में गन्ने की खेती को बचाना है तो सरकार और चीनी मिलों को मिलकर किसानों को सहारा देना होगा।

आंकड़ों से नदारद जमीनी हकीकत

देश के प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश में इस साल चीनी मिलों को लगभग 63 लाख टन कम गन्ने की आपूर्ति हुई, जबकि सरकारी आंकड़ों में हर साल प्रदेश में गन्ने का क्षेत्र और उत्पादन बढ़ता जा रहा है। केंद्रीय कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, यूपी में गन्ने की बुवाई का क्षेत्र 2021-22 में 21.77 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 2025-26 में 28.02 लाख हेक्टेयर तक पहुंचने का अनुमान है।

इस पांच वर्षों में प्रदेश में गन्ना उत्पादन 1791.67 लाख टन से बढ़कर 2025-26 में 2329.59 लाख टन तक पहुंचने का अनुमान है। यानी प्रदेश में गन्ना क्षेत्र और उत्पादन बढ़ रहा है। 

लेकिन सवाल यह है कि अगर यूपी में 2329 लाख टन गन्ना उत्पादन हुआ तो फिर प्रदेश की चीनी मिलों को केवल 874.51 लाख टन गन्ना ही क्यों मिल पाया? यह कुल उत्पादन का मात्र 38 फीसदी है। बाकी का 62 फीसदी गन्ना कहां गया? इससे बुवाई और उत्पादन के आंकड़ों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठता है। 

राष्ट्रीय स्तर पर भी आंकड़ों में विसंगति

आंकड़ों में यह विसंगति राज्य ही नहीं राष्ट्रीय स्तर पर भी है। कृषि मंत्रालय के अनुमानों के अनुसार, देश में गन्ने की बुवाई का क्षेत्र पांच वर्षों में 51.75 लाख हेक्टयर से बढ़कर 2025-26 में 58.51 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया। इस दौरान देश का कुल गन्ना उत्पादन 4354 लाख टन से बढ़कर 5001 लाख टन तक पहुंचने का अनुमान है। जबकि देश भर की चीनी मिलों में इस साल कुल 2865 लाख टन गन्ने की पेराई हुई। फिर बाकी का लगभग 2136 लाख टन यानी करीब 42 फीसदी गन्ना कहां गया?

कुल गन्ना उत्पादन का कुछ हिस्सा बीज और कोल्हू व खांडसारी उद्योगों में जाता है। मगर इसकी हिस्सेदारी आमतौर पर 25-30 फीसदी के आसपास रहती है।  

कुल गन्ना उत्पादन और चीनी मिलों में गन्ना पेराई के बढ़ते अंतर पर नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज लिमिटेड ने भी चिंता जताई है। फेडरेशन की ओर से 6 अप्रैल को जारी विज्ञप्ति के अनुसार, भारत सरकार के दूसरे अग्रिम अनुमानों के अनुसार इस साल गन्ना उत्पादन 5000 लाख टन को पार कर गया। गन्ने के रकबे में बढ़ोतरी और रिकॉर्ड उत्पादन के बावजूद चीनी उत्पादन के लिए लगभग 2975 लाख टन गन्ना पेराई का अनुमान है जो कुल उत्पादन का 59.50 फीसदी है। यह चीनी उत्पादन के लिए गन्ना पेराई का एक दशक का न्यूनतम स्तर है। आमतौर पर कुल गन्ना उत्पादन का 65-75 फीसदी चीनी उत्पादन में उपयोग होता है।           

कम गन्ना आपूर्ति की वजह
यूपी में चीनी मिलों को कम गन्ना आपूर्ति के पीछे कई वजहें मानी जा रही हैं। गन्ने की प्रमुख प्रजाति सीओ-0238 में रेड रॉट जैसे रोगों के कारण पैदावार घटी है। गन्ने की फसल में रोगों व कीटों का प्रभावी नियंत्रण नहीं हो पाया, जबकि किसान कई साल से इस समस्या से जूझ रहे हैं। फसल में रोगों के प्रकोप के चलते पैदावार और उत्पादन प्रभावित हुआ है। 

बिजनौर जिले के किसान नितिन देशवाल बताते हैं कि किसानों को गन्ना का बीज लेने के लिए भी दूर-दूर तक भटकना पड़ता है। अभी तक किसानों को सीओ-0238 का विकल्प नहीं मिल पाया है। कई नई प्राजातियों को चीनी मिलें रिजेक्ट कर देती हैं। साथ ही गन्ने की खेती में श्रमिकों की समस्या और खाद व कीटनाशकों की बढ़ती लागत के कारण भी किसानों का गन्ने की खेती से मोहभंग होने लगा है। इन तमाम दिक्कतों के चलते बहुत से किसान गन्ने की बजाए बागवानी या एग्रो-फॉरेस्ट्री का रुख कर रहे हैं। कुछ किसान मक्का और आलू जैसी फसलें भी आजमा रहे हैं।

महाराष्ट्र में भी मौसम की मार 

वहीं देश के सबसे बड़े चीनी उत्पादक और दूसरे सबसे बड़े गन्ना उत्पादक राज्य महाराष्ट्र में चालू सीजन में बंपर फसल की उम्मीद थी, लेकिन अक्तूबर में मौसम में आए बदलाव ने फसल को काफी नुकसान पहुंचाया। इसे जलवायु परिवर्तन के असर की तरह भी देख सकते हैं। अक्तूबर में अधिक बारिश होने के चलते जहां खेतों में पानी अधिक खड़ा रहा वहीं करीब एक माह तक बादलों के बने रहने के चलते फसल को धूप नहीं मिल सकी। फोटोसिंथिस की कमी होने का फसल पर सीधा असर पड़ा है। 

खांडसारी इकाइयों में बेहतर दाम

यूपी में इस साल कई गुड व खांडसारी इकाइयों ने किसानों को गन्ने का दाम बेहतर चीनी मिलों से भी अधिक दिया। चीनी मिलों को कम गन्ना मिलने के पीछे यह भी एक वजह रही है।

कुल मिलाकर राज्य में गन्ने की पैदावार प्रभावित हुई है और गन्ने की खेती कई दिक्कतों से घिरी है, जिसका असर उत्पादन पर दिख रहा है। यह किसानों के साथ-साथ चीनी उद्योग और सरकार के सामने भी बड़ी चुनौती है। ऐसे में अगर कारगर कदम नहीं उठाए गए तो यूपी के साथ-साथ देश का चीनी उद्योग बड़े संकट में आ सकता है।  

 

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