ग्राउंड रिपोर्ट: झुंझुनू के नवलगढ़ में भू-जल संकट ने किसानों से छीनी हरियाली
राजस्थान के झुंझुनू जिले के नवलगढ़ क्षेत्र में गिरते भू-जल स्तर ने खेती, पशुपालन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गंभीर संकट में डाल दिया है। असफल बोरवेल, बढ़ता कर्ज और सूखते खेत किसानों की आजीविका छीन रहे हैं। किसान अब खेती छोड़ वैकल्पिक रोजगार और वर्षा आधारित खेती पर निर्भर होते जा रहे हैं।
राजस्थान के शेखावाटी अंचल में पानी अब सिर्फ प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि किसानों के लिए जीवन और कर्ज के बीच की लड़ाई बन चुका है। झुंझुनू जिले के नवलगढ़ क्षेत्र में लगातार गिरते भू-जल स्तर ने खेती-किसानी की पूरी तस्वीर बदल दी है। कभी सालभर हरे-भरे रहने वाले खेत आज सूखे और बंजर नजर आते हैं। किसान भागीरथ चौधरी जैसे अनेक परिवार, जो एक दशक पहले तक तीनों मौसमों में खेती करते थे, अब असफल बोरिंग, सूखती ट्यूबवेल और बढ़ते कर्ज के बोझ तले दब चुके हैं। पानी की तलाश में लाखों रुपये खर्च करने के बावजूद खेत सूखे रहते हैं। इसका असर खेती तक सीमित नहीं, बल्कि पशुपालन, ग्रामीण रोजगार और सामाजिक जीवन भी संकट में है। शेखावाटी के गांवों में भू-जल की यह गिरावट अब पर्यावरणीय नहीं, बल्कि आर्थिक और मानवीय संकट का रूप ले चुकी है। एक रिपोर्ट…
भागीरथ चौधरी राजस्थान में झुंझुनू जिले के नवलगढ़ क्षेत्र के निवासी हैं। एक दशक पहले तक साल के तीनों सीजन (रबी, खरीफ व जायज) में अपनी 22 बीघा जमीन में खेती करते थे। एक ट्यूबवेल से 22 से 25 फव्वारों के सहारे सिंचाई होती थी। लेकिन भू-जल की कमी के कारण अब 8 से 10 बीघा में फसल की बुआई कर पाते हैं, बाकी पूरी खेती बारिश पर निर्भर है। भू-जल के अलावा इस क्षेत्र में पानी का अन्य कोई माध्यम नहीं है, इसलिए रबी की फसलों का रकबा घटता जा रहा है।
वे अपनी परेशानी बताते हैं, “पहले मेरा व्यवसाय ऊंटपालन का था, लेकिन अचानक एक-एक करके ऊंटों की मौत होने लगी। तब ऊंटपालन छोड़कर खेती को अपनाया। 2010-12 तक भू-जल की मात्रा अच्छी थी लेकिन उसके बाद पानी कम होता गया। मैंने खेत के अलग-अलग हिस्सों में ट्यूबवेल की 6 नई बोरिंग करवाई व 2 पुरानी ट्यूबवेल में नए सिरे से जान फूंकने की कोशिश की, लेकिन कहीं पानी नहीं मिला। अगर मिला भी तो पानी की मात्रा इतनी कम थी कि खेतों में सिचाई नहीं हो सकती थी। अधिक बोरिंग करवाने के कारण कर्ज का भार अधिक हो गया। खेती से इतनी कमाई होती नहीं कि कर्ज चुकता किया जा सके।”

ट्यूबवेल के पास खड़े भागीरथ चौधरी अपने खाली पड़े खेतों को देखते हुए। (सभी फोटोः महेश भड़ाना)
एक ट्यूबवेल की बोरिंग अगर असफल होती है तो किसान को 1.25 से 1.40 लाख रुपये तक का नुकसान झेलना पड़ता है। यह बोरवेल का प्राथमिक खर्च है। इसमें कच्ची मिट्टी खोदने वाली डोला मशीन व पत्थर आने के बाद पत्थर काटने वाली मशीन का खर्च शामिल हैं। बोरवेल करने वाले प्रति फुट के हिसाब से रुपए लेते हैं। मिट्टी की खुदाई करने वाली मशीन का खर्च प्रति फुट 100 से 120 रुपए व पत्थर तोड़ने वाली मशीन का प्रति फुट 250 से 280 रुपए होता है। इसके बाद अगर पानी मिला तो मोटर, केबल, पाइप व फव्वारों का अलग खर्च होता है।
भू-जल कम होने से भागीरथ को खेती का क्षेत्र भी कम करना पड़ा है। कुछ सालों से वे खेती के अलावा भेड़पालन भी कर रहे हैं। वे कहते हैं, खेती घाटे का सौदा हो गई है, इस कारण आय के अन्य स्रोत के रूप में भेड़पालन करना पड़ रहा है।

किसान भागीरथ चौधरी की भेड़ों का स्थल।
यह कहानी महज किसान भागीरथ चौधरी की नहीं, इस क्षेत्र के अनेक किसानों की है। बहुत से किसान तो अब काश्तकार-मजदूर बन गए हैं। इस क्षेत्र में 2012-13 तक 600 बीघा से अधिक क्षेत्र में खरीफ़ सीजन के साथ रबी व जायद की बुआई होती थी और पानी 150 से 200 फुट पर उपलब्ध होता था। वर्तमान में महज 90 से 115 बीघा में रबी की बुआई हो रही है और पानी की उपलब्धता 500 से 700 फुट पर है। जायद सीजन में खेती करने वाले किसानों की संख्या तो नाममात्र की रह गई है।
भागीरथ चौधरी के पड़ोसी किसान धुड़राम गुर्जर और उनके पारिवारिक भाई मिलकर 90 बीघा जमीन में सिंचाई करते थे। ट्यूबवेल में पानी कम होने पर उन्होंने चार अलग-अलग जगहों पर बोरवेल करवाई लेकिन पानी नहीं मिला। फिलहाल महज 3 फव्वारे चलते हैं और वो भी 2 से 3 घंटे तक, उसके बाद मोटर पानी खींचना बंद कर देती है। इस कारण इस वर्ष रबी में कुल 90 बीघा में से 12 बीघा में ही फसल की बुआई हुई। वह भी इस उम्मीद के साथ कि नवंबर-दिसंबर में अगर बारिश हो गई तो फसल तैयार हो जाएगी। धुड़राम कहते हैं, “पहले साल भर खेत हरे-भरे रहते थे, अब तो खेत खाली पड़े हुए हैं और बंजर जैसे महसूस होते हैं।”

किसान धुड़राम गुर्जर और उनके भाइयों की सामूहिक ट्यूबवेल।
भू-जल की कमी से पशुपालन भी प्रभावित
चैनगढ़ गांव की महिला किसान संतोष गुर्जर अपनी गाय का दूध निकालते हुए कहती हैं, मैं 16 साल की थी तब इस गांव में ब्याह कर आई थी। तब पानी की कोई कमी नहीं थी और खेतों में इतना काम था कि फुर्सत नहीं मिलती थी। पानी की अधिकता के कारण पशुओं की संख्या भी अधिक थी। खेती के साथ गाय, भैंस व बकरियों का पालन भी किया जाता था। लेकिन जैसे-जैसे पानी की कमी होती गई, फसलों का क्षेत्र सिकुड़ता गया और पशुओं की संख्या भी कम होती गई।

महिला किसान संतोष गुर्जर अपनी गाय का दूध निकालती हुई।
संतोष गुर्जर की पड़ोसी सजना देवी अपने खेत में पशुओ के लिए हरा चारा काटते हुए कहती हैं कि पानी की कमी के कारण चारे की भी कमी हुई है। इस कारण पशुओं की संख्या कम करनी पड़ी है। अभी सिर्फ तीन पशु हैं जिनसे घर परिवार की खानापूर्ति होती है। सजना देवी के यहां पहले 3-4 बीघा में तो हरा चारा बोया जाता था, लेकिन अभी महज आधा बीघा में हरा चारा है। वह भी पानी की कमी व गर्मी के कारण झुलस रहा है।

महिला किसान सजना देवी अपने खेतों में मवेशी के लिए हरा चारा (बजरी) काटती हुई।
विभिन्न शोध पत्रों व सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि झुंझुनू जिले के नवलगढ़ क्षेत्र के भू-जल स्तर में काफी गिरावट आई है। श्री टैगोर कॉलेज कूचामनसिटी के प्रिंसिपल डॉ. पी.एस चौहान का झुंझुनू जिले के भू-जल स्तर व गुणवता पर एक शोध जुलाई 2025 में “इंटरनेशनल जर्नल ऑफ इनोवेशन व रिसर्च एनालिसिस” में प्रकाशित हुआ था। शोध पत्र के अनुसार जिले की नवलगढ़ व मंडावा तहसील में भू-जल का स्तर व उसकी गुणवता दोनों कमजोर हैं। यहां के पानी में फ्लोराइड, नाइट्रेट व क्लोराइड की मात्रा अधिक पाई गई जो स्थानीय लोगों व कृषि के लिए घातक है। केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय के तहत काम करने वाले केंद्रीय भूमिजल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) की रिपोर्ट “हाइड्रोलॉजिकल ऐट्लस ऑफ राजस्थान- 2013” व “ग्राउन्ड वाटर ईयर बुक 2020-21” में भी भू-जल की गिरावट व गुणवता में कमी की बात कही गई है। उसमें भी फ्लोराइड, नाइट्रेट व क्लोराइड की मात्रा की अधिकता के बारे में बताया गया है।
नवलगढ़ में भू-जल गिरने की मुख्य वजहों में से एक पानी का खेती में अंधाधुंध उपयोग है। जमीन के अंदर पत्थर की मौजूदगी के कारण किसान की बोरवेल भी असफल होती रहती है। इन्हीं पत्थरों के कारण इस क्षेत्र में सीमेंट फैक्ट्रियों की संख्या बढ़ रही है। वर्तमान में यहां तीन सीमेंट फैक्ट्रियां हैं और नए प्लांट के लिए भूमि की खरीद फरोख्त जारी है। ग्रामीणों का कहना है कि इन फैक्ट्रियों के आसपास के गांवों में भू-जल का स्तर बहुत नीचे चला गया है और खेती वाली जगह बंजर हो रही है। हालांकि इन फैक्ट्रियों के कारण भू-जल स्तर गिरने पर अभी कोई शोध नहीं हुआ है।
बहरहाल, शेखावाटी अंचल के किसानों व निवासियों के लिए पानी की समस्या विकराल रूप लेती जा रही है। भू-जल के अलावा यहां पानी का दूसरा माध्यम नहीं है। राज्य सरकार के कृषि विभाग ने वर्षा जल संचय के लिए “फार्म तालाब” नाम से योजना चलाई है, जिसमें राज्य सरकार की तरफ से किसानों को 60-70 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जाती है। इस योजना के बारे में नवलगढ़ क्षेत्र के कृषि अधिकारी सुभाष सीगर ने रूरल वॉयस को बताया कि योजना के तहत दो साल में 200 किसानों ने आवेदन किया, जिनमें से 93 किसानों को इसका लाभ मिला। इस वर्ष 500 से अधिक किसानों के आवेदन की उम्मीद है।

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